दिन विशेष कविता में डॉ. सारिका “धीर” श्रीवास्तव की कविताएँ
आज पढ़िए डॉ. सारिका “धीर” श्रीवास्तव की कविताएँ। मूलतः भारतीय पर पिछले 26 सालों से कनाडा में रहती डॉ. सारिका ने कई नाटकों एवं फिल्मों में भी काम किया है। कविता आपके लिए प्राणवायु है। उनके शब्दों में- मेरे लिए कविता…. भावनाओं की मिट्टी में, परिस्थितियों की खाद से, जब अहसास का बीज पनपता है तो जो शब्दों का पौधा उगता है, वो ही कविता है..

१. यह काल
यह काल जैसे प्रसव पीड़ा का है..
तन और मन को झकझोरकर रख देने वाली प्रसव वेदना…
शायद कुछ नया जन्म लेने वाला है..
वो वेदना, जो अपनों ने दी…. समाज ने, वक़्त ने…
वह वेदना प्रसव वेदना सी ही…. मुझे
कलपा रही है
शरीर का रेशा-रेशा चीख रहा है
नस- नस, पोर – पोर तिड़क रहा है
ज़ेहन में हर तंतु मथ रहा है
माथे की नस तनते-तनते फटने को है
कसती, ढीली होती ऱगें
दर्द से चीत्कारती साँसें ,
मुट्ठी कसते हाथ, कसमसाता, उबलता लहू
खुली आँखों से झर-झर बहते आँसू
श्वास रुकने के डर से निकलती आहें
कुछ खोने का भय मुट्ठी जकड रहा है
कुछ छूटने का खौफ कलेजा हिला रहा है..
शरीर से अपना अंग अलग हो रहा है
इस जद्द- ओ ज़हद में मन शरीर सब सुलग रहा है…
फिर भी…..
दर्द के इस रेगिस्तान से… कुछ….
कुछ कोंपल सा फूट रहा है..
कुछ नया जनम ले रहा है…
शायद खुद का नया जन्म…
शायद पुनर्जन्म… खुद का.. खुद से मिलने के लिए
नया और कुछ बेहतर होने के लिए…
पीड़ा से निकला सुख…
प्रसव पीड़ा का उपहार… शिशु
एक नया जन्म, एक नयी संभावना, एक नया रास्ता, एक नयी मंज़िल…
एक नव प्रस्फुटित…… मैं
२. क्या ज़रूरी
क्या ज़रूरी है हम उसे बुराइयों और ग़लतियों से ही परखें
क्या ज़रूरी नहीं उसकी नेकी और अच्छाई को भी साथ ले लें
क्या ज़रूरी है हम नादानियों और नाइंसाफियों से ही उसे परखें
क्या ज़रूरी नहीं कि उसकी मासूमियत और काबिलियत भी साथ ले लें
क्या ज़रूरी है हम उसकी कठोर बातों को ही बस दिल से लगा लें
क्या ज़रूरी नहीं कि उसके बिसरे स्नेह प्यार को याद कर फिर रिश्ते बना लें
क्या ज़रूरी है हम अहम् और गुस्से में उसकी असलियत भुला दें
क्या ज़रूरी नहीं खुद और दूसरो की गलतियां माफ़ कर अपने रूठे यार को मना लें
क्या ज़रूरी है बाद मरने के ही उसकी सारी खूबी बयान करें
क्या ज़रूरी नहीं कि जीते जी उसे गले लगा लें
