“एक साँस”- डॉ. शैलजा सक्सेना
साँसों की भीड़ में
एक साँस है,
सब साँसों को साँस बनाती
जैसे वो साँस नहीं
एक पेड़ हो ऑक्सीज़न का!
जब दिन की भाग–दौड़ में
साँसें शोर मचाती,
सब कुछ उथल-पुथल कर जाती हैं,
तब मैं आ बैठती हूँ
उसी साँस की छाँह में
जहाँ होते हैं
मैं और तू
बस्स…!
दुनिया भर के काम,
हमारे साउंड प्रूफ़ मन के काँच के पीछे से
चिल्लाते हैं,
घड़ी, भागने का संकेत करती है!
पर कुछ देर के लिये
मैं रुक ही जाती हूँ,
उस साँस की छाँह में,
अपनी..
एक साँस लेने के लिये॥
