कैसे कहूँ पराया तुमको

एक समान चलती हैं श्वासें
वही प्राण ऊर्जा है तुम में मुझ में
है एक समान हृदय में स्पन्दन
वही लाल रुधिर है तुम में मुझ में

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश
यही पाँच तत्व हैं तुम में मुझ में
कोशिका पुंज इस स्थूल शरीर की
वही क्रियात्मक इकाई है तुम में मुझ में

भोजन के लिए क्षुधा उदर में
जल की प्यास है तुम में, मुझ में
चमकती ललाट पर श्रम की बूंदें
वही खारा स्वेद है तुम में मुझ में

सुख:दुख में जो नयनों में छलकें
वही अश्रु हैं तुम में मुझ में
आहत हों तो अनुभूति दर्द की
वही कराहना है तुम में मुझ में

श्रुतिपुटों से होकर जाती
वही ध्वनि है तुम में मुझ में
हैं वही सात स्वर कंठ के भीतर
संगीत वही है तुम में मुझ में

उसी मूल प्रकृति से जन्मे हम सब
वही ब्रह्म है तुम में मुझ में
रूप भले ही भिन्न-भिन्न हैं
है वही चैतन्य पर तुम में मुझ में

वही नील गगन की छत है ऊपर
इसी एक धरा पर रहते हैं हम
वही माँ प्रकृति है पालन करती
इस वृहद कुटुंब के वासी हैं हम

तब कैसे कहूँ पराया तुमको
तुम मेरे निज स्वरूप ही तो हो

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-अदिति अरोरा

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