शोर – डॉ. वंदना मुकेश ( कविता )
मैं कुछ कहती हूँ
तुम भी कुछ कहते हो।
जो मैं कहती हूँ
कुछ वैसा ही तुम भी कहते हो।
न तुम सुनते हो
न मैं सुन पाती हूँ
हम किसी को सुनना नहीं चाहते
सब बोल रहे हैं
लगातार बोल रहे हैं।
शब्द तीर से आर-पार हो रहे हैं
कुर्सी पर टिक कर
आँखों की चिक बंद कर
मैं सुनती हूँ शोर
थक गयी हूँ मैं
कभी सिर्फ सुनो
अच्छा लगेगा.
संवाद के लिये
सुनना जरूरी है |
