इट हैपंस इन इंडिया: अनोखे रिश्ते – सच्चिदानंद जोशी
इंडिगो की फ्लाइट से गौहाटी जा रहा था। सबसे आगे वाली सीट थी , विंडो के पास। फ्लाइट चलने को हुई तो साथ वाली सीट पर एक माध्यम वायीन महिला आकर बैठी। उन्हें केबिन सुपरवाइजर ने बड़े प्रेम से बैठने में मदद की और उनका सामान भी सलीके से ऊपर रख दिया। औपचारिक अभिवादन के बाद झपकी लेने की नीयत से सो गया।
जब नाश्ता देने का समय हुआ तो केबिन सुपरवाइजर ने उठाया और बड़ी आत्मीयता से चाय या कॉफी के लिए पूछा। मैने अपने लिए काफी बोली। फिर उसने साथ वाली महिला से भी आत्मीयता से उनकी रुचि पूछी। महसूस हुआ कि वो उन्हें कुछ ज़्यादा ही आत्मीयता से पूछ रही है।
जब सबको नाश्ता आदि देना हो गया तो वह फिर हमारी सीट पर आई और उन महिला से पूछने लगी कि नाश्ते में उन्हें और क्या चाहिए आदि आदि । वह भले ही असमिया में पूछ रही थी लेकिन संदर्भ से बातचीत समझ में तो आ ही रही थी। सहज ही मन में भाव आया कि इन देवी जी को इतना विशेष महत्व क्यों दिया जा रहा है। मन का भाव शायद चेहरे पर आ गया। थोड़ी ईर्ष्या भी होने लगी। उसे भांप कर वो एयर होस्टेस मुस्कुराते हुए बोली ” शी इज़ माय मदर।” उसका इतना कहना था कि मन के सारे भाव बदल गए और ईर्ष्या की जगह कौतुक ने ले ली। ” आप गौहाटी रहती हैं। ” मैने उस लड़की से पूछा। उसने उत्तर दिया ” नहीं ! मै दिल्ली में रहती हूं और ये गौहाटी में रहती हैं।” इतने संक्षिप्त संभाषण के बाद वो अपने काम में मशगूल हो गई। लेकिन इससे उन महिला से बातचीत का सिलसिला थोड़ा बढ़ा। इसी दौरान मैने पूछा ” इसके अलावा और भी बेटियां है आपकी?” तो उनका उत्तर था ” ये बेटी नहीं बहु है मेरी , लेकिन बेटी से बढ़कर है।”
मै एकदम चौंका। क्योंकि वो एयर होस्टेस इतनी आत्मीयता से अपनी माँ के बारे में बता रही थी कि बिना बताए कोई नहीं कह सकता था कि वो उसकी सास हैं।
उन महिला से बात की तो मालूम पड़ा कि उनके बेटे के विवाह को तीन साल हो गए हैं और बेटे का होटल का व्यवसाय गौहाटी में ही है। बिटिया को अपनी नौकरी के कारण घूमते रहना पड़ता है। ” फिर भी जब भी समय मिले फिर वो चाहे कुछ घंटों के लिए ही क्यों न हो, घर आ जाती है। अभी मुझे जबरदस्ती अपने साथ ले गई दिल्ली दो दिन के लिए। ” मैने देखा उनकी बात में शिकायत नहीं कौतुक था।
हमारी बातचीत का सिलसिला चल रहा था और हमारी केबिन की और एयर होस्टेस भी आकर उन महिला से आत्मीयता से मिलकर जा रही थीं। अंत में तो एक लड़की बहुत खूबसूरत सा कार्ड लेकर आई और बोली ” ये हम सबकी तरफ से दुनिया की सबसे अच्छी सास के लिए है, जो हमारी दोस्त का इतना ख्याल रखती है। ” उसने उनके साथ कार्ड देते हुए एक फोटो भी ली।
इतना होने के बाद भी ये महिला शांत और संयत बनी रही। फिर मेरी तरफ देख कर बोली ” मेरे लिए तो ये बेटी ही है। अपनी माँ का घर छोड़ कर आई है मेरे घर तो उसे माँ की कमी महसूस नहीं होनी चाहिए । है न।” अपनी बात पूरी करते हुए उनकी आँखें सजल हो आई थीं। मैने उन्हें बताया कि मेरे भी दो बेटे ही हैं और हमारे घर भी दो बेटियां ही आई हैं बहुएं नहीं।
गौहाटी एयर पोर्ट पर उतरे और हमने अपनी अपनी राह ली। लेकिन ये छोटी सी घटना बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर गई। जैसा उदाहरण उस एयर होस्टेस का है वैसे उदाहरण कई है समाज में। लेकिन उसी समाज में क्यों और कैसे त्विशा और गिरीबाला जैसे भी प्रकरण देखने को मिल जाते हैं तो अतिरेक का दूसरा छोर दिखाते हैं, और जब ऐसे कांड होते हैं तब सब बातों पर से आस्था डगमगाने लगती है।
