आस्था, इतिहास और विज्ञान के बीच एक जटिल संवाद
मनीष पाण्डेय ‘मनु’, नीदरलैंड्स

दुनिया के सभी धर्मों, समुदाओं और भौगोलिक क्षेत्रों के इतिहास में कुछ ना कुछ ऐसी वस्तुएँ हैं जो केवल भौतिक अवशेष नहीं बल्कि उनसे जुड़े लोगों के लिए गहन आस्था और विश्वास का प्रतिक होती हैं। ये सभी वस्तुएं विज्ञान की दृष्टि में जिज्ञासा का विषय तो होती ही हैं साथ ही कभी-कभी विवाद और चर्चा का विषय भी बन जाती हैं। ऐसी ही एक चर्चा इन दिनों ईसाई धार्मिक आस्था से जुड़े एक विशेष वस्तु “श्राउड ऑफ टूरिन” के विषय में हो रही है जिसे मान्यताओं के अनुसार सीधे इसा मसीह से जोड़ा जाता है। श्राउड एक ऐसा रहस्यमय वस्त्र है जिसने सदियों से वैज्ञानिकों, इतिहासकारों और धार्मिक समुदायों को एक साथ आकर्षित किया है। “श्राउड ऑफ टूरिन” को “होली श्राउड” के नाम से भी जाता है और वह लिनेन का एक लंबा कपड़ा है जिस पर एक मानव आकृति की धुंधली छवि दिखाई देती है। यह कपड़ा इटली के ट्यूरिन शहर के कैथेड्रल में संरक्षित है। कपड़े की लंबाई लगभग 14 फुट 5 इंच और चौड़ाई लगभग 3 फुट 7 इंच है। इस कपड़े पर किसी ऐसे व्यक्ति के आगे और पीछे के शरीर की आकृति उभरती है जिसे शरीर पर घावों के निशान बाइबिल में वर्णित क्रूस पर चढ़ाए जाने की घटनाओं से मेल खाते हैं जिसके आधार पर अनेक यीशुइयों धर्मावलम्बी इसे यीशु मसीह का कफन मानते हैं और पवित्र अवशेष के रूप में स्वीकार करते हैं। हालाँकि वैज्ञानिक समुदाय इसे एक ऐतिहासिक या कलात्मक वस्तु के रूप में देखता है जिसकी वास्तविक स्रोत का अभी तक ठीक-ठीक पता नहीं लगा है क्योंकि उत्पत्ति और निर्माण की प्रक्रिया अभी तक पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो सकी है।
इसी अनिश्चितता के बीच इटली के पडुआ विश्वविद्यालय (Università degli Studi di Padova, UNIPD) के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस अध्ययन में कपड़े के रेशों से विभिन्न प्रकार के डीएनए का विश्लेषण किया गया। इस अध्ययन में यह पाया गया कि श्राउड पर मौजूद मानव डीएनए का एक बड़ा हिस्सा भारतीय उपमहाद्वीप से संबंधित है और पहली दृष्टि में यह निष्कर्ष चौंकाने वाला लगता है मानो यह कपड़ा किसी प्रकार भारत से जुड़ा हुआ हो। यही कारण है कि भारतीयों और भारतीय मूल के लोगों के बीच यह कौतूहल का विषय बन गया है। स्पष्ट बात है कि आज से सोशल मीडिया और वायरल पोस्ट के जमाने में इस तरह की खबर जंगल में आग की तरह से फैलती है और उसको दोहन भी होने लगता है। निश्चित रूप से यह रिपोर्ट “श्राउड ऑफ टूरिन” के रहस्य को और गहरा करता है लेकिन क्या यह निष्कर्ष वास्तव में उतना सीधा है जितना पहली नज़र में प्रतीत होता है?
धार्मिक प्रतीकों का इतिहास
यदि हम धार्मिक परम्पराओं की ओर देखें तो यह बात स्पष्ट है कि पवित्र अवशेषों को संरक्षित करने की परंपरा वैश्विक है। इस्लामी परंपरा में पैगंबर मुहम्मद से जुड़े कई अवशेषों का उल्लेख मिलता है। उदाहरण के लिए, तुर्की के इस्तांबुल स्थित टॉपकापी महल में उनके बाल (Sacred Hair) और वस्त्र संरक्षित होने का दावा किया जाता है। इन अवशेषों को अत्यंत सम्मान के साथ रखा जाता है और विशेष अवसरों पर ही प्रदर्शित किया जाता है। इसी प्रकार बौद्ध परंपरा में गौतम बुद्ध से जुड़े कई अवशेष जैसे श्रीलंका के कैंडी में स्थित “टूथ रेलिक” (बुद्ध के दांत), अस्थियाँ और भिक्षा पात्र जैसे अवशेष विभिन्न देशों में संरक्षित हैं। सिख धर्म में गुरु नानक और अन्य गुरुओं से जुड़े वस्त्र, हथियार और व्यक्तिगत उपयोग की वस्तुएं विभिन्न गुरुद्वारों में सुरक्षित रखी गई हैं। सनातन धर्म कितना पुराना है कि उनके देवी देवताओं का सीधा सीधा कोई अवशेष तो सुरक्षित नहीं है लेकिन कृष्ण की जन्मभूमि (कारागार) का पत्थर, राम की जन्मभूमि आदि प्रतीक विद्यमान हैं। एक अन्य उल्लेख में पुरी (ओडिशा) में स्थित भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियों के भीतर एक गुप्त, पवित्र पदार्थ होता है जिसे ‘ब्रह्म पदार्थ’ कहा जाता है। अयोध्या, चित्रकूट और नासिक जैसे कई स्थानों पर रखी पादुकाओं को प्रभु श्रीराम की पादुकाओं के रूप में पूजा जाता है। ईसाई परंपरा में भी “श्राउड ऑफ टूरिन” अकेला उदाहरण नहीं है। वेल ओफ़ वेरोनिका (Veil of Veronica) नामक एक अन्य वस्त्र का उल्लेख मिलता है जिसके ऊपर यीशु के चेहरे की छवि होने का दावा किया जाता है। इसी प्रकार ट्रू क्रॉस (True Cross) जिन पर यीशु को क्रूस पर चढ़ाया गया था उसके टुकड़े यूरोप के कई चर्चों में संरक्षित होने का दावा किया गया है।
यदि हम इन सभी उदाहरणों को एक साथ देखने पर एक महत्वपूर्ण समानता सामने आती है कि हर सभ्यता अपने महान व्यक्तित्वों से जुड़ी भौतिक वस्तुओं को संरक्षित करना चाहती है और ये वस्तुएं समय के साथ केवल “वस्तु” नहीं रहती बल्कि वे पहचान और आस्था का माध्यम बन जाती हैं।
डीएनए विश्लेषण की प्रक्रिया
सबसे पहले हम श्राउड जैसे प्राचीन वस्तुओं पर किये जाने वाली डीएनए विश्लेषण प्रक्रिया समझते हैं। डीएनए विश्लेषण से जुडी जानकारी के अनुसार यह आधुनिक आणविक जीवविज्ञान (माइक्रो बायोलॉजी) की उन्नत तकनीकों पर आधारित एक प्रक्रिया है जिसमें कई चरणों में अत्यंत सूक्ष्म स्तर पर काम किया जाता है। सबसे पहले “माइक्रो-सैंपलिंग” तकनीक के माध्यम से कपड़े के रेशों से माइक्रोस्कोपिक कण एकत्र किए जाते हैं और ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि वस्त्र को कोई क्षति ना पहुँचे। इसके बाद इन नमूनों से डीएनए को विशेष रासायनिक घोलों (lysis buffers) की सहायता से निकाला जाता है। इस प्रक्रिया में प्रयुक्त रसायन कोशिकीय संरचनाओं को तोड़कर न्यूक्लिक अम्लों को मुक्त करते हैं। यह भी जान लेना जरुरी है कि समय के समय के साथ डीएनए का विघटन होता है इसलिए इस तरह के एक प्राचीन कपड़ा में डीएनए अत्यधिक विखंडित (fragmented) और कम मात्रा में होता है इसलिए इन्हें “polymerase chain reaction” (PCR) या “next-generation sequencing” (NGS) जैसी तकनीकों का उपयोग करके इन छोटे-छोटे डीएनए टुकड़ों को कृत्रिम रूप से बढ़ाया और पढ़ा जाता है। यह एन.जी.एस प्रक्रिया ही सभी प्रकार के डीएनए परीक्षण का सबसे महत्वपूर्ण भाग है लाखों डीएनए अनुक्रमों का विश्लेषण कर सकता है। इसी प्रक्रिया के माध्यम से ही विभिन्न जैविक प्रजातियों जैसे मानव, पौधे, सूक्ष्मजीव आदि के आनुवंशिक संकेतों की पहचान संभव होती है। एक बार नमूने से डीएनए की सूचना एकत्र करने के बाद बायो-इन्फार्मेटिक्स (bioinformatics) उपकरणों की मदद से इन अनुक्रमों की तुलना वैश्विक डीएनए डेटाबेस से की जाती है ताकि उनके संभावित भौगोलिक या प्रजातीय स्रोतों का अनुमान लगाया जाता है। इसे आप एक तरह से डीएनए का गूगल सर्च कह सकते हैं जो डेटाबेस में जाकर मिलते जुलते डीएनए अनुक्रमों को खोज कर उन्हें जोड़ती है। डेटाबेस में डीएनए की भौगोलिक इतिहास आदि विवरण होता है जिसके आधार पर ही पता चलता है कि कोई वस्तु किस भौगोलिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से संबंधित है।
विश्लेषण के परिणाम समीक्षा
श्राउड पर किया गया यह कोई पहला परीक्षण नहीं है। यदि हम इसके पूर्व के वैज्ञानिक परीक्षणों पर दृष्टि डालें कई अन्य बातों का पता चलता है जिससे इस कपड़े का रहस्य और गहरा हो जाता है। सन् 1988 में इस कपड़े का रेडियो कार्बन परीक्षण किया गया था जिसमें यह निष्कर्ष निकाला गया था कि यह कपड़ा कोई दो हज़ार साल पुराना यानी यीशु के समय का नहीं हो सकता बल्कि यह तो 13वीं से 14वीं शताब्दी के बीच समय का है। यदि यह निष्कर्ष सही है, तो यह प्रश्न और जटिल हो जाता है कि क्या यह वास्तव में यीशु मसीह का कफन हो सकता है या नहीं? इसके अलावा 2015 में भी इस पर डीएनए विश्लेषण किया गया था जिसके कई नमूनों में विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों जैसे यूरोप, मध्य पूर्व और उत्तर अफ्रीका आदि के आनुवंशिक सम्बन्धों के संकेत भी मिले हैं। इसके अतिरिक्त पौधों और पशुओं के डीएनए के भी अंश पाए गए, जो इस वस्त्र के लंबे और जटिल इतिहास की ओर संकेत करते हैं।
कुछ अन्य अध्ययनों ने कपड़े पर उभरी आकृति को लेकर सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रश्न उठाए हैं कि क्या केवल किसी शरीर को कपड़े में लपेट देने मात्र से ऐसी स्पष्ट छवि बन सकती है। अब तक के वैज्ञानिक अध्ययनों से यह निष्कर्ष सामने आया है कि साधारण परिस्थितियों में ऐसा होना अत्यंत कठिन है क्योंकि न तो रक्त के धब्बे इस प्रकार व्यवस्थित रहते हैं और न ही शरीर की पूरी आकृति इतनी समान रूप से स्थानांतरित होती है। कई प्रयासों के बाद भी ऐसा दोबारा करना संभव नहीं हो सका है। इसी कारण कई वैज्ञानिक इसे किसी विशेष रासायनिक या कलात्मक प्रक्रिया का परिणाम मानते हैं। यहाँ यह भी समझना आवश्यक है कि वर्तमान में जो डीएनए जांच चर्चा में है वह कपड़े के रेशों पर मौजूद आनुवंशिक पदार्थ की है न कि उस व्यक्ति की पहचान की जिसे इसमें लपेटा गया था।
जैसा कि पहले ही उल्लेख है इस तरह की प्राचीन वस्तुओं के डीएनए के अध्ययन में रासायनिक क्षरण और अन्य डीएनए के मिश्रित (contamination) हो जाने की प्रबल संभावनाएं होती हैं इसलिए इन परिणामों को संभावित (probabilistic) परिणाम कहा जाता है ना कि निश्चित परिणाम।
भारत के साथ सम्बन्धों की सम्भावना
श्राउड से जुडी धार्मिक मान्यताओं और उसके ऊपर किये परीक्षणों के वैज्ञानिक निष्कर्षों के आधार पर हमें दोनों ही काल खण्डों पर इसके भारत से जुड़ने की संभावनाओं पर विचार विचार करना चाहिए।
यदि यह वस्त्र वास्तव में लगभग दो हज़ार वर्ष पुराना है तो हमें उस समय की वैश्विक स्थिति को भी समझना होगा। यीशु मसीह के जीवन का वह घटना येरुशलम की है जो उस समय के रोमन सम्राट टिबेरियस के अधीन यहूदिया (Judea) प्रांत का एक हिस्सा था। इतिहास के पन्नों को खंगालने पर यह तो तय है कि पहली शताब्दी ईस्वी में रोमन साम्राज्य, मध्य पूर्व और भारतीय उपमहाद्वीप के बीच आपस में व्यापारिक सम्बन्ध रहे हैं। भारत उस समय एक एकीकृत राष्ट्र नहीं था बल्कि कई शक्तिशाली राज्यों और जनपदों का एक समूह था जैसे उत्तर भारत में कुषाण साम्राज्य, पश्चिमी क्षत्रप, दक्षिण में सातवाहन वंश आदि। यह भी ज्ञात है कि भारतीय उपमहाद्वीप आदिकाल से उत्तम गुणवत्ता के मसालों, वस्त्रों और कीमती पत्थरों के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध था जिसका रोमन साम्राज्य के साथ सक्रिय व्यापार था। समुद्री मार्गों (अरब सागर और लाल सागर के रास्ते) तथा स्थल मार्गों के माध्यम से आर्थिक, सामाजिक और वैचारिक यात्रायें लगातार होती रही हैं।
यदि हम 1988 में किये गए रेडियो कार्बन परीक्षण के आधार पर इस कपड़े का काल-खंड 13वीं से 14वीं शताब्दी के बीच का मानते है तब यह देखना होगा कि उस समय भारत और विश्व की स्थिति क्या थी। 13वीं और 14वीं शताब्दी का भारत एक समृद्ध व्यापारिक और सांस्कृतिक केंद्र था। दिल्ली सल्तनत के शासन के दौरान भारत में वस्त्र उद्योग अत्यंत विकसित था और भारतीय कपड़े विश्व भर में प्रसिद्ध थे। उसी समय यूरोप में मध्यकालीन समाज विकसित हो रहा था और एशिया तथा यूरोप के बीच व्यापारिक मार्ग सक्रिय थे जिनमें सिल्क रूट तो जगत विख्यात है। समुद्री मार्गों के माध्यम से भी भारत और पश्चिमी देशों के बीच वस्तुओं का आदान-प्रदान भी होता ही था।
अतः इन दोनों कालखण्डों को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में रखने पर यह बिल्कुल संभव है कि कोई वस्त्र भारत में निर्मित हुआ हो या कि वस्त्र के निर्माण में उपयोग होने वाला धागा भारत से हो और व्यापार के माध्यम से यूरोप पहुंचा हो।
समापन
वैज्ञानिक दृष्टि से डीएनए विश्लेषण एक शक्तिशाली उपकरण है लेकिन इसकी सीमाएँ भी हैं और साक्ष्य में मिले डीएनए के प्रतिशत को भी सावधानी से समझने की आवश्यकता है। यदि किसी अध्ययन में यह कहा जाता है कि एक निश्चित प्रतिशत डीएनए किसी विशेष क्षेत्र से संबंधित है तो इसका अर्थ यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि वस्त्र वहीं बना था बल्कि केवल इतना दर्शाता है कि उस वस्तु से प्राप्त डीएनए के स्रोत उस क्षेत्र से जुड़े हो सकते हैं। श्राउड को पिछले कई सौ वर्षों में अनगिनत लोगों ने छुआ है जिनमें तीर्थयात्री, धार्मिक अधिकारी, वैज्ञानिक और संरक्षक आदि शामिल हैं। ऐसे में यह संभव है कि कपड़े पर पाए गए डीएनए के अधिकांश अंश मूल निर्माण काल के न होकर बाद में जुड़े हों। इस दृष्टि से देखा जाए तो यह कपड़ा किसी केवल किसी एक घटना विशेष से नहीं जुड़ा है बल्कि इतिहास का एक जीवित दस्तावेज बन गया है जिस पर समय-समय पर विभिन्न सभ्यताओं के निशान अंकित होते गए हैं। यही कारण है कि श्राउड के संदर्भ में कोई भी निष्कर्ष अंतिम नहीं माना जा सकता।
विशेष रूप से यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि इस डीएनए अध्ययन से यह सिद्ध नहीं होता कि यीशु मसीह कभी भारत आए थे या उनका भारत से कोई व्यक्तिगत संबंध था। कुछ लोग इसे यीशु के जीवन के गुप्त दो वर्षों के जीवन से भी जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं लेकिन इतिहास में ऐसे दावों के लिए ठोस और बहुआयामी प्रमाणों की आवश्यकता होती है जो इस मामले में उपलब्ध नहीं हैं। इस डीएनए परीक्षण से जो कुछ सामने आया है वह केवल एक वस्त्र पर पाए गए मिश्रित डीएनए का विश्लेषण है जिसकी व्याख्या अलग-अलग विद्वान् अपने अपने ढंग से कर रहे हैं।
अंततः श्राउड और अन्य धार्मिक अवशेष हमें यह सिखाते हैं कि मानव सभ्यता केवल तथ्यों और प्रमाणों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह विश्वास, परंपरा और स्मृति का भी संगम है। ये वस्तुएँ चाहे पूरी तरह प्रमाणित हों या विवादित, वे मानव समाज की उस गहरी आवश्यकता को दर्शाती हैं, जिसमें हम अपने अतीत और अपने आदर्शों से भौतिक रूप में जुड़े रहना चाहते हैं।
इस प्रकार, श्राउड का रहस्य केवल एक कपड़े का रहस्य नहीं है बल्कि यह उस वैश्विक परंपरा का हिस्सा है जिसमें मनुष्य अपने महान विभूतियों की स्मृतियों को सहेजने का प्रयास करता है फिर चाहे वह मुहम्मद साहब से जुड़े बाल हों, गौतम बुद्ध के अवशेष हों, या यीशु मसीह का कथित कफन। यही परंपरा इस रहस्य को और भी व्यापक और अर्थपूर्ण बना देती है।
अस्वीकरण:
यह आलेख मेरी मौलिक सोच के ढांचे पर विभिन्न स्रोतों से जुटाए सामग्री के आधार पर लिखा गया है। ईसाई धर्म के अनुयायी “श्राउड ऑफ टूरिन” को यीशु मसीह से जुड़ा मानते हैं और मैं इस पर किसी भी प्रकार का संदेह नहीं करता। जब बात ईश्वर और उसकी लीलाओं से जुड़ी हो तब मनुष्य की वैचारिक सीमाएं बहुत छोटी पड़ जाती हैं।
महत्वपूर्ण स्रोत:
1. https://www.shroud.com/pdfs/kearse3.pdf
2. https://pmc.ncbi.nlm.nih.gov/articles/PMC4593049
3. https://dii.unipd.it/sites/dii.unipd.it/files/MecSys04.pdf
