मनाली के इग्लू ( यात्रा संस्मरण) भाग – 3 : मनोज श्रीवास्तव ‘अनाम’

23 जनवरी 2021

आँख खुली तो सवेरा हो चुका था, हालांकि धूप और सूरज का नामोनिशान नहीं था। दरवाज़ा खोलते ही सर्द हवाओं से कमरा भर गया। फ्लास्क में रखा गर्म पानी बिल्कुल ठंडा हो चुका था। अन्य कमरों से तमाम साथी मॉर्निंग वॉक के लिए निकलकर मुख्य सड़क की ओर जा चुके थे। कुछ लोग सामने स्थित पार्क में चहलकदमी कर रहे थे। इक्का-दुक्का लोग नदी के किनारे टहलते हुए उसके कल-कल निनाद के संगीत में डूबे हुए थे और बहते जल की निर्मलता तथा उससे बनती-मिटती फेनिल लहरों को मंत्रमुग्ध होकर निहार रहे थे।
मैं उठकर किचन में गया और गर्म पानी लिया। फिर शालिनी को देखने गया कि वह जागी हैं या अभी कल की थकान मिटा रही हैं। वह भी जाग रही थीं, लेकिन इतनी सर्दी में वॉक पर जाने का उनका कोई इरादा नहीं था। मैंने गर्म पानी के लिए पूछा तो उन्होंने कहा, “रख दो, कुछ देर बाद पिएँगे।” मैंने दो गिलास पानी पिया और बोतल वहीं रखकर फ्रेश होने अपने कमरे में आ गया।
तब तक हल्की धूप खिल चुकी थी। बर्फ से ढकी सफेद चोटियों पर धूप की किरणें पड़ते ही पूरा पहाड़ स्वर्णाभ हो उठा। तब तक मॉर्निंग वॉक पर गए लोग भी लौट आए थे। आज चाय की केतली बाहर ही रख दी गई थी। चाय पीने के साथ ही परिचय-शिविर शुरू हुआ। परिचय के दौरान पता चला कि शीतल जी हिमाचल से हैं और आर्य महिला महाविद्यालय, पठानकोट में अंग्रेजी की प्रोफेसर हैं। वे कॉलेज की छात्राओं को ट्रिप पर लेकर आई थीं। उनके साथ उनकी छोटी बहन सुतीक्षा भी थीं।
राजस्थान की टीम में कुछ नवविवाहित जोड़े थे और अधिकांश लड़के-लड़कियाँ कोविड के बाद फिज़ा बदलने के लिए सैर पर निकले थे। इनमें कुछ अपनी शिक्षा के अंतिम पायदान पर थे तो कुछ नौकरी कर रहे थे। एक अन्य टीम छत्तीसगढ़ से थी, जिसमें एक-दो नवयुगलों को छोड़कर शेष सभी कॉलेज जाने वाले युवा थे।
राहुल मित्तल, जो कल से हमारे साथ थे, जिज्ञासु और पढ़ाकू होने के साथ-साथ प्रकृति-प्रेमी भी थे। उनके साथ युवराज और यशकरण थे। हरियाणा से विकास, दिल्ली से मैं और उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व शालिनी कर रही थीं। इसके अलावा कृति और अक्षिता उदयपुर से, रीना चित्तौड़गढ़ से तथा नेहा और उनकी कई अन्य मित्र रायपुर और महासमुंद जिलों से थीं।
परिचय से पूर्व हमारे कई साथियों को गलतफहमी थी कि हम भी कपल या बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड हैं। खैर, परिचय के दौरान यह स्पष्ट हो गया कि हम दोनों बेस्ट फ्रेंड हैं। परिचय के बाद सभी ने नाश्ता किया और फिर गर्म पानी के कुंड में स्नान के लिए निकल पड़े। वहाँ बॉयज और गर्ल्स के लिए अलग-अलग कुंड और स्नानागार की व्यवस्था थी। सबने जी भरकर गर्म पानी से स्नान का आनंद लिया। मनाली की सर्दी में गर्म पानी से स्नान करना बेहद आनंददायक था। सभी ने थकान मिटने तक स्नान किया और उसके बाद वापस कैंप ग्राउंड में आ गए।
मैंने भी कुछ देर वॉलीबॉल की प्रैक्टिस की। एक बार हमारी बॉल उछलकर व्यास की धारा में जा पहुँची, जिसे विकास भाई ने बड़ी तत्परता से निकाल लिया। इसके बाद वहाँ मौजूद सभी लोग एडवेंचर गेम्स में मशगूल हो गए। जिपलाइन, रैपलिंग, वॉलीबॉल और हाई-रोप एक्टिविटी का आनंद लेने के बाद सभी व्यास की धारा में फोटोशूट के लिए उतर गए। कोई ऊँची चट्टान पर खड़ा था, कोई नदी की धारा के साथ। आँखों पर गॉगल और चेहरे पर मुस्कान लिए सभी के मोबाइल के फ्लैश एक साथ और बारी-बारी से चमक उठे।


अब तक लगभग सभी लोग आपस में घुल-मिल चुके थे। बातचीत का सिलसिला भी चल निकला। जैसा कि पहले ज़िक्र हो चुका है, टीम में कुछ ‘लव बर्ड्स’ भी थे, इसलिए उनमें उत्साह कुछ अधिक था। मेरी बात विकास से हो रही थी। शालिनी अलाव के पास बैठकर गर्माहट महसूस कर रही थीं। जब विकास को पता चला कि हम दोनों कॉलेज मेट हैं और एक ही विषय के शिक्षक हैं, लेकिन हमारी दोस्ती कॉलेज छोड़ने के कई वर्षों बाद हुई, तो उसने शालिनी से पूछा, “मैम, आपकी शादी हो गई?”
शालिनी के ‘नहीं’ कहने पर उसने हँसते हुए कहा, “अच्छा! जब आपने सर की जॉब का पता कर लिया, तब दोस्ती की, जिससे बात आगे बढ़ सके।”
मैंने उसे बताया कि असल में शालिनी हमारी जूनियर बैच की थीं, लेकिन उनका बैचमेट हमारा कॉमन फ्रेंड था, जिसकी वजह से हमारी जान-पहचान हुई। बाद में हिंदी और उसकी रचनाशीलता के कारण हम घनिष्ठ मित्र बन गए।
बातचीत, गेम और फोटोग्राफी में कब दोपहर हो गई, कुछ पता ही नहीं चला। तब तक लंच तैयार हो चुका था और उसका बुलावा भी आ गया। सभी डाइनिंग हॉल की ओर बढ़ गए। वहाँ हमने अपनी रुचि के अनुसार खाना खाया और थोड़ी देर आराम करने के लिए कमरों में चले गए। कुछ लोगों ने बातचीत का सिलसिला जारी रखा तो कुछ फोटोग्राफी और गेम्स में व्यस्त रहे।
अभी अच्छी तरह आराम भी नहीं मिला था कि एक और पुकार हुई कि सभी लोगों को माउंटेन क्लाइंबिंग के लिए चलना है। राहुल और विकास रस्सी, ग्रिल और कांटे लेकर ग्राउंड में खड़े थे। हरजिंदर पाजी सभी को इकट्ठा करने में लगे हुए थे। आखिरकार टीम चल पड़ी।
माउंटेन क्लाइंबिंग का मेरा भी यह पहला मौका था। मैंने जूते बदले और अपना नया खरीदा हुआ नीला ट्रैकसूट पहन लिया। कैंप के किनारे-किनारे एक पगडंडी के सहारे हम ऊपर की ओर चल पड़े। आगे रास्ता संकरा और घुमावदार था, लेकिन सब एक-दूसरे का सहारा लेते हुए बढ़ते जा रहे थे। कुछ दूर जाने पर सेब के बगीचे दिखाई दिए। वहाँ कुछ तस्वीरें खींचीं और फिर आगे बढ़े, लेकिन आगे रास्ता समाप्त हो गया था। सड़क निर्माण का काम चलने के कारण जेसीबी ने खुदाई कर दी थी। ताज़ी मिट्टी कहीं से भी धँस सकती थी।
खैर, अंग्रेज सिंह और हरजिंदर पाजी के अनुभव तथा उनकी हिदायतों के सहारे हमने वह दुर्गम रास्ता पार किया और मुख्य सड़क पर आ गए। वहाँ से नीचे का नज़ारा और भी खूबसूरत दिखाई दे रहा था। एक तरफ गहरी खाई थी तो दूसरी ओर हजारों फुट ऊँचे पहाड़ चिर-मौन में खड़े प्रतीत हो रहे थे।
कुछ दूर चलने के बाद वह पहाड़ी आ गई, जिस पर क्लाइंबिंग करनी थी। कुछ लड़के पहाड़ पर चढ़ गए और खूंटे गाड़कर उनमें कांटे फँसाए तथा रस्सी नीचे की ओर गिरा दी। अब क्लाइंबिंग शुरू हुई और सबसे पहले कौन पहुँचेगा, इसकी कवायद शुरू हो गई। कई साथी बहुत उत्साहित थे। उसी समय मेरा एक विभागीय वेबिनार भी था, इसलिए मुझे अंत में क्लाइंबिंग के लिए सूचीबद्ध किया गया।
क्लाइंबिंग वाकई रोमांचक और चुनौतीपूर्ण थी। हल्की-हल्की बारिश भी हो रही थी, जिससे पत्थरों पर पकड़ बनाने में मुश्किल हो रही थी और फिसलन भी बढ़ गई थी। करीब दस लोगों ने चढ़ाई की। उसके बाद हरजिंदर पाजी ने मुझे पुकारा, “दिल्ली सर, आप आ जाओ।”
लेकिन अब अंधेरा छाने लगा था और बारिश कभी भी तेज हो सकती थी। इसलिए मैंने मना कर दिया और क्लाइंबिंग का वह अवसर हाथ से निकल गया, जिसे किसी अगली ट्रिप में आजमाने का निश्चय किया।
पहाड़ी रास्तों पर चढ़ने से अधिक मुश्किल उतरना होता है। बर्फीली हवाओं ने वैसे ही हालत खराब कर रखी थी। मैंने कुछ घास-फूस और प्लास्टिक इकट्ठा करके आग जला दी, जिससे कुछ राहत मिली। धीरे-धीरे एक-एक करके सभी लोग आग के पास आ गए। तब तक सभी नीचे आ चुके थे और अब वापस लौटने की बारी थी।
वैसे तो मुझे बारिश से कोई खास डर नहीं था, लेकिन शालिनी को भीगना नहीं था, क्योंकि उन्हें उसी देर शाम सोलंग वैली के लिए निकलना था। उनके कुछ पारिवारिक सदस्य उन्हें लेने आने वाले थे। इसलिए हम दोनों जल्दी-जल्दी कैंप की ओर चल पड़े। रास्ता जाना-पहचाना था, इसलिए हम तेज़ी से नीचे उतरते गए। अंधेरा पूरी तरह घिर चुका था और बारिश की बूँदें भी बड़ी हो गई थीं।
कुछ आगे आने पर शालिनी को लगा कि हम दूसरे रास्ते पर जा रहे हैं, लेकिन मुझे रास्ता स्पष्ट पता था। लगभग पंद्रह मिनट पैदल चलने के बाद हम कैंप पहुँच गए। हमने चाय पी और अपने कमरे में आ गए। शालिनी रजाई ओढ़कर लेट गईं और मैं चेयर पर बैठा रहा। कुछ देर बाद ठंड बढ़ गई तो मैंने अपने पैर कंबल से ढक लिए।
उस दिन मैंने शालिनी से बहुत सारी बातें कीं। इससे पहले जब भी हम मिले थे, तो परीक्षा और सेमिनार के सिलसिले में ही मुलाकात हुई थी। हमारी अधिकांश बातें रचनाशीलता और करियर के इर्द-गिर्द ही होती थीं। कभी व्यक्तिगत या पारिवारिक विषयों पर कोई बातचीत नहीं हुई थी। लेकिन उस दिन हमने एक घंटे से भी अधिक समय तक बातें कीं। कुछ बातें कहते-कहते वह भावुक हो उठीं। मैंने उनका ध्यान उन बातों से हटाकर आगे की यात्रा की ओर ले जाना उचित समझा।
मैंने पानी के लिए पूछा तो उन्होंने दो घूँट पानी पिया। मैंने उन्हें टिश्यू दिया। तभी डिनर के लिए बुलावा आ गया। उस दिन डिनर में छोले-भटूरे थे। मुझे भटूरे पसंद नहीं हैं, इसलिए बमुश्किल थोड़ा-सा खाया। फिर बोतल में पानी भरकर अपने कमरे में आया और बिस्तर ठीक करने लगा।
तभी शालिनी आईं और बोलीं, “भैया आ गए हैं, मैं जा रही हूँ।”
मैंने उनका सामान गाड़ी में रखने के लिए पूछा तो उन्होंने कहा, “वे कमरे के बाहर ही खड़े हैं। एक ही तो बैग है, उठा लेंगे।”
इतना कहकर वह चली गईं।
रिमझिम बारिश हो रही थी। बाहर घना अंधेरा था। पूस की उस रात में हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था। बाहर देखने पर बल्ब की रोशनी के अलावा कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था—न पहाड़, न सड़क, न नदी! बस बारिश का शोर था और भीतर हृदय में एक और शोर, जिसकी ध्वनि बाहर से नीरव थी।

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