औकात – स्वरांगी साने

दिवाकर लगातार प्रिया के बनाए भोजन की तारीफ़ किए जा रहे थे।

  • वाह, वाह क्या शानदार खाना बनाया है, ऐसा कोई रोज़-रोज़ खाएगा तो एकदम मोटा-तगड़ा हो जाएगा।
  • अरे, रोज़ थोड़े इतना बनता है, वो तो आज आप और पूर्णिमा खाना खाने आने वाले थे इसलिए बनाया।
  • तब भी, वाह, वाह क्या बात, बहुत बढ़िया, देखो पूर्णिमा कितना सारा बनाया है, नहीं तो हमारे यहाँ वही दाल-चावल, सब्जी-रोटी!
  • अरे भाई साहब हमारे यहाँ भी रोज़ ‘दाल-रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ’ ही होता है, बताया न वो तो आज आप लोगों को खाने पर बुलाया, इसलिए इतना बना लिया और पूर्णिमा भी अच्छा बनाती है और इतना ज़्यादा भी बनाती है। मैंने खाया है आपके यहाँ भी।

लेकिन दिवाकर तारीफ़ों के पुल बाँधे जा रहा था। थोड़ी देर बाद प्रिया को लगा कि स्थिति असहज होने लगी है। उसने पूर्णिमा से कहा बच्चों और बड़ों को बैठने दो यहाँ, तुम अंदर ही आ जाओ, खाना दुबारा गर्म कर लेते हैं।

दोनों रसोईघर में थीं, प्रिया ने गैस के चारों बर्नरों पर कड़ाही, पतीली, भगोना और तपेला रख दिया। रोटियों को हाथ से छूकर देखते हुए पूछा, इन्हें माइक्रोवेव में गर्म कर लें क्या एक बार। पूर्णिमा ने मना करते हुए कहा- देखा ‘दूसरों की थाली में घी’ कैसे ज़्यादा दिखता है।

  • छोड़ न तू भी क्या ले बैठी, मुझे पता है, तू अच्छा खाना बनाती है और मुझसे भी ज़्यादा वैराइटी में बनाती है।
  • नहीं रे, इनका हमेशा का है, किसी के यहाँ भी जाओ, ये उनके यहाँ के खाने की इतनी तारीफ़ करते हैं, कि किसी को लगेगा कि मैं कुछ बनाती ही नहीं।
  • अरे पर अब तुम्हारी शादी को इतने साल हो गए। सबको पता है तुम अच्छा खाना बनाती हो।
  • घर पर भी इनका यही हाल है, हमारे बीच दूसरी और कोई बात ही नहीं होती। ये लैपटॉप या मोबाइल पर लगे रहते हैं। उससे फ़ारिग हुए मतलब समझ लो इन्हें भूख लगी है। चाय, नाश्ता, खाना फिर शाम को चाय, नाश्ता, खाना यही करते रहो। इनकी छुट्टी मतलब मेरे लिए तो आफ़त ही होती है।
  • होती है रे, किसी किसी की आदत,छोड़ दे, बाकी तो सब अच्छा है न।
  • बाकी सब मतलब क्या, बाकी कोई बात ही नहीं होती। इनका एक ही सवाल होता है आज नाश्ते में क्या है, आज सब्जी कौन-सी बनाई और दाल ऐसी क्यों बनी? अरे किसी खाना बनाने वाली से शादी कर लेते इतना ही खाने का शौक था तो, नहीं, लेकिन लोगों के सामने खाना बनाने वाली को तो पेश नहीं कर सकते न, मिसेस शर्मा ऐसी होनी चाहिए जो मिस्टर शर्मा को सूट हो। शादी की पत्रिका में डिग्री जो छापनी थी।
  • समझ सकती हूँ लेकिन इस पीड़ा का बता क्या अंत है? जो बदल नहीं सकती उस बात के बारे में क्या सोचना?
  • अपमानजनक लगता है रे, जैसे खाना बनाने के अलावा मेरी और कोई औकात ही नहीं है। तुम जब इस सोसाइटी में नहीं आई थी तब सब मुझे मिसेस शर्मा ही कहते थे या आरती की मम्मी, जैसे उसके अलावा मेरा अपना कोई वजूद ही न हो, वो तो तुमने यहाँ आकर सबको उनके नाम से बुलाना शुरू किया तो हमें एक-दूसरे के नाम पता चले।
  • अरे मुझे भाभीजी, दीदी, मिसेस शर्मा या आरती की मम्मी बोलना नहीं पसंद। हम सभी लगभग एक उम्र की हैं, चार-पाँच साल का फासला होगा लेकिन इस उम्र में इस फासले से क्या फ़र्क पड़ता है। नाम लेकर बुलाने से कैसी मित्रता हो जाती है। हम अपनी सहेली से मन की बात कर सकते हैं, मिससे शर्मा से थोड़ी।

प्रिया ने हँसते हुए यह बात कही लेकिन पूर्णिमा की आँखों की कोर भीग गई थी। प्रिया ने पूर्णिमा के हाथ पर हाथ रखते हुए कहा- रिलैक्स, चल बाहर ही बैठते हैं।

प्रिया ने बाहर आकर बेतरतीब कुशंस को सीधा किया, डायनिंग टेबल साफ़ की और रसोई में जाकर छोटे डोंगों में एक-एक कर सब डालने लगी। पूर्णिमा भी मदद करने लगी। डोंगे बाहर आए, कैसरोल, प्लेट्स, बाउल, गिलास और चम्मच भी। दोनों की थालियाँ लग गईं। दिवाकर ने पूछा- अरे दोनों अंदर इतनी देर क्या कर रही थीं? मुझे तो लगा खाना हो भी गया होगा।

प्रिया ने चुटकी ली- कल नाश्ता क्या बनाया जाए, इस पर चर्चा चल रही थी।

  • अरे वाह अभी डिनर खत्म भी नहीं हुआ और कल के नाश्ते की चर्चा होने लगी। हमारे यहाँ तो वही उपमा-पोहे जैसा कुछ बनेगा, है न पूर्णिमा।

पूर्णिमा ने आहत स्वर में कहा- पिछले रविवार आलू के पराठे बनाए थे, वो भूल गए।

  • अरे याद है, याद है, मैं तो ऐसे ही मज़ाक कर रहा था।

प्रिया तो जैसे इसी मौके की तलाश में थी, बोल पड़ी- आपने आज सुबह कौन-सी सब्जी खाई थी?

  • भिंडी
  • और कल सुबह
  • आलू-गोभी
  • और परसों
  • बैंगन
  • अच्छा उससे पहले
  • क्या प्रिया, अब इतना किसे याद रहता है, खाया होगा कुछ
  • क्या भाई साहब आप भी, मुझे तो लगा आपको यह भी पता होगा कि वाटरलू की लड़ाई में जाते हुए नेपोलियन ने कौन-सी सब्जी खाई थी या पानीपत की तीसरी लड़ाई से पहले सैनिकों को क्या खिलाया गया था।
  • यह सब किसे पता होता है।
  • बाकी किसी को पता हो न हो आपको पता होगा, ऐसी उम्मीद थी। आप खाने-पीने के इतने शौकीन, इतने जानकार हैं, आपसे बड़ी उम्मीद थी। प्रिया की आवाज़ कुछ तल्ख़ हो गई थी।

दिवाकर ने झेंपते हुए कहा- क्या खाने-पीने की बात नहीं करनी चाहिए। क्या बिना खाए इंसान ज़िंदा रह सकता है, क्या भोजन उसकी आवश्यकता नहीं है?

  • पर माफ़ कीजिएगा भोजन आपकी आवश्यकता भर नहीं है, ऐसा लगता है जैसे आपका सारा संसार ही खाने के इर्द-गिर्द घूमता है।
  • हाँ मुझे अच्छा खाना पसंद है और अच्छा खाना मिले तभी मैं कुछ काम कर सकता हूँ।
  • इसीलिए पूछा कि बड़ी लड़ाइयाँ लड़ने वालों ने लड़ाई से पहले क्या खाया होगा, जो बड़ी लड़ाई लड़ पाए।
  • महाराणा प्रताप तो घी की बड़ी-बड़ी कटोरियाँ पीते थे, देखना कभी संग्रहालय में जाकर, तब के बर्तन रखे हुए हैं वहाँ, क्या ग़जब का खाते थे।
  • लेकिन उन्होंने घास की रोटी भी खाई थी, यह भूल गए? उन्हें घी की कटोरियाँ पीने की वजह से नहीं याद रखा जाता, उन्होंने घास की रोटी खाना तक स्वीकार कर लिया, इसकी मिसाल दी जाती है।
  • वे बड़े लोग हैं, उनसे अपनी कैसी तुलना?
  • आप ही कह रहे थे अच्छा खाना मिले तो आप कुछ अच्छा कर सकते हैं।
  • अरे वो तो मैं ऐसे ही मज़ाक कर रहा था, पूर्णिमा भी अच्छा खाना बनाती है।
  • वो तो मैं तब से कह रही थी, वैसे पूर्णिमा खाना बनाने के अलावा और क्या करती है?
  • वो तो तुम उससे ही पूछो, बैठो आराम से होने दो तुम लोगों का खाना, हम तब तक बालकनी में खड़े रहते हैं, अच्छी हवा आ रही है।

पूर्णिमा ने राहत की साँस ली थी, जाने क्यों, यह बहस ख़त्म हुई इसलिए या प्रिया ने जो कहा इसलिए, या दिवाकर कुछ समझ सका इसलिए, क्या दिवाकर कुछ समझ पाया? पता नहीं।

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