साहित्य जगत से : बशीर बद्र को देशभर से श्रद्धांजलि
रेखा राजवंशी (सिडनी, ऑस्ट्रेलिया)
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाए |
उर्दू अदब की दुनिया के अज़ीम शायर बशीर बद्र 91 की उम्र में हमारे बीच नहीं रहे । उनको किशोरावस्था से रेडियो पर सुनते आना हमारी पीढ़ी की खुशनसीबी थी। उनकी शायरी दिल की गहराइयों में उतर जाती थी और जाने कब सबकी ज़िंदगी का हिस्सा बन जाती थी ।
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में |
आम आदमी का दर्द उनकी शायरी में झलकता था। मुहब्बत हो या इबादत, तन्हाई हो या महफ़िल, दिल में दबी कोई टीस हो या महबूब का इंतज़ार, हर मौक़े पर बशीर साहब ने अपने अलग अंदाज़ में लिखा है ।
न जी भर के देखा न कुछ बात की
बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की
या
तुम्हें ज़रूर कोई चाहतों से देखेगा
मगर वो आँखें हमारी कहाँ से लाएगा |
आज पद्मश्री बशीर बद्र हमारे बीच नहीं हैं पर उनकी शायरी सदियों तक आबाद रहेगी और लोगों के मन में धड़कती रहेगी ।
उनकी लेखनी को सलाम |
डॉ. सुमन अग्रवाल (चेन्नई)
कुछ लोग
सिर्फ़ शायर नहीं होते…
वो हमारी तन्हाइयों की आवाज़ होते हैं।।
जब दुनिया
बहुत शोर करने लगती है,
तो उनके अशआर
धीरे से आकर
दिल के कंधे पर हाथ रख देते हैं…।।
बशीर बद्र
ऐसे ही शायर थे…
जिन्होंने मोहब्बत को
कभी मुश्किल लफ़्ज़ों में नहीं लिखा,
बल्कि रोज़मर्रा की साँसों में बसाया।।
उनके शेर
किताबों में कम,
लोगों की यादों में ज़्यादा मिलते हैं…।।
कभी किसी बिछड़ते रिश्ते में,
कभी बारिश की पहली बूंद में,
कभी रात के आख़िरी पहर में
तकिए पर गिरते आँसू में…।।
उन्होंने लिखा —
“उजाले अपनी यादों के
हमारे साथ रहने दो…”
और सच यही है…
उनकी यादों के उजाले
अब हमारी ज़िंदगी का हिस्सा हैं।।
वो बताते रहे
कि मोहब्बत
सिर्फ़ पा लेने का नाम नहीं,
किसी को उम्र भर
एहतराम से याद रखने का हुनर भी है।
“कोई हाथ भी न मिलाएगा
जो गले मिलोगे तपाक से…”
कितनी सादगी से
उन्होंने पूरे दौर का मिज़ाज लिख दिया…।।
न कोई शोर,
न कोई नारा,
बस दो लाइनें…
और आदमी देर तक सोचता रह जाए।।
उनकी ग़ज़लें
महज़ ग़ज़लें नहीं थीं,
दिल और ज़िंदगी के बीच
एक नरम-सी बातचीत थीं।।
आज वो हमारे बीच नहीं हैं…
मगर सच तो ये है….
कुछ लोग कभी जाते ही नहीं।
वो रह जाते हैं —
किसी मिसरे की तरह होंठों पर,
किसी दुआ की तरह दिल में,
किसी चराग़ की तरह
अँधेरे वक़्त में…।।
बशीर बद्र साहब,
आप गए नही है….
बस
अल्फ़ाज़ से निकलकर
हमारी रूह में उतर गए हैं…।
डॉ. सुधा दीक्षित अध्यापिका, हिंदी विभाग, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय झांसी
“गजल के आंगन में आज उदासी की
एक चादर सी तन गई है,
तुम्हारी यादों की शब-ए-तन्हाई,
आंखों का पानी बन गई है।
विदा किया है तुम्हें भले ही,
तुम्हारे गुलाबी शहर ने रोकर,
मगर तुम्हारी हर एक गजल अब
खुदा की आयत बन गई है।”
“नजर से ओझल हुए हो लेकिन,
दिलों की धड़कन में रहोगे,
किताबों के पन्नों में नहीं,
तुम तो सांसों के सावन में रहोगे।
बशीर साहब! ये दुनिया वाले
आपको कभी भी भूला ना पायेंगे ।
तुम गजल बनकर जमाने के
हर एक गम और जश्न में रहोगे।”
पंकज सुबीर
यह शायद अंतिम मुशायरा था जिसमे डॉ. बशीर बद्र साहब नज़र आए थे। १० मई २०१० को शिवना प्रकाशन का पहला बड़ा आयोजन था। उनका स्वास्थ्य उस समय भी बहुत ठीक नहीं था किंतु सीहोर का नाम सुन कर वे आ गए थे। बस आधा घंटे कार्यक्रम में रुके थे। अटक अटक कर एक दो शेर पढ़ कर माफ़ी माँग कर चले गए थे।
उनका खूब स्नेह मुझे मिला। जब मेरा पहला कहानी संग्रह ईस्ट इंडिया कंपनी आया था उर्दू अकादमी के अध्यक्ष थे वे, बहुत प्यार से मुझे अकादमी में कहानी पाठ के लिए बुलाया था उन्होंने। फिर जब भी मैंने सीहोर बुलाया वे दौड़े चले आए। आखिरी बार २०१० में जब मैंने उनको बुलाया तब नहीं सोचा था कि अब उनको कभी बुला नहीं पाऊँगा।
गर्मजोशी से हाथ में हाथ लेकर उनका बातें करना मन में बसा हुआ है। कैसे कह दूँ अलविदा उनको ?
चराग़ों को आँखों में महफ़ूज़ रखना
बड़ी दूर तक रात ही रात होगी
मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी
जाइए बद्र साहब फ़रिश्ते आपसे शेर सुनने को मुंतज़िर हैं।
