दिन विशेष कहानी : “जी पिता जी” – डॉ. सत्‍येंद्र सिंह

बाबू श्‍याम लाल को अपनी बहू का बाँई ओर का ओठ काटकर आँख नचाना भूलते नहीं भूलता। जब भी बहू उनकी बात से सहमत नहीं होती तो बोलती कुछ नहीं परंतु अपना बाँई ओर का ओंठ दाँतों से काटते और आँखें नचाते हुए अंदर बेडरूम में चली जाती। बाबूजी समझ तो जाते हैं, परंतु बोल कुछ नहीं पाते । पता नहीं उन्‍हें अपने बेटे के न रहने पर घर में अजीब सा सहमापन अनुभव होता है। वे हमेशा बहू के सामने आने से कतराते हैं। उन्‍हें याद है जब वे कलक्‍ट्रेट में बाबू थे और जब उनका बेटा हाईस्‍कूल पास करके इंटरमीडिएट में पहुँचा तभी उनकी पत्‍नी का देहांत हो गया तो उन्‍होंने अपने बेटे राज कुमार को पिता और माता दोनों बनकर पाला। राज पढ़ने में होशियार था और उसने भी शिकायत का मौका नहीं दिया था। हाईस्कूल व इंटरमीडिएट भी प्रथम श्रेणी में उत्‍तीर्ण करने के बाद उसके मन में अपने पिता का भार हल्‍का करने के उद्देश्‍य से नौकरी करने का विचार आया तो बाबू श्‍याम लाल का पिता और माता हृदय क्रंदन सा कर उठा। उन्‍होंने तड़प कर कहा था कि बेटे अभी मेरी नौकरी बाकी है और बाद में भी पेंशन मिलेगी ही, इसलिए उसे जी भरकर पढ़ना चाहिए। नौकरी तो करनी ही है, कौन सी जमीन जायदाद है, जिसके सहारे बैठेंगे।
परिणामस्‍वरूप राज ने सी. ई. टी. की परीक्षा दी और उसमें अच्‍छे नंबर ले आया। उसका सिविल इंजीनियर में एडमीशन हो गया। वह बहुत खुश था। उसकी ज्‍यों ज्‍यों पढाई आगे बढ़ने लगी और दोस्‍ती यारी का माहौल बदलने लगा तो उसके सोच में भी अंतर आने लगा।
जहाँ वह अपने पिता को ही सब कुछ समझता था वहाँ अब वे नंबर दो पर हो गए। वे कुछ कहते तो जनरेशन गैप की संज्ञा दी जाने लगी।
राज ने फायनल ईयर में ही संघ लोक सेवा आयोग की इंजीनियरिंग सर्विसेस में अप्‍लाई कर दिया। फायनल की परीक्षा देने के तुरंत बाद आयोग की परीक्षाएँ भी हुई और राज इंजीनियरिंग सर्विसेज में सेलेक्‍ट हो गया। सिंचाई विभाग में वह सहायक इंजीनियर के पद पर नियुक्‍त हुआ। श्यामलाल अब राज से आप कह कर संबोधन करने लगे। एक बार राज के चीफ इंजीनियर ने उसके पिता से मिलने की जिज्ञासा जाहिर की और वह उन्‍हें अपनी बाइक पर बैठाकर चीफ इंजीनियर के बँगले पर ले गया। राज बँगले में ऐसे घुसा जैसे उन्हीं का बँगला हो। यह तो उन्‍हें बाद में अहसास हुआ कि वह इस बँगले में राज अक्‍सर आते जाते रहते हैं। चीफ इंजीनियर जितने सम्‍मान के साथ बातें कर रहे थे उतने ही बाबू श्‍यामलाल अंदर ही अंदर सिकुड़ते जाते। उन्‍हें बहुत संकोच हो रहा था, ठीक वैसे ही जब वे नौकरी में थे, तब बाबू के रूप में कलेक्‍टर साहब के बंगले पर जाने में होता था। चीफ इंजीनियर साहब उनसे बोले- “बाबू जी आपके पुत्र राज साहब तो बहुत ही काबिल आफीसर हैं। आपने संस्‍कर भी ऐसे दिए हैं कि वे सभी का मन लुभाते हैं। आफिस में भी सभी को यथोचित सम्‍मान देते हैं और अपने सीनियर्स को भी।”

“सब ईश्‍वर की कृपा है, इसमें मेरा कोई हाथ नहीं है साहब।” श्‍याम लाल यह कहते हुए संकोच में डूबे जा रहे थे।
“नहीं, नहीं, आपकी सच्‍ची और ईमानदार मेहनत की कमाई और आपके स्‍वाभिमान तथा निरहंकारी स्‍वभाव के कारण ही यह सब हुआ। राज पढ़ने में अच्‍छे थे तो उनकी पीठ पर हाथ रखने वाले आप ही थे।” चीफ इंजीनियर साहब बड़े गर्व से कहे जा रहे थे।
श्‍याम लाल जी चुप बैठे रह गए। उनके पास कहने को कोई शब्‍द नहीं थे। राज भी बरामदे पर पड़े सोफे पर बैठे हुए थे। वे अन्‍यमनस्‍क दोनों का वार्तालाप सुन रहे थे।
चीफ इंजीनियर साहब ने सोफे पर ही पहलू बदलते हुए कहा “श्‍यामलाल जी, ऐसे होनहार बच्‍चे ढूँढ़ने से ही मिलते हैं। पैंतीस साल की मेरी नौकरी हो गई परंतु इतना होशियार, ईमानदार और लगनशील नौजवान मैंने नहीं देखा। मेरा तो जी चाह रहा है कि इस नौजवान को गोद ले लूँ।” श्‍याम लाल जी बिलबिला उठे यह सुनकर, “अरे यह आप क्‍या कह रहे हैं, आपके अंडर काम करते हैं, अपना ही बच्‍चा समझें, इसमें इतना कुछ कहने की क्‍या जरूरत है।” चीफ इंजीनियर साहब ने कहा, “अपना ही बच्‍चा समझता हूं, परंतु पराया तो पराया ही होता है।” यह सुनकर श्‍याम लाल जी चुप रहे। थोड़ी देर की चुप्‍पी के बाद चीफ साहब फिर बोले, “चलिए आपकी ही बात सही, अपना समझने के लिए गोद नहीं तो दामाद बना लेता हूँ।”
अबकी बार श्‍याम लाल जी चौंके, उन्‍होंने राज की ओर ऐसे देखा जैसे उनका बेटा उनसे छीना जा रहा हो। एकदम तो कोई उत्तर नहीं दे सके, बस इतना ही कहा “अरे आप कहाँ और हम कहाँ।” लेकिन उनके ऊपर पानी तो उस समय गिरा जब चीफ साहब ने कहा कि “बाबूजी राज और काजल एक दूसरे को बहुत पसंद करते हैं। ईश्‍वर ने जोडी बना ही दी है, हमें तो सिर्फ फर्ज निभाना है।” झट से राज का बंगले में नि:संकोच घुसना उनकी आंखों में कौंध गया और वे यह भी समझ गए कि सब कुछ पहले से ही तय है, उन्‍हें तो रस्‍मअदायगी के लिए बुलवाया गया है। उन्‍हें यह पसंद नहीं आया कि बेटे वाले को बंगले पर बुलाकर रिश्‍ता तय किया जाए क्‍योंकि यह सामाजिक नियमों के विपरीत था। लड़की वाले कितने ही बड़े व पैसे वाले हों, आखिर उन्‍हें लडके वाले के दरवाजे पर आना ही चाहिए। उन्‍होंने कहा “मेरे साहबजादे अब सयाने हो गए हैं, जैसा ये चाहेंगे वैसा ही होगा” और उठने का उपक्रम किया। चीफ साहब कहते रह गए कि अभी बैठिए खाना वगैरह खाकर जाएँ परंतु वे बैठे नहीं। चीफ साहब की बेटी काजल अंदर से आई और सिर पर पल्‍लू लेते हुए बाबूजी के पैर छूकर अंदर चली गई। ऐसा लग रहा था कि राज बँगले से जाना नहीं चाहते, परंतु पिता के उठ खड़े होने के कारण उठना पड़ा और ‘’अच्‍छा सर’’ कहकर चीफ साहब के पैर छूते हुए बाहर निकल आए।
राज मानो बहुत प्रसन्‍न थे। यह श्‍यामलाल जी महसूस कर रहे थे। जैसे ही बाइक राज के बँगले पर पहुंची, बाबू जी उतर कर अंदर चले गए। राज ने अंदर आते हुए पूछा कि आपको लड़की कैसी लगी तो बोले “जब तुमने पसंद कर ही ली है, तो मेरी पसंद नापसंद का क्‍या अर्थ। मैं तुम्‍हारे विपरीत तो नहीं जा सकता न।” राज ने तसल्‍ली भरी निगाहों से उन्‍हें देखा और बाबूजी ने महसूस किया कि उनकी मर्जी की परवाह किसे है। राजकुमार को सहायक इंजीनियर नियुक्त होते ही सरकारी बँगला मिल गया था। वैसे उनका किराये का घर था और बाबू श्यामलाल को किराये का घर छोड़कर बँगले में रहने आना पड़ा। उन दोनों बाप बेटे के अलावा कोई और था भी तो नहीं।
चीफ साहब ने दिल खोलकर विवाह किया। सभी अफसरान विवाह में आए थे। कलेक्टर साहब और सभी विभागों के अधिकारी। बाबू जी के सगे संबंधी और कलक्ट्रेट में काम करने वाले और रिटायर्ड बाबू लोग भी आए थे, परंतु वे पूरी बारात और विवाह में अलग ही दिख रहे थे।
उन लोगों की समझ में नहीं आ रहा था कि वे खुशी मनाएँ या नहीं। उन्‍हें डर था कि खुशी मनाते समय उनके प्रभारी अफसर उनसे नाराज न हो जाएँ और बाबूजी तो अपने आप में ही नहीं थे। उनसे मिलकर कौन जा रहा है, कौन आ रहा है, उसका उन्‍हें कोई होश नहीं था। बस चेहरे पर एक हल्‍की सी मुस्कान चिपका रखी थी, वह भी चिपक कर रह गई थी ऐसा कहा जाए तो ज्‍यादा अच्‍छा होगा। हँसी खुशी सब बिदा हो गए। राज अपनी पत्‍नी को लेकर घर
आ गए और बाबू जी बँधे-बँधे से घर आ गए। उन्‍होंने अब आकर अनुभव किया कि यही जनरेशन गैप है, जिसे वे आज तक समझ नहीं पाए थे और अपने इकलौते बेटे के विवाह पर खुश नहीं हो पा रहे हैं।
राज और काजल विवाह के दूसरे दिन बाहर घूमने चले गए।

विवाह हुए दो वर्ष होने जा रहे हैं और बाबू श्‍याम लाल महसूस कर रहे हैं कि दूरी बढ़ती ही जा रही है। वे कोई उपाय सोच नहीं पा रहे हैं इस दूरी को कम करने के बारे में। राज ने कभी भी अपना पिता से ऐसा व्यवहार नहीं किया जिससे उन्हें दुख हो परंतु अंदर ही अंदर कुछ था जो उन्हें खल रहा था। उनकी पत्नी होती तो मन की बात कह पाते और शायद बहू को भी कोई बात करने वाला मिल जाता। उसकी भी माँ या भाई नहीं है और न ही अपनी माँ के बारे में उसे कभी बात करते देखा है। जब भी उनकी पत्नी की बरसी आती है तो सारा काम खुद ही करते हैं। राज पहले साथ रहा करते थे क्योकि पुत्र का काम होता है तर्पण आदि, परंतु अब उसे समय नहीं मिलता। ऑफिस, मीटिंग, बहु के साथ बाहर जाना शापिंग करना बस यही काम रह गए हैं उसके।
बहू घर में तो कुछ करती नहीं। सहेलियों के यहाँ जाती है और लेपटॉप पर न जाने क्या करती रहती है। श्वसुर से क्या बात करे। कुछ काम हो तो बोल दिया फिर चुप्पी। सुना है पेट से है, पहले भी सुना था पर दो तीन महीने बाद क्या होता कि सब कुछ नार्मल। श्याम लाल नन्हें मुन्नें बालक का मुख देखने के लिए तरस रहे हैं और इसके अलावा कोई चाहत भी नहीं है।
अचानक राज और बहू बंगले से निकले और गाड़ी की और दौड़े। श्यामलाल ने पूछना चाहा कि क्या हो गया है, लेकिन उन्होंने अवसर ही नहीं दिया। और वे ठगे से खड़े रह गए। आस पास के बंगलों में काम करने वाले नौकरों से पता चला कि राज के ससुर चीफ साहब नहीं रहे। श्यामलाल पशोपेश में थे कि वहाँ जाएँ या नहीं। उनका दिल नहीं माना और उनके पैर बाहर की और उठ गए। बंगले पर जाकर श्यामलाल ने देखा कि चीफ साहब का मृत शरीर जमीन पर एक गद्दे पर रखा हुआ है जिस पर एक सफेद कपड़ा डाला हुआ है, कुछ फूल मालाएं भी। सब खामोश खडे हैं। राज शव के पास खडे हैं और बहू दो तीन औरतों से घिरी बैठी है। वे धीरे से चलकर राज के पास पहुंचे और फुसफुसाते हुए बोले किसी पंडित को बुलाया है। राज ने पहले तो ऐसे देखा कि वे यहाँ क्यों आ गए, परंतु धीरे से बोला कि अमेरिका से उनकी बहन आने वाली है, उनका इंतजार है। श्यामलाल बोले और तब तक चीफ साहब का यह शरीर यहीं रखा रहेगा। उनकी बहन को आने में कितना समय लगेगा। राज फुसफुसाया, पता नहीं। श्यामलाल राज के घर से निकलने से लेकर अब तक के समय का आकलन करने लगे, आठ घंटे हो गए होंगे। जो बुजुर्ग और युवा सफेद पोशाक में वहाँ जमा थे वे एक-एक कर खिसकने शुरु कर दिए। अचानक श्यामलाल को कुछ सूझा और फोन पर जोर जोर से बोलने लगे, हाँ पंडित जी सब सामान भिजवा दीजिए और आप आ जाइए। सब लोग उनकी ओर देखने लगे और जो खिसकने की फिराक में थे वे भी रुक गए। राज भी उनकी ओर देखने लगा। फिर उन्होंने बहू को नाम से पुकारते हुए कहा, बेटा मन को कड़ा कर लो, और तैयार हो जाओ, तुम ही उनकी बेटी हो और तुम ही उनका बेटा। अपने पिता की आत्मा की शांति के लिए तुम्हें ही सब कुछ करना पड़ेगा। पंडित जी आते ही होंगे। और बहू सिर पर पल्ला लेकर बोल उठी, जी पिता जी। राज ने भी राहत की सांस ली और पत्नी के पास खड़ा हो गया। बाकी के लोग फुसाफुसा रहे हैं कि ये एडीशनल चीफ इंजीनियर राज साहब के पिताजी हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate This Website »