दिन विशेष (लघुकथा) में डॉ.महेन्द्र अग्रवाल की लघुकथाएँ

स. नई ग़ज़ल सदर बाजार शिवपुरी म.प्र. 473551
ई-मेल mkagrwal@yahoo.com
१. राखी की सेल्फी बहिन के साथ !
रक्षाबंधन का त्यौहार आते ही भाई को अपनी बहिन से ज्यादा नगदी और बैंक बेलेंस की चिंता होने लगी। सुशासन होने से सुगर के रेट बढ़ गये थे इस कारण नकली घी या मावे की मिठाई बनाने वालों ने भी अपनी मिठाइयों के रेट
बढ़ा दिये थे । पहले भैया ने हमेशा की तरह रेडीमेड सोन पापड़ी का डिब्बा ले जाने का सोचा फिर उसे पिछले साल की याद आ गई जब उसके भांजे और भांजी ने उसे लगभग वार्निंग दे दी थी कि मामा सोन पापड़ी लेकर मत आना। पिछली साल के नौ डिब्बे पड़े हैं ,हमें भी इस बार ठिकाने लगाने हैं।तब इतना सुनकर बहिन के प्रति उसके प्रेम का बुखार बिना पेरासिटामोल की गोली लिए उतर गया था।
अब आधुनिक युग में संबंध ऐसे तो रहे नहीं जो प्रेम कथित आत्मा में नीचे उतरते पानी की तरह उछालें मारता हो। आर्थिक युग है सो सब कुछ अर्थ से निर्धारित होता है। अपनी आर्थिक स्थिति और प्रतिफल की उम्मीद से । वैसे भी बाप अभी बिस्तर पर है और सेवा के नाम पर उसका अपना जीवन नरक बना हुआ है। थोड़ी बहुत उम्मीद गांव की जमीन और मकान से है। उनके मरने के बाद बहिन हिस्सा तो नहीं मांगेगी ,यह चिंता भी अब भाई के मन में सर उठाने लगी थी। इस राखी पर सोचना पड़ रहा है कि क्या करूं?। भविष्य के हिसाब से देखूं ? या अभी ऐसा ही चलने दूं?
सोचते-सोचते उसे लगा कि वह फालतू बातें सोच-सोचकर कुत्ता बन गया है। परिवार के बारे में पहले से नकारात्मक बातें सोचना क्या अच्छी बात है? इससे तो कुत्ते अच्छे हैं जो प्रेम करने वाले को चाटते व दुलार करते हैं। कल की रोटी की उम्मीद नहीं रखते। फिर याद आया कि आजकल बहिनों की रक्षा का ठेका भी कुत्ते लेने लगे हैं । लेकिन उसकी बहिन के यहां तो कोई कुत्ता भी नहीं है। मन में असमंजस था सो उसने अवसर व मन दोनों होते हुए भी बहिन के साथ राखी बांधते हुए कोई सेल्फी नहीं ली। क्या पता कल को कचहरी में उसके खिलाफ न चली जाये। वैसे भी जबसे देश की एक बड़ी सेलिब्रिटी ने कुत्ते को भाई मानकर राखी बांधी है अब ऐसी कोई सेल्फी सोशल मीडिया पर डालने का मन ही नहीं रहा। तस्वीर में लोग किसे मानेंगे? वैसे भी उसे अपनी शक्ल के बारे में भी कोई गलतफहमी नहीं है। कल किसी ने सोशल मीडिया पर तस्वीर के नीचे उल्टा सीधा कमेंट लिख दिया तो ?
२ . कुत्ता क्या जाने राखी का महत्व ?
रक्षा बंधन का त्यौहार आते ही भाई बहिन का प्रेम सोशल मीडिया के अनेकानेक प्लेटफार्म पर उमड़ने, उफनने,पसरने लगता है। इसे वह लोग आसानी से समझ सकते हैं जिन्होंने पर्वतों पर बनी झील के टूटने के बाद के मलबे को नीचे उतरते फैलते पसरते देखा है। अभी कुछ तस्वीरें ताज़ा हैं, आप भी समझ लीजिए। इस सांस्कृतिक त्यौहार की सबसे अच्छी बात ये है कि ये किसी सांसद के पारिवारिक मामले सा नहीं है। भारतीय संस्कृति और संबंधों की शुचिता के लिए इसका महत्व निर्विवाद है।
यद्यपि मुहल्ले के कुछ भाई जोकि सांसद जैसी हिम्मत नहीं जुटा पाते वो अपनी कलाई बचाने के लिए आसपास की मुंह बोली बहिन से छिपते फिरते हैं और उनकी दृढ़ प्रतिज्ञ बहिनें भाई की कलाई खोजने के लिए पूरे दिन अभियान चलाती हैं।
अब जैसे आदमियों में शेर ,चीते ,बंदर ,कुत्ते ,गर्दभ ,वराह सभी होते हैं या मिल जाते हैं वैसे ही इन जन्तु समुदायों में भी कभी-कभी आदमी निकल आते हैं। पिछले दिनों एक ……अब बहिन कहने का मन तो नहीं कर रहा , पर सेलिब्रिटी तो नो डाउट वो है। उसने स्वविवेक से या कुछ पैसों के लालच में युधिष्ठिर के साथ सशरीर स्वर्ग पहुंचे श्वान देव में अपना भाई खोज लिया। निर्णय होते ही देवता आकाश से फूल बरसाने लगे। उन्हें और कोई काम भी नहीं था। वहीं से जय-
जयकार करने लगे। उनके कृत्य देखकर खुशी के मारे दुंदुभि सहित धरती और स्वर्ग के सारे उपलब्ध वा़द्य यंत्र अपने आप बजने लगे। अप्सराएं और गंधर्व नृत्य करने लगे। भरत खण्डे पृथ्वीलोक पर सर्वत्र हर्ष और आनंद छा गया। समस्त श्वान जाति चौराहों पर एकत्र होकर अपनी पूंछ उठाकर-लहराकर ,किसी नेता की विजय से
उन्मत्त उसके समर्थकों की तरह अपनी भावनाओं का इजहार करने लगी। अब थे तो वो कुत्ते !उन पर न मिठाइयों बांटने को थी और न राखी बांधने वाली बहिना को उपहार देने की व्यवस्था। वह तो खुद भावी जी घर पर हैं के
सीरियल के विभूति नारायण की तरह दूसरों पर निर्भर थे। उनके हीरो पर भी बहिन को देने को मरा गिरा एप्पल का मोबाइल भी नहीं था । कहावत है न ?-
नंगा नहाये क्या निचोड़े क्या ? कोई बात नहीं, शगुन तो टी. वी. एड वालों ने दे दिया होगा पर वो आदतन दस मिनिट में सोफे से उचक बैठा। राखी भी पांव में बंधी थी वो भी क्या करता? थोड़ी देर में लौटा तो उसकी सेलिब्रिटी बहिना ने देखा कि कमबखत राखी गीली भी कर लाया था और गंदी भी ।
