प्रेम – (कविता)
प्रेम प्रेम की यादों में डूबी स्त्री नेप्रेम की बारिश में डूबते हुए पूछा खुद सेक्या चाहती हो तुम मुझ सेबारिश सिहर सिहर गयीप्रेम के खुले आकाश में विचरती स्त्री…
हिंदी का वैश्विक मंच
प्रेम प्रेम की यादों में डूबी स्त्री नेप्रेम की बारिश में डूबते हुए पूछा खुद सेक्या चाहती हो तुम मुझ सेबारिश सिहर सिहर गयीप्रेम के खुले आकाश में विचरती स्त्री…
अकेला एक ख़ामोशी, तूफ़ान के बाद कीसाक्षी बनी चुप्पी से सराबोर दीवारेंमाथे की तनी हुई नसेंऔर आँखों की बहनें की रफ़्तारसब कुछ तहस नहस साकाश कि कोई समझ पातानितान्त अकेलापन…
शत सिरून घूमती रही मैं सारे शहर मेंमैंने देखा ओपेरा के पास लोगों का हुजूमदेख आई मैं काली झील का कोनादूर से देखा मैंने चमकते अरारात कोसफ़ेद बर्फ़ के साथ…
कुलबुलाहट सोचती हूँ कि हिस्सा बन जाऊँइस अंजाने देश कापर लोगों की अजनबी आँखेंसर्द चाबुक सी लगती हैं मेरी देह परफिर सोचती हूँ कि दरिया बन जाऊँबहती रहूँ यहाँ की…
प्रवासी आभास ख़्बाव आजकल रातों में खूब डराते हैंबर्फ़ की चादर है और हम सर्द हो जाते हैदूर तलक चुप्पी है सन्नाटा है सफ़ेद चादर कासपने है किबस ख़ामोशी से…
बौन्जाई कद्दावर वृक्ष की जड़ गमले में लगानासच-सच बतलानाकैसी चतुराई हैऔर जो ये थोड़ी-सी जमीन मेंपीपल बरगद जैसी छतनार सी पनप आई हैये तो एक औरत हैतुम कहते हो बौन्जाई…
कल फिर सुबह नई होगी दिन को ही हो गई रात-सी, लगता कालजयी होगी कविता बोली- “मत उदास हो, कल फिर सुबह नई होगी।” गली-गली कूड़ा बटोरता, देखो बचपन बेचारा…
(1) असहिष्णु चुप थी गंगा सदियों से तो बड़ी भली थी लगी बोलने जब से दुनिया है अचरज में। कितना बड़ा अनर्थ हो रहा है भूतल पर! दासी देती है…