एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाना मात्र ही यात्रा नहीं कहलाता, बल्कि इसमें मनुष्य के अनुभवों, उसकी संवेदनाओं और दृष्टिकोण का विस्तार भी शामिल होता है। जब एक संवेदनशील रचनाकार यात्रा करता है तो वह दृश्यों को सिर्फ देखता नहीं, बल्कि उन्हें जीता है, आत्मसात करता है, उनके भीतर छिपी संस्कृति, इतिहास और मानवीय संघर्षों को महसूस करता है। इन्हीं मुखर अनुभूतियों को लिपिबद्ध करने से यात्रा-वृतांत सृजित होते हैं। फ़ाहियान, ह्वेनसांग, इब्न बतूता और मार्को पोलो की प्राचीन परंपरा का स्मरण करते हुए जब हम डॉ. आरती ‘लोकेश’ की सद्य-प्रकाशित कृति ‘विषुवत से कर्क तक’ के पन्ने पलटते हैं, तो यह अनुभूति होती है कि यात्रा-साहित्य आज भी उतना ही सजीव है जितना सदियों पहले था।
डॉ. आरती ‘लोकेश’ हिंदी साहित्य जगत की एक सशक्त और बहुआयामी हस्ताक्षर हैं जिनकी लेखनी में विविधता और गहराई का अद्भुत संगम है। इसका प्रमाण हैं उनकी अब तक की दो दर्जन से अधिक कृतियाँ, जिनमें उपन्यास, कविता-संग्रह, कहानी-संग्रह, शोध-ग्रंथ, यात्रा-वृत्तांत और संपादित पुस्तकें सम्मिलित हैं। एक संपादक, समीक्षक और मुखर वक्ता के रूप में उनका वैश्विक दृष्टिकोण इस यात्रा-वृत्तांत के पन्नों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। उल्लेखनीय है कि लेखिका ने इन यात्राओं को कालक्रम के अनुसार नहीं, बल्कि अक्षांशों के क्रम में सजाया है- विषुवत से धीरे-धीरे कर्क की ओर। एक रचनात्मक निर्णय का परिचय देता यह क्रम पुस्तक का काव्यात्मक शीर्षक बन पड़ा है ठीक इसके चारों खंडों के उप-शीर्षकों की तरह। हिंद महासागर में बसे मॉरीशस से लेकर अटलांटिक के तट पर खड़े मोरोक्को तक, मालदीव के मूँगा-द्वीपों से होते हुए नील नदी की चिर-पुरातन सभ्यता मिस्र तक की यात्राओं का यह संकलन केवल यात्रा वृत्तांत नहीं बल्कि एक संवेदनशील मन की अनुभूतियों का सांस्कृतिक दस्तावेज़ है। आरती जी का यह लेखन हिंदी यात्रा-साहित्य की उस समृद्ध परंपरा की याद दिलाता है जिसकी नींव राहुल सांकृत्यायन जैसे अन्वेषकों और अज्ञेय जैसे संवेदनशील कवियों ने रखी थी। वे उसी शोध-परक दृष्टि और काव्यात्मकता को आज के वैश्विक संदर्भों में एक नया और व्यापक फलक प्रदान करती हैं।
साहित्य की सार्थकता इसी में है कि वह पाठक के सोए हुए अनुभवों को जगा दे। डॉ. आरती की इस कृति में ‘ईख कृषि का गिरमिटिया देश – मॉरीशस’ अध्याय को पढ़ते-पढ़ते मेरे उन पलों की स्मृति-यात्रा शुरू हो गई जो मॉरीशस में मेरे तीन वर्ष के राजनयिक प्रवास के दौरान मेरे अस्तित्व का हिस्सा बने थे। याद आने लगा राम मंदिर और रामायण सेंटर, जहाँ कार्यक्रमों में आमंत्रित किए जाने पर सेंटर की अध्यक्ष डॉ. विनू अरुण जी औपचारिकता के साथ-साथ बड़े ही स्नेह और आत्मीयता से भी स्वागत करती थीं। यहाँ तक कि मेरा कार्यकाल समाप्त होने के बाद उन्होंने मेरी संपादित पुस्तक ‘मॉरीशस की साहित्यिक सुगंध’ का लोकार्पण कार्यक्रम रामायण सेंटर में बड़ी ही भव्यता के साथ किया।
इसी तरह पुस्तक में गंगा तालाब के वर्णन ने भी मन को भावुक कर दिया। मुझे याद आया हर शिवरात्रि पर भक्तों का वह अपार उत्साह और इस अवसर पर देश के प्रधानमंत्री माननीय प्रवीण जगन्नाथ जी की माता जी व भारतीय उच्चायुक्त महामहिम नंदिनी सिंग्ला जी के साथ, भारत से लाया गंगा जल का गंगा तालाब में मिलाया जाना और फिर क्रेन के ज़रिए, मंगलमहादेव की 80 फुट ऊँची मूर्ति पर जलाभिषेक करना।


लेखिका ने जब मॉरीशस के प्राकृतिक सौंदर्य का चित्रण किया, तो मेरी आँखों के सामने ब्लू बे का वह अगाध नीला विस्तार और सफ़ेद चाँदी जैसी चमकती रेत सजीव हो उठी। माहेबर्ग समुद्रतट की आबोहवा आज भी मेरे भीतर रची-बसी है। मुझे याद आई शामरेल की वह सतरंगी धरती, जो प्रकृति के किसी जादुई स्पर्श जैसी प्रतीत होती है।
परंतु मॉरीशस मेरे लिए केवल पर्यटन का केंद्र नहीं था; वह मेरी कर्मभूमि थी। विश्व हिंदी सचिवालय में की गई गंभीर बैठकें, वैश्विक स्तर पर आयोजित हिंदी व संस्कृति से जुड़े अनेकानेक कार्यक्रम, आप्रवासी घाट पर हर वर्ष 2 नवंबर को गिरमिटिया दिवस के ऐतिहासिक कार्यक्रम में शिरकत, पाम्प्लेमूसेस में 15 अगस्त को भारत के स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में ध्वजारोहण; ये सब स्मृतियाँ मुझे स्पंदित करती रहीं। इस सफ़र में मुझे उन सबकी भी याद आने लगी जिनके साथ काम के सिलिसले में भेंट, बैठकें आदि करते-करते कब उनसे घनिष्ठता हो गई, पता ही नहीं चला। ओजस्वी व्यक्तित्व की धनी माननीया उप प्रधानमंत्री व शिक्षा मंत्री श्रीमती लीलादेवी दूखुन-लछमन जी, कुशल मार्गदर्शक के रूप में प्रमुख लेखिका, शिक्षाविद् और सांस्कृतिक कार्यकर्ता व मॉरीशस भोजपुरी स्पीकिंग यूनियन की अध्यक्ष डॉ. सरिता बुद्धु जी इत्यादि। अनेक सांस्कृतिक-कूटनीतिक अनुभव इस पुस्तक को पढ़ते हुए पुनः ताज़ा हो गए।
मेरा सौभाग्य रहा कि उन्हीं दिनों डॉ. आरती के उपन्यास ‘कारागार – एक बंदिनी का अपराध और प्रेम से द्वंद्व’ को महात्मा गांधी संस्थान, मोका द्वारा ‘आप्रवासी साहित्य सृजन सम्मान’ से अलंकृत किया गया, और उस निर्णायक मंडल का अंग बनने का अवसर मुझे भी मिला। उस समय पहली बार उनकी कलम की संवेदनशीलता, गहराई और भाषाई सामर्थ्य से मेरा निकट परिचय हुआ था, और इसीलिए जब ‘विषुवत से कर्क तक’ मेरे हाथों में आई, तो मेरे लिए यह केवल एक नई पुस्तक नहीं, बल्कि उसी प्रवाहमयी लेखनी की एक और सशक्त अभिव्यक्ति का अनुभव था।
डॉ. आरती केवल पर्यटक नहीं, अनुसंधित्सु यात्री हैं। मॉरीशस की मिट्टी में गिरमिटिया इतिहास की पीड़ा को भी वे महसूस करती हैं और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की गौरवगाथा का वर्णन भी। इस ‘हिंद महासागर के स्वर्ग’ के निर्माण के पीछे छिपी सांस्कृतिक जिजीविषा को पहचानना एक मर्मज्ञ साहित्यकार का ही काम है, जिसे डॉ. आरती ने पूरी ईमानदारी से निभाया है। इसके साथ ही उनकी लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता उसकी पारदर्शिता और उसका संतुलन है। उनके वर्णनों में ग्रांड बे का बाज़ार उतना ही जीवंत है जितनी काहिरा की पिरामिड-गाथा; शामरेल की सतरंगी धरती उतनी ही चमकदार है जितनी शेफ़शॉवन की नीली गलियाँ; प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर मालदीव की लहरों का मधुर कलरव उतना ही श्रवणीय है जितना मराक्केश के ‘जेमा-अल-फेना’ की हलचल। नील नदी की लहरों के साथ इतिहास की गूँज सुनना और अलेक्जेंड्रिया की गलियों में बीते वैभव को तलाशना, पाठक को एक अलग ही संसार में ले जाता है। मोरक्को और जिब्राल्टर जलसंधि के वर्णन में अरब दुनिया की संस्कृति और ‘मगरेब स्थल’ की विशिष्टता को उन्होंने बहुत ही सूक्ष्मता से उकेरा है। वे केवल यह नहीं बतातीं कि कहाँ क्या देखें; वे यह भी बतातीं हैं कि उस स्थान की धड़कन में कौन-सा इतिहास, कौन-सा भूविज्ञान, कौन-सी लोककथा, कौन-सी आस्था और कौन-सा मानव-संघर्ष धड़क रहा है।
प्रवासी भारतीय होने के कारण उनकी यात्रा-दृष्टि और भी विशिष्ट हो जाती है। पिछले 21 वर्षों से दुबई में प्रवास करते हुए भी उन्होंने जिस तरह अपनी जड़ों और वैश्विक अनुभवों को जोड़ा है, वह काबिले-तारीफ़ है। हिंदी को विश्व के अनेक मंचों तक ले जाने वाली यह लेखिका जब किसी देश में जाती हैं, तो वहाँ की रग-रग में बसे भारतीय तत्त्व को भी पहचान लेती हैं- मिस्र के बाज़ारों में सुनाई पड़ती हिंदी फ़िल्मों की धुनें हों या मोरोक्को में बसे भांजे-भांजी का वात्सल्य। उनके लिए विश्व एक ‘विश्वग्राम’ है, जिसमें हिंदी एक सेतु-भाषा है और यह पुस्तक उसी सेतु पर एक नया स्तंभ स्थापित करती है।
पुस्तक में सम्मिलित जीवंत और रंगीन चित्र केवल दृश्यों का दस्तावेजीकरण मात्र नहीं हैं, बल्कि वे लेखिका के शब्दों को एक विशिष्ट आभा प्रदान करते हैं, जिससे पाठक स्वयं को उसी स्थान पर उपस्थित अनुभव करता है। पाठकों को अपना सहयात्री बनाकर एक सांस्कृतिक महायात्रा पर ले जाती यह पुस्तक व्यावहारिक तौर पर भी बहुत उपयोगी है। निस्संदेह, इसे पढ़कर पाठक अपनी स्वयं की यात्रा की तैयारी भी कर सकता है। यात्रा की तैयारी, योजना, उड़ानों के विकल्प, टिकटों के दाम, वीज़ा, ठहरने के होटल, स्थानीय सिम कार्ड, दिन-प्रतिदिन की योजना और अन्य आवश्यक सूचनाओं के समावेश से यह साहित्यिक कृति एक उपयोगी मार्गदर्शिका भी बन पड़ी है। यह कृति सूचनात्मकता और पठनीयता का एक दुर्लभ समन्वय है।
भाषा की दृष्टि से यह कृति अत्यंत सरल, सहज और प्रवाहमयी है। लेखिका ने जटिल ऐतिहासिक तथ्यों और सूक्ष्म भौगोलिक विवरणों को जिस कथात्मक और आत्मीय ढंग से प्रस्तुत किया है, वह सराहनीय है। उनकी शैली विवरणात्मक के साथ-साथ संवेगात्मक भी है। प्रकाशक ने भी पुस्तक के सुरुचिपूर्ण ले-आउट और पठनीय फॉन्ट्स के माध्यम से इस साहित्यिक यात्रा को पाठकों के लिए और भी सुखद बना दिया है। कवर पृष्ठ को देखकर तो उसे ही एक शीर्षक देने का मन हुआ- ‘भूगोल से संस्कृति और इतिहास से हृदय को जोड़ती एक अनुपम वैश्विक महायात्रा’।
मुझे पूर्ण विश्वास है कि ‘विषुवत से कर्क तक’ घुमक्कड़ों के बस्ते में, साहित्य-प्रेमियों की मेज़ पर और हिंदी के विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम में; तीनों ही स्थानों पर अपना अधिकार-पूर्ण स्थान बनाएगी और उन्हें भी नई यात्राओं के लिए प्रेरित करेगी- केवल बाहर की दुनिया में नहीं, बल्कि अपने भीतर की दुनिया में भी। विश्व हिंदी सचिवालय, मॉरीशस और रबींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, भोपाल को समर्पित यह कृति भारत की सांस्कृतिक कूटनीति के क्षेत्र में भी एक महत्वपूर्ण योगदान सिद्ध होगी।
डॉ. आरती ‘लोकेश’ को इस अनूठी कृति के लिए हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ! पाठकों को अग्रिम शुभयात्रा। आइए, इन पन्नों के साथ हम भी विषुवत से कर्क तक की यह सुंदर यायावरी आरंभ करें।

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