उपमान और प्रतीक (कविता)

एक दिन झुँझलाकर बोला वो!
ये उपमान और प्रतीक
दोनों बहुरूपिया हैं
दोनों खुद के लिए नहीं जीते
औरों के काम आते हैं
फिर अलग क्यों कहलाते हैं!
कभी उपमान प्रतीक बन जाता है
कभी प्रतीक उपमान कहलाता है
ये पाला क्यों बदलते हैं
भ्रम क्यों फैलाते हैं?

मैं बोला —
पगले! बात इत्ती सी है!
कि उपमान शादीशुदा है
उसकी जिंदगी में एक उपमेय है
बस वही उसका ध्येय है!

पर प्रतीक!
वह मुक्त है, कुँवारा है
सबकी आँखों का तारा है
जब तक बँधता नहीं एक से
सबका सपना है
सबका अपना है!
जो भी ले ले साथ
उसी के लिए जीता है
उसी के लिए मरता है!
प्रतीक यही गज़ब करता है!

डॉ. अशोक बत्रा

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