दिन विशेष युवा लेखन में हर्षित उपाध्याय की कविताएँ

हर्षित उपाध्याय दिल्ली विश्वविद्यालय में संस्कृत विषय के शोधच्छात्र हैं और परंपरागत भारतीय काव्य शैली के सशक्त संवाहक हैं। छंद, लय और शास्त्रीय सौंदर्य से रचित इनकी परंपरावादी कविताएँ भारतीय साहित्य की समृद्ध सांस्कृतिक व साहित्यिक धरोहर को जीवंत करती हैं। अपनी रचनाओं के माध्यम से प्राचीन काव्य परंपराओं और आधुनिक विचारों के बीच एक सुंदर संतुलन स्थापित करने वाले हर्षित समकालीन काव्य जगत में अपनी एक विशिष्ट पहचान बना रहे हैं।
१ .
जीवन में उत्थान पतन नित चलता रहता है,
जीवन में सुख-दुख का नीर सदा ही बहता है,
जीवन में आने जाने का क्रम चलता रहता है,
कौन भला इस दुनिया में स्थायी रहता है?
सूरज का भी उगना ढ़लना चलता रहता है,
भोर निशा का ताना-बाना चलता रहता है,
बचपन और जवानी का यह सतत् निरंतर क्रम है,
अहंकार में मति को खोकर कहां सोचते जन है?
वृद्धायु में बैठ व्यक्ति जब चिंतन करता है,
क्या पाया क्या खोया ये सब चलता रहता है।
२.
पिता की वेदना को कौन जाने?
पिता की साधना कौन पहचाने?
मौन हो कर दुलार देता है,
पिता जीवन का सार देता है।
पिता भावुक सा मन है,
पिता तपता बदन है।
पिता पौरुष है, बल है,
पिता साहस है संबल है।
पिता बच्चे का यश है,
पिता संसार में सब है।
पिता को शब्द दूं हिम्मत नहीं है,
पिता होना यहां आसां नहीं है।
३.
पशु की पशुता यदि दीख रही
नर की मानवता भी दीखे,
आत्मतत्व और यथार्थ ज्ञान
बालक नचिकेता से सीखें ।।
श्रुत परम्परा अल्पायु हुई
प्रश्नान्तक बोध न दीख रहा,
भौतिकता द्वारा हरण हुआ
संस्कारित चीर न दीख रहा,
है कलियुग का ये दुःशाशन
पाश्चात्य सभ्यता जो आई,
काया निर्वस्त्र नजर आती
मानव का धर्म न दीख रहा।।
अज्ञानादि समूहों से घिर
उदित सूर्य न दिखता है,
हो जिसमें तेज प्रबल शक्ति
वह भला छिपा रह सकता है,
तुम निकलो घर से निखरोगे
यह चमत्कार हो सकता है,
सूरज के तपते रहने से
क्या अंधकार हो सकता है ?
४.
मत करो भ्रूण में हन उसका
हैं देवी की अवतार वही,
भगिनी हो चाहे प्रेमप्रिया
बसता है मां का प्यार वही।
भाई को राखी बांधी है
देवों को उसने पाला है,
इक औरत के आंचल में
ही गिरजाघर और शिवाला है।
तू प्रेम रूप की भंडारण
दुनिया में तुमसा कोई नहीं,
बसता है मां का प्यार वही
बसता है मां का प्यार वही ।।
तुम सहनशीलता की देवी
सीता सी शक्ति है तुममे,
सबरी सी श्रद्धा है तुममे
मीरा सी भक्ति है तुममें।
अपमानों को सहकर के भी
अभिशाप कभी ना देती हो,
इक नई जिंदगी दे कर के
एहसान कभी ना लेती हो।
तुम सकल चराचर की देवी
दुनिया में तुमसा कोई नहीं,
बसता है मां का प्यार वही
बसता है मां का प्यार वही ।।
*******************
