माँ अगर मैं जयचंद होता

नितीन उपाध्ये

मोनू की दादी के गाँव से शहर आने की ख़ुशी जितनी मोनू को नहीं होती थी उससे ज्यादा उसके आसपास रहने वाले विक्की, बंटी, गोलू, निक्की और मिन्नी को होती थी। एक तो मोनू की दादी गाँव से आते समय ढ़ेर सारी ताजा-ताजा मटर, बड़े-बड़े और मीठे बेर और लाल-लाल अमरुद लेकर आती थी।  साथ ही साथ देसी घी के लड्डू, खस्ता मठरी, शकरपारे, नमकीन और पिन्नी भी लेकर आती थी। ऊपर से सबको बुला बुलाकर खिलाती और साथ ही किस्से कहानियाँ भी सुनाती थी। ऐसा स्वाद और ऐसी-ऐसी मिठाइयाँ तो उनके शहर में कहीं भी नहीं मिलती थी। ठण्ड की सात दिनों की छुट्टियां हर बार नए वर्ष के समय आने वाली कड़ाके की ठण्ड और कोहरे की वजह से 15-20 दिनों की हो ही जाती थी। अब इतनी ठण्ड में जब अन्धेरा भी शाम को जल्दी ही हो जाता, तो सबको खेल के मैदान से घर जल्दी आना पड़ता था। ऐसे में सभी के लिए मोनू की दादी के पलंग के आस पास आकर अड्डा जमाने से ठाठ कोई हो ही नहीं सकता था। दादी माँ अपने कमरे में सिगड़ी जलाकर रखती और उसमें साथ में लाई हुई हरी मटर आग में सेंककर खाती भी और सबको खिलाती भी। साथ ही भुनी हुई मूंगफलियां छीलकर खाने में समय कब बीत जाता पता ही नहीं चलता था। इन खस्ता कुरकुरी मूंगफलियों के साथ हरी चटनी या दादी माँ का बनाया हुआ चटपटा चूरन बड़ा ही मजेदार लगता था और साथ में तिल और गुड़ की गजक….ओय होय होय… खाने का स्वाद ही आ जाता। पर यह सब खाने के बाद बड़ी जोर से प्यास लगती, पर दादी माँ किसी को भी पानी पीने नहीं देती थी। कहती थी तिल और मूंगफली के ऊपर पानी पियोगे तो खांसी हो जायेगी, थोड़ा रूक कर पानी पीना। दादी माँ की सभी सलाहें बड़े ही काम की होती थी। वह रात को सोने के पहले सबको हल्दी मिला हुआ दूध पीने को कहती, जिससे इस सर्दी में भी सब के गले ठीक रहते थे। 

रोज शाम को दादी माँ अपनी कहानियों की पोटली खोल देती और उसमे से चुन चुन कर किस्से कहानियाँ निकालती। रामायण, महाभारत, पंचतंत्र, ईसपनीति, अलीबाबा और चालीस चोर, विक्रमादित्य और छत्तीस पुतलियाँ और न जाने कितनी रोचक कथाएं सुनाती थी। कभी आल्हा-उदल की कहानी सुनाती, तो कभी नल दमयंती की। स्वप्न वासवदत्ता, मेघदूत, दुष्यंत शकुंतला की कहानियां इतने रोचक तरीके से सुनाती कि कहानी सुनने वाले सभी बच्चे उन्हीं कहानियों में खो जाते थे। वह सब जैसे मानों उस कहानी का कोई न कोई पात्र ही बन जाते थे। मोनू के नायक तो रोजाना बदलते थे। कभी उसे हनुमान बनना होता तो कभी कहता कि मुझे भीम बनना है। उसे गदा लेकर घूमने में बड़ा मज़ा आता था। जब से अपने घर के पीछे के राम लीला मैदान के दशहरे के मेले से वह गदा लेकर आया था, उसे अपने कंधे पर लादे-लादे फिरता था और जय श्री राम के नारे लगाने लगा था।

विक्की ने तो महाराणा प्रताप का नाम रट लिया था और अपने घर से एक बड़ा लंबा सा डंडा ले आता जिसको वह चेतक कहता था। अपने दोनों पैरों के बीच जिसे फंसाकर वह सरपट दौड़ता फिरता था। बंटी ने अपने बालों के बीच से एक लम्बी लट ढूंढ़ निकाली और उसे बांधकर स्वयं को चाणक्य घोषित कर दिया और रोजाना गोलू को कहता कि तुम मेरे शिष्य बन जाऊं, मैं तुम्हे चन्द्रगुप्त बना दूंगा। पर गोलू को कहानियां और कवितायेँ लिखने में बड़ी रूचि थी। वह कहता मैं तो गुरुदेव रविंद्र नाथ ठाकुर बनूँगा और फिर “एकला चालो” कहते हुए अकेले ही निकल पड़ता। निक्की की माँ इंदौर की थी और उसका जन्म इंदौर में हुआ था, तो बड़ी पेशोपेश में पड़ गई थी, कभी कहती कि मैं देवी अहिल्या बाई बनूँगी, जो इंदौर की बड़ी ही प्रसिद्ध महारानी थी और कभी कहती कि मैं स्वर कोकिला लता मंगेशकर बनूँगी, जिनका जन्म इंदौर में हुआ था। वैसे इन दोनों में कुछ बातें समान थी, जो निक्की के बड़े ही काम आती थी, दोनों ही सफ़ेद साडी पहनती थी, इसलिए निक्की अपनी मम्मी की केरल से खरीदी हुई सफेद रंग की सुनहरी बॉर्डर वाली साडी पहनती थी । दोनों ही शिव की बड़ी भक्त थी, तो निक्की अपने हाथों साथ में शिवजी की छोटी सी फोटो रखने लगी थी। मिन्नी का तो लक्ष्य बड़ा ही सादा था। वह कहती कि महारानी लक्ष्मीबाई का बचपन का नाम मनु था, जो उसके नाम मिन्नी से मिलता जुलता है। उसका कहना था की उसे महारानी लक्ष्मीबाई ही बनना है और दिनभर सुभद्रा कुमारी चौहान जी की कविता “खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी” गाते घूमती रहती थी।

आजकल इन बच्चों के माता-पिता बड़े खुश रहने लगे थे। जब वह देखते कि उनके बच्चें पढ़ाई-लिखाई के साथ अपने देश के इतिहास से और देश के महान व्यक्तियों के जीवन से प्रेरणा ले रहे थे। इस बार कॉलोनी में 26 जनवरी को भारतीय गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में एक फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता का आयोजन करने का विचार किया गया था। बच्चों की तैयारी देखकर इस बार फैंसी ड्रेस के लिए विषय रखा गया था “भारत की महान विभूतियाँ”। जब से इस प्रतियोगिता की घोषणा हुई थी सभी बच्चों ने अपने-अपने नायकों के नाम लिखकर अपने आवेदन-पत्र जमा करवा दिए थे। पर मोनू ने अपना आवेदन-पत्र जमा नहीं करवाया था। दादी ने शाम को मोनू को बुलाकर पूछा “मोनू तुमने इतिहास के किस चरित्र का अभिनय करने का विचार किया हैं? उसका नाम तुम्हारे पिताजी को बताना पडेगा जिससे वह समय पर तुम्हारे लिए ड्रेस आदि की व्यवस्था कर सकेंगे।”

तब मोनू ने कहा की “दादी मैं जयचंद बनना चाहता हूँ।” मोनू की यह बात उसके दादा जी ने सुनी तो वह बोले” अरे मोनू कल तक तो तुम हनुमान या भीम बनना चाहते थे? पर आज अचानक क्या हो गया? अरे बनना ही तो महाराणा प्रताप बनो, पृथ्वीराज चौहान बनो, वीर शिवाजी बनो। यह क्या नया विचार लाये हो? तुम जयचंद के चरित्र के बारे में कितना जानते हो?”   

मोनू ने कहा “दादाजी, मैंने इंटरनेट पर पढ़ा है कि जयचंद्र राठौड़(1170–1194 ई.) उत्तर भारत में गाहड़वाल वंश के राजा थे। जिन्होंने गंगा के किनारे बसे कान्यकुब्ज और वाराणसी प्रदेश पर राज्य किया। उनका राज्य उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ भागों में फैला हुआ था। वह गाहड़वाल वंश के अंतिम शक्तिशाली राजा थे। विद्यापति के पुरुष-परीक्षा और पृथ्वीराज रासो जैसे स्रोतों के अनुसार, जयचंद्र ने मोहम्मद ग़ोरी को कई बार हराया था। ग़ोरी को बुलाने वाले देश द्रोही तो दूसरे ही थे, जिनके नाम पृथ्वीराज रासो में अंकित हैं। इसलिए मैं उनके चरित्र के बारे में सबको यह बात बतलाना चाहूंगा।”

इस पर उसके दादा जी ने कहा “पर बेटा लोग तो यही जानते हैं की जयचंद ने पृथीराज चौहान के विरुद्ध मोहम्मद गौरी का साथ दिया था और इसी कारण पृथीराज चौहान की हार हुई थी और इसके बाद हमारा देश विदेशी आक्रांताओं के चंगुल में फंसता गया।”

तब मोनू ने कहा “दादा जी अगर विदेशी आक्रांता हमारे भारतवर्ष पर कब्जा नहीं कर पाते तो आज कहानी कुछ और होती। हमारे देश का यही दुर्भाग्य रहा हैं कि हमारी शस्य श्यामला मातृभूमि पर जो कि इस धरती का स्वर्ग है, जहाँ हर प्रकार की धातुएँ मिलती है, हर प्रकार के मौसम आते हैं, हर प्रकार के खान पान के साधन उपलब्ध हैं, सदा से ही विदेशोयों की बुरी नज़र रही है। वह हमपर सदा ही आक्रमण करते रहे हैं पर हमने कभी भी किसी पर आक्रमण नहीं किया, बल्कि हर आने वाले का स्वागत ही किया है”। 

दादा जी ने तब कहा “चलों हम एक बार को मान लेते है कि जयचंद देशद्रोही नहीं था, पर अगर लोग इस बात को नहीं माने तो क्या करोगे, बोलो तो?”

तब मोनू ने उनसे कहा कि “मैं फिर भी जयचंद ही बनूंगा और कहूंगा कि अगर मैं जयचंद होता तो मैं कभी भी गौरी को नहीं बुलाता, भले ही मेरे पृथ्वीराज चौहान के साथ कितने भी भेदभाव क्यों न होते। मैं अपने देश के दुश्मनों के विरुद्ध लड़ने के लिए अपने देशी शत्रुओं का भी साथ देता और उनकी सहायता लेता।   

मैं सबके सामने यह गीत गाता :-

“माँ अगर मैं जयचंद होता कभी न गद्दारी करता
जन्मभूमि पर प्राण न्योछावर करने से भी न डरता
नहीं बुलाता दुश्मन को मैं पृथ्वीराज के संग लड़ता
एकता के बल के आगे दुश्मन को जाना पड़ता”

मोनू के यह विचार सुनकर उसके दादाजी और दादी जी बड़े ही प्रसन्न हो गए। दरवाजे के पीछे खड़े होकर उनकी बाते सुनने वाले उसके माता-पिता मन ही मन बड़े ही प्रसन्न हो रहे थे।  दादा जी ने कहा “तुमने बिलकुल ठीक सोचा है, हमारे इतिहास को भी सही तरीके से नहीं लिखा गया है, आज इसका सही तरीके से अध्ययन करने की आवश्यकता है और यह काम तुम जैसे नई पीढ़ी के बच्चे ही कर सकते हैं। इसके बाद सभी लोग गणतंत्र दिवस के उत्सव को मनाने की तैयारियों में जोर-शोर से जुट गए।

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