‘फीजी माँ’ – फीजी हिंदी का महाकाव्यात्मक उपन्यास
-सुभाषिनी लता कुमार
अंग्रेजी के प्रतिष्ठित और चर्चित साहित्यकार होते हुए भी प्रो. सुब्रमनी ने अंग्रेजी भाषा के मोह को त्यागकर फीजी हिंदी में साहित्यिक कृतियाँ लिखना प्रारंभ की। ‘डउका पुरान’ के बाद ‘फीजी माँ’ उनकी दूसरी औपन्यासिक कृति है। प्रो. सुब्रमनी का उपन्यास ‘फीजी माँ’ अपनी तरह की एक अलग कृति है। यह बृहद औपन्यासिक कृति 1026 पृष्ठों की है जिसमें लेखक ने फीजी के प्रवासी भारतीय समाज के संबंध में ऐसी जानकारियां दी हैं, जो पाठक को स्तब्ध करती हैं।
‘फीजी हिंदी’ फीजी में बसे भारतीयों द्वारा विकसित हिंदी की नई भाषिक शैली है जो अवधी, भोजपुरी, फीजियन, अंग्रेजी आदि भाषाओं के मिश्रण से बनी है। ‘फीजी माँ’ नायिका प्रधान उपन्यास है जिसमें एक साधारण नारी बेद मती के अस्तित्व की खोज की कथा प्रस्तुत है। बचपन में पिता ने उसका नाम गौतमी रखना चाहता था मगर माँ ने बेद मती रख दिया। बेद के गर्म मिज़ाज़ के कारण आजी उसे सनका देवी बुलाती थी और पढ़ाई-लिखाई और खेलकूद में तेज होने के कारण पं. हरनिंदन उसे तेजेशवरी कहने लगे। तथा शादी के बाद पति और सास उसे प्यार से मोहिनिया पुकारते हैं। लेकिन ‘असली बेद कौन है?’ यह प्रश्न बेद को व्याकुल करता है।
‘फीजी माँ: हजारों की माँ’ में लेखक ने अपनी निजी यादों और जीवनकाल की स्मृतियों को नायिका बेदमती के द्वारा अभिव्यक्त किया है। उपन्यास के मूल तत्व में महिलाओं की मुक्ति, सबाल्टर्न (subaltern) इतिहास, मदर इंडिया का वैश्विक विस्तार, सुदूर द्वीपों का ग्रामीण जीवन, विदेशी भूमि में भारतीय संस्कृति और प्रवास का आघात शामिल हैं। उपन्यास की कथा बेदमती के बचपन, उसकी स्कूली शिक्षा, दांपत्य जीवन, लम्बासा गाँव से शहरी विधवा, और नायिका एवं उसके सामाज की गद्यात्मक गाथा है। उक्त उपन्यास के संबंध में डॉ. दानेश्वर शर्मा का कहना हैं कि “जैसे फीजी हिंदी को साहित्यिक सृजन की भाषा के रूप में मान्यता मिल रही है, वैसे ही सुब्रमनी द्वारा लिखित उनके उपन्यास ‘फीजी माँ’ को भी मान्यता दी जाए क्योंकि फीजी हिंदी की यात्रा में यह उपन्यास एक और मील का पत्थर है।” वही डॉ. विमलेश कांति वर्मा इसे फीजी हिंदी का महाकाव्य मानते हैं।
प्रो. सुब्रमनी फीजी के प्रमुख गद्य लेखकों, निबंधकारों और आलोचकों में से एक हैं। फीजी हिंदी भाषा के साथ अक्सर यह संदेह रहा है कि वह एक अपूर्ण, टूटी-फूटी, व्याकरण हीन भाषा है, और इसका प्रयोग सिर्फ बोल-चाल के लिए ही उपयुक्त है, किंतु सुब्रमनी की बृहत औपन्यासिक कृति ‘डउका पुरान’ और ‘फीजी माँ’ ने इस रूढ़ि-बद्ध धारणा को निरार्थक साबित कर दिया है। ‘डउका पुरान’ फीजी हिन्दी साहित्य की एक ऐतिहासिक तथा महत्वपूर्ण उपलब्धि है जिसका प्रकाशन स्टार पब्लिकेशन, नई दिल्ली द्वारा सन् 2001 में हुआ। इस सृजनात्मक रचना के लिए प्रो. सुबमनी जी को सन् 2003 में सुरीनाम में हुए सातवें विश्व हिन्दी सम्मलेन के अंतर्गत विश्व हिंदी सम्मान से पुरस्कृत किया गया हैं।
सुब्रमनी का ‘डउका पुरान’ और ‘फीजी माँ: हजारों की माँ’ दोनों उपन्यास गिरमिट काल से चले आ रहे भारतवंशियों की जीवन यात्रा का एक अनमोल संग्रह है। इन उपन्यासों में उनके अनुष्ठानों, प्रथाओं और रीति-रिवाजों को दर्ज किया गया है ताकि भावी पीढ़ी साहित्यिक मनोरंजन के अलावा, इसका महत्व एक ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय दस्तावेज के रूप में भी उठा सके। प्रस्तुत उपन्यास की कथा छ अध्यायों में विभक्त है जो नायिका बेद मती के जीवन यात्रा से संबंधित है। कथा की शुरुआत वर्तमान से होकर अतीत में चली जाती है और फिर वर्तमान की उपलब्धियों के साथ खत्म होती है। आत्मकथात्मक शैली तथा फ्लैशबेक तकनीक के माध्यम से लेखक ने कथा को प्रस्तुत किया है। दक्षिण प्रशान्त महासागर में स्थित फीजी एक बहुजातिय और बहुसांस्कृतिक द्वीप देश है जहाँ पर फीजियन, हिन्दुस्तानी, चीनी, यूरोपीयन, कोरीयन, रोतूमन आदि जातियाँ रहते हैं। इस सांस्कृतिक विविधता को फीजी हिंदी साहित्य में दर्शाया गया है। फीजी हिंदी साहित्य की अधिकत्म रचनाएं आत्मकथात्मक है जिनके माध्यम से साहित्यकारों ने अपने तथा अपने पूर्वजों के गिरमिट काल की त्रासदियों, अनुभवों, संवेदनाओं, मान्यताओं, मूल्यों तथा वर्तमान जीवन शैली को लिपिबद्ध किया है।
गिरमिट काल के दौरान फीजी ब्रिटिश सरकार के अधीन थी और उपनिवेशक प्रभाव के कारण हिंदी की उपभाषाओं और बोलियों में अंग्रेजी, ई-तऊकई और देशज शब्दों का मिश्रण हुआ। फलस्वरूप इसकी प्रकृति और स्वरुप में परिवर्तन हुआ और यह एक धारा की ओर मुड़ने लगी जिससे यहाँ ‘फीजी हिंदी’ भाषा की उत्पत्ति हुई (जोगिन्द्र सिंह कंवल.1980.अ हंड्रेड इयर्स ऑफ़ हिंदी इन फीजी 1879-1979)। अतः हिंदी ने जैसा देश वैसा अपना वेश बनाया। इसकी साज-सज्जा तो बदली किंतु उसने अपने भाषिक संस्कार को सुरक्षित रखा। इसमें फीजियन और अंग्रेजी भाषा से बड़ी संख्या में शब्द उधार लिए गए हैं।
आधुनिकीकरण और वैश्वीकरण की वजह से अंग्रेजी भाषा का निरंतर प्रभाव फीजी के प्रवासी भारतीय समाज पर भी देखा जा सकता है। जैसे-जैसे लोग गाँवों से शहर की ओर बढ़ रहे हैं और शहर से विदेश की ओर प्रवास कर रहे हैं तो इसके साथ उनकी भाषा एवं संस्कृति में परिवर्तन हो रहे हैं और धीरे-धीरे वे अपने इतिहास, पूर्वजों की भाषा एवं संस्कृति से कटते जा रहे हैं। इतिहासकार प्रो. बृज विलाश लाल कहते हैं- “हम लोग के चाही कि आने वाले संतान के लिए हम लोग ऊ पुराना जमाना के बारे में लिखी ताकी उन के मालूम होई कि हम लोग कौन रास्ता से गुजरा…। हम लोग के अपना इतिहास बचाये के रखे के चाही। काहे कि बिना इतिहास के हम लोग एक बिना पेन्दी के लोटा रहीब।” इस प्रकार अपने पूर्वजों के इतिहास तथा अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए फीजी हिंदी को लिपि बद्ध एवं संरक्षित करने पर कार्य प्रारंभ हुए।
इक्कीसवीं शताब्दी में फीजी हिंदी भाषा के प्रलेखन की ओर प्रो.सुब्रमनी का ध्यान गया जिसके फलस्वरूप उन्होंने अंग्रेजी भाषा के मोह को छोड़कर फीजी हिंदी में साहित्यिक कृतियाँ लिखनी प्रारंभ कीं। गिरमिटियों की भाषा, जीवन शैली, संस्कृति, परंपरा, अनुभव आदि का यथार्थ चित्रण ‘डउका पुरान’ (2001) और ‘फीजी माँ’ (2018) औपन्यासिक कृतियों में लिपि बद्ध किया गया है। इन उपन्यासों में सुब्रमनी जी ने फीजी हिंदी के ऐसे अनूठे शब्दों को संग्रहित किया है जो आधुनिक भाषाओं के मोह में लुप्त हो रहे थे जैसे मनहई, छीछर लेदर, बजर भट्टू, टिर्राई, नारियल के बूलू, टिबोली, झाप, निपोरिस, ठिनकही, गोदना आदि फीजी हिंदी शब्दों का संग्रह है।
इस उपन्यास के माध्यम से सुब्रमनी जी ने अपने पूर्वजों की भाषा को पुनर्जीवित करने की सार्थक पहल की है जिसमें उनका अपना जीवन है और इस जीवन को गति देने वाली उनकी अपनी संस्कृति, अपनी परंपरा और अपने संस्कार हैं। उन्होंने अपने बाल काल के उस ग्रामीण समाज को फिर से समझने की चेष्टा की है जिससे उनकी कृतियों में ग्रामीण समाज की सच्ची झलक हमारे आँखों के सामने दिखाई देती है। उदाहरण के लिए ‘फीजी माँ’ (पृष्ठ 246-248) का यह महत्वपूर्ण अंश प्रस्तुत हैं-
हम घूरा परचारकजी के। रमायन लाल तूल में बंधा टेबल पे धरान, छोटा परचारक गए रमायन खोल के सिंगहासन पे रखिस अउर खोजे लगा कहां बांचे के है। मंडली वाले लड़का के अगल बगल खड़ा होय गइन। सीतल जल्दी से फूल बाटिस। रसीका लपक के गई रूम से गेंदा के वास लई आई। टेबल पे रख के मूंड निच्चे करे, मुस्कात, आपन जगहा पे बइठ गई। काकी आंखी गड़ाइस रसीका पे। काकी के चेहरा देखते जाने सको का बोले मांगे: ई कउन कायदा है, घर के छोटी दुल्हनिया के। काकी के न रहाइस भय, बरबाइस, “हद कर दिहिन। रामफल के तो बिधि बिधान अच्छा से जाने के चाही। कथा रोकाय दिहिस छोटकी।”
मंगलाचरन सरू भय। छोटका परचारक, देखे में दुबरा पतरा, लेकिन आवाज़ सुन के अउरतें मोहित होय लगिन। चौपाई पे धियान कमती, सबन के आंखी खली अरथ बताय बाला छोटा परचारक पे। झुलाय के बताय जइसे वही तुलसीदासजी है।जादा सुध भासा में समझाय, खली कभी कभी फिसल जाय गांव के भासा बोले लगे, अउरे मीठास लगे।
“यदपी मंडली अभी किसकिंधा कांढ पहुंचा, रामफलजी के आग्राह है हम लोग सुंदर कांढ के कुछ अंश सुनाई। रामफलजी हनुमान के महान भक्त है हम लोग के माने के पड़ा।”
पता नइं रामफल के नाम के साथे महान कहां से जोड़ दिहिस। बड़ा महान भक्त है! लड़का तो अइसे बोलत जाय, पता नइं आगे चल के का करी …।
“आज हम सुंदर कांढ के कुछ सुंदर सुंदर चौपाई, दोहा अउर छंद सुनायगें, थोड़ा बरनन करेंगे पवनपुत्र पर … ।”
मंडली सात दोहा पढ़ीन फिर आरती के वासते सब खड़ा होई गइन। बिंदा रुमाल में गठिआय के तीन पेनी रखे रही, हम्मे अउर बिमल के एक एक पेनी पकड़ाइस आरती में छोड़े के। बिसरजन खूब जोस से गाइन। आखरी में हम लोग जोर से चिल्लावा, श्री रामचंद्रजी की जय, पवनपुत्र हनुमान की जय!
परसाद बटा: पंजीरी, खीरा, तरबूज अउर हलुआ। सबेरे रोठ चढ़ा, सब के मीठा रोटी मिला। हमार पलेट में खीरा अउर तरबूज पनजीरी में सनाय गय, कुछ मजा नइं लगा। रमायन खलास होते देर नइं झाप में सोरगुल शुरू। रामफल हाथ उठाय के चुप कराइस। जोर से खखार के गटई सफा करिस, अउर कोई के बोले बिना आपन भासन सुरु करिस, “ रामचरितमानस बिना हम फीजी वासी सब अनाथ हैं … ।”
उक्त अंश फीजी में रामचरितमानस की परंपरा को रेखांकित करती है। फीजी में तुलसी की ‘रामचरितमानस’ भारतीय संस्कृति का परम द्योतक है। यहाँ बड़े आदर और श्रद्धा से रामकथा पढ़ी जाती है और तुलसी के राम कथा का आनंद उठाया जाता है। भारत में आध्यात्मिक समृद्धि के लिए इसका पठन होता है पर फीजी में इसका महत्व मान, सम्मान, सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक जीवन के आधार हैं। यहाँ के प्रवासी भारतियों के लिए मानस उनके सामाजिक जीवन का आधार है। मानस के द्वारा वे नियम, कानून, मर्यादाएँ, नैतिक मूल्य, रीति-रिवाज़ आदि निर्धारित करते हैं। इतना ही नहीं, कोर्ट में शपथ के लिए हिन्दू रामायण का उपयोग करते हैं। वर्ष 2000 में फीजी के भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री महेन्द्र चौधरी जी ने रामायण पर हाथ रखकर प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। फीजी में सनातन धर्म प्रतिनिधि सभा ऑफ फीजी के मार्गदर्शन में 2000 से अधिक रामायण मण्डलियाँ हैं, जो राम कथा के अलावा पारंपरिक त्योहार जैसे होली, राम नवमी, महा-शिवरात्री, नवरात्री, दीपावली आदि पर्वों को उत्साह से मनाती है। गिरमिट काल से यहाँ हर मंगलवार को रामायण पाठ करने की लोक परंपरा जारी है जिसका सुन्दर चित्र लेखक ‘फीजी माँ’ में खींचते हैं।
‘फीजी माँ’ उपन्यास में पाठकों को फीजी के बहुजातीय जनसाधारण के जीवन और उनकी लोक भाषा फीजी हिंदी का यथार्थ संदर्भ पढ़ने को मिलेगा। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल उपन्यास को एक शक्तिशाली विधा स्वीकारते हुए लिखते हैं कि “समाज जो रूप पकड़ रहा है, उसके भिन्न-भिन्न वर्गों में जो प्रवृतियाँ उत्पन्न हो रही हैं, उपन्यास उनका विस्तृत प्रत्यक्षीकरण ही नहीं करते, आवश्यकतानुसार उनके ठीक विन्यास, सुधार अथवा निराकरण की प्रवृति भी उत्पन्न कर सकते हैं।” यह विचार ‘फीजी माँ’ के संदर्भ में बिलकुल सटीक परिलक्षित होता है। यह कथा साहित्य पाठकों को फीजी की अनोखी बहुजातीय संस्कृति, भाषा तथा राष्ट्र प्रेम की भावनाओं से ओत-प्रोत कराती है। इसका साक्षात प्रमाण उपन्यास का शीर्षक ‘फीजी माँ’ में सनिहित है। उपन्यासकार ने फीजी के प्रवासी भारतीयों की कई समस्याएं को ‘फीजी माँ’ की कथा में संप्रेषित किया है। जहाँ समाज में व्याप्त बुराई का विरोध करना भी एक प्रकार की राष्टभक्ति है। एक लेखक राष्ट्र के आइने में अपने साहित्य को रचता है, वह जिस जगह पर रहता है जिस चीज को देखता है उसी को अपनी रचना में व्यक्त करता है। लेखक की दुनिया में देश बड़ी चीज है, उसके लिए उसका गाँव भी देश ही है। वह समाज में सताए हुए लोगों को जागृत करता है। देश के विकास में पुरुषों के साथ-साथ स्त्रियों का भी उत्तरदायित्व रहा है जिसे पितृसत्तात्मक समाज अनदेखा कर देता है। बेद मती, आजी, इंदरा, नानीसे, भवानी, जोय, शीरा अपने कर्तव्यों को निभाती हैं मगर समग्र उपन्यास में उपन्यासकार ने हमें यह बार-बार एहसास दिलाया है कि, औरत चाहे समाज के किसी भी वर्ग की क्यों न हो, उसका समर्ग जीवन दुखों से ही भरा हुआ होता है। सुब्रमनी जी भिखारी की ओर देखने की हमारी दृष्टिकोण में परिवर्तन को इस प्रकार की अपेक्षा व्यक्त कर उनकी पीड़ा का भी विमर्शमूलक आख्यान प्रस्तुत करते हैं। सुब्रमनी ने ‘फीजी माँ’ में इन उपेक्षित नारियों की कथा को वाणी प्रदान की है और उनके सशक्तिकरण का मार्ग प्रशस्त किया है। अतः यह कहा जा सकती है कि प्रस्तुत उपन्यास लेखक के देश प्रेम की भावना को दर्शाती है।
डॉ. विमलेश कांति वर्मा का यह विचार है कि “भाषा सुरक्षित और सबल तब होती है जब वह सृजनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम बनती है। लिखित अभिव्यक्ति के लिए भाषा पर अच्छा अधिकार होना आवश्यक है। यह अधिकार सीखी हुई भाषा पर उतना कभी नहीं होता जितना अपनी मातृभाषा पर अधिकार होता है। ये भाषा रूप ही उनकी सृजनात्मक अभिव्यक्ति के प्रभावशाली भाषा रूप हो सकते हैं।” हालांकि फीजी में अंग्रेजी और मानक हिंदी में साहित्य सृजन तो प्रारंभिक दौर से होता आ रहा किन्तु, फीजी हिंदी का साहित्य सृजन का विकास 21वीं शताब्दी के पहले दशक में प्रो. सुब्रमनी की कृति ‘डउका पुरान’ के प्रकाशन से आरंभ हुई, जो फीजी हिंदी भाषा की प्रथम औपन्यासिक कृति भी है।
साहित्यकार समाज की एक इकाई है। उनके सृजन में अपने समाज का परिवेश, अपने कटु और मधुर अनुभव तथा अपने समाज की समस्याएं अनायास ही सम्मिलित हो जाते हैं। साहित्यकार चाहे भी तो इन समस्याओं से कट कर नहीं रह सकता है। प्रो.सुब्रमनी ने ‘फीजी माँ’ में फीजी के जन-जीवन के अन्तर्जगत और बहिर्जगत की समस्याओं का पूरी सच्चाई और ईमानदारी के साथ चित्रण किया है।
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