पुल – डॉ. वंदना मुकेश ( कविता )

पुल
उस पीढ़ी से इस पीढ़ी तक
कई पुल बनने हैं।
कुछ कदम तुम चलो,
कुछ मैं।

याद रखना,
बनाओ जब पुल तो
इनमें सरकारी सीमेंट न हो,
दीवारों में सेंध न हो।

बनाना तुम, लोहे की नींव
लगाना तुम, प्यार की सीमेंट
विश्वास की थापी से।

फिर देखना, आहिस्ता-आहिस्ता
बनेगा जो पुल ,
उसी पर से देखेंगे हम
उगते सूरज को साथ-साथ ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate This Website »