नहीं रहे बल्लभ डोभाल

वे नोएडा में रहते थे। वर्ष 1930 में पौड़ी गढ़वाल में उनका जन्म हुआ था। उन्होंने लाहौर, धर्मशाला और इलाहाबाद से शिक्षा ग्रहण की। उन्होंने जीवन भर स्वतंत्र लेखन और फ्रीलांसिंग को अपना कर्मक्षेत्र बनाए रखा।
वे कभी किसी समूह या विचारधारा से बँधकर नहीं रहे। उन्होंने तीन दर्जन से अधिक पुस्तकें लिखीं। वे संस्मरणों की मानो एक जीवंत खान थे। लेकिन विधि का विधान है कि जीवन के इस पड़ाव पर उन्हें अकेले ही रहना पड़ा। उनका एक बेटा धर्मशाला में है और दूसरा दिल्ली के नजफगढ़ में रहता है।
बल्लभ डोभाल बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे आरंभ से ही यायावर प्रवृत्ति के रहे। साहित्य-सेवा के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। जहाँ लोग नौकरी पाने के लिए दूसरों से सिफारिश करवाते हैं, वहीं बल्लभ डोभाल मिली हुई नौकरी तक को ठुकराते रहे। वे जीवन भर स्वतंत्र और अपनी शर्तों पर जीते रहे।
भीड़ से अलग, लंबे कद और छरहरे शरीर के भीतर अपनी जिज्ञासाओं के संसार को समेटे बल्लभ डोभाल कभी कविता के माध्यम से अपने चिंतन को अभिव्यक्त करते रहे—
‘बुझे ये आग के शोले न जाने कब भड़क जाएँ।
हुई नाकाम-सी बाँहें न जाने कब फड़क जाएँ।’
ग्रामीण और पर्वतीय अंचल की सोहबत ने उन्हें लोकगीतों से जोड़ा और गुनगुनाना सिखाया। बाद में उनके ‘सैनिक’ तथा ‘कदम-कदम पर’ जैसे कविता-संग्रह प्रकाशित हुए। हिंदी कविता के स्वरूप पर विचार करते हुए उन्होंने हिंदी कविता को संस्कृत की प्रतिध्वनि माना, साथ ही यह भी स्वीकार किया कि उर्दू के रंग में रँगी हिंदी कविता ने अपने विशिष्ट तेवर विकसित किए हैं।
बल्लभ डोभाल का जाना साहित्य-जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उनका स्वतंत्र व्यक्तित्व, यायावर जीवन-दृष्टि, विपुल लेखन और अनुभवों से समृद्ध संस्मरण-संसार लंबे समय तक हिंदी साहित्य में उनकी उपस्थिति का अहसास कराता रहेगा।
उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।
