दिन विशेष कविता : पथिक का पाथेय – नवनीत सेमवाल
(छंद- हरिगीतिका)
गंतव्य पथ के आशावान, भाग्य सब कल्पित हैं।
श्रांत्यार्थ प्रतिज्ञाबद्ध रहना, यह स्वयं का हित है।
ज्यों कालचक्र रहता सदा ही, वेग के प्रतिकूल है।
मानस की उच्चभूमि पर, त्यों धीरता अनुकूल है।
उद्यम को होने दे धूमिल, गूढ़ रख निजी व्यथा।
ख्याति आप प्रणिपात होती, धनुर्धर अर्जुन यथा।
आलस्यार्थ सिद्धि ऐसी है, ज्यों पक्षीपथ दूर का।
करते ज्ञात-अज्ञात द्वंदी, मान सच्चे शूर का।
विचारोत्कृष्ट रख लें गर तब, अश्म बनता ईष्ट है।
होत जय-जीत दिन विशेष में, पृष्ठ रहना कष्ट है।
मिलता शशिप्रभ पैठने से, धीर यदि संकल्प है।
फल आदेश दुष्प्राप्य रहना, श्रम ही अत्यल्प है।
दिन ढले साँझ होने पर ही, अंत दैनिक वक्त का।
मासाधिकाधिक तलक टूटा, चित्त-चेतन शक्त का।
भूलोक पावन कर रही ज्यों, धूम अध्वर अग्नि की।
रक्षा हेत्वार्थिक तनया की, पंच त्यों अध्यग्नि की।
