भक्तिकाल के कवियों का राष्ट्र निर्माण में योगदान – स्वरांगी साने

राष्ट्र का निर्माण सरल कार्य नहीं है। यह व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण से भी जटिल है क्योंकि इसमें किसी एक व्यक्ति या किसी एक परिवार, समूह, समुदाय या समाज को गढ़ना नहीं होता बल्कि पूरे सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश में रचे-बसे राष्ट्र को बनाना होता है। किसी भी व्यक्ति की बात करें तो उसके व्यक्तित्व के निर्माण के प्रमुख घटक होते हैं स्नेह, दया, ममता, वात्सल्य, भक्ति, दूसरे के प्रति सख्य की भावना और इसमें नैतिकता, स्वाभिमान, प्रतिबद्धता, निष्ठा, ईमानदारी आदि दूसरे गुण जुड़ते चले जाते हैं। व्यक्तियों के समूह से ही किसी राष्ट्र का निर्माण होता है। राष्ट्र की परिकल्‌पना केवल भौगोलिक परिसीमा नहीं होती बल्कि कहीं न कहीं सांस्कृतिक जड़ें ही किसी सुदृढ़ राष्ट्र का निर्माण करती हैं। राष्ट्र के निर्माण में भी इन सभी घटकों का होना अनिवार्य है। तभी कोई राष्ट्र महान् राष्ट्र बनता है। किसी देश को महान् देश बनाने के लिए केवल आर्थिक समृद्धि या तकनीकी विकास अनिवार्य नहीं होता बल्कि सांस्कृतिक समृद्धि, स्थिरता और संप्रभुता की आवश्यकता होती है। भारत केवल कोई भू-भाग नहीं है, बल्कि जीवंत सांस्कृतिक और आध्यात्मिक राष्ट्र है, जिसका गौरवशाली अतीत रहा है।

भक्ति आंदोलन की चेतना

भारत विविधताओं से भरा देश है, जहाँ विभिन्न धर्म, जातियाँ और संस्कृतियाँ सह-अस्तित्व में हैं। मध्यकाल में जब समाज में धार्मिक कट्टरता, जातिवाद और सामाजिक असमानता का बोलबाला था, तब भक्ति आंदोलन एक नई चेतना लेकर आया। इसके प्रभाव ने भारतीय समाज को एकजुट करने का कार्य किया, जो आगे चलकर राष्ट्रवाद की भावना के साथ राष्ट्र निर्माण में महती सिद्ध हुआ। भक्ति आंदोलन का आरंभ दक्षिण भारत में हुआ और धीरे-धीरे यह उत्तर भारत में भी फैल गया। इस आंदोलन का मूल उद्देश्य था-ईश्वर की भक्ति के माध्यम से समाज में समरसता लाना। इस आंदोलन ने मंदिर, तीर्थ और कर्मकांड से हटकर ‘सच्ची भक्ति’ और ‘ईश्वर से सीधे संबंध’ पर बल दिया।

भक्तिकाल कहलाता स्वर्ण युग

भारत को कभी सोने की चिड़िया कहा जाता था लेकिन लगातार होने वाले विदेशी आक्रमणों ने उसे कंगाल कर दिया। यहाँ के रहवासी आर्थिक के साथ मानसिक और सांस्कृतिक रूप से भी जर्जर होने लगे। राष्ट्र का पुनरुत्थान जब आवश्यक हो गया तब हिंदी साहित्य में भक्तिकाल का उदय हुआ। भक्ति और राष्ट्र का संबंध गहरे सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक स्तर से जुड़ा हुआ है। भक्ति आंदोलन ने न केवल धार्मिक चेतना को जगाया, बल्कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का भी मजबूत आधार तैयार किया। भक्ति आंदोलन ने सभी धर्मों की अच्छाइयों को स्वीकार किया। यह भाव आगे चलकर भारतीय राष्ट्र की धर्मनिरपेक्षता की नींव बना। भक्तिकाल के कवियों ने भारतीय जनमानस पर सबसे अधिक और सबसे गहरी छाप छोड़ी, इतनी कि वह छाप आज भी बरकरार है। सोने की चिड़िया कहलाने वाले देश के साहित्य का भक्तिकाल स्वर्ण युग बनकर उभरा। भक्तिकाल की रचनाएँ निराश जनता को सांत्वना देने वाली हैं। आचार्य हजारी प्रसाद द्विदेवी के शब्दों में “भारतीय जनता भक्ति साहित्य के श्रवण-श्रावण से उस युग में आशान्वित होकर सांत्वना प्राप्त करती रही और आज भी उसे तृप्ति मिल रही है”।

विभिन्न कालों की गणना

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य के इतिहास को चार कालों वीरगाथा काल, भक्ति काल, रीतिकाल तथा आधुनिक काल में विभाजित किया है। वीरगाथा काल को सामान्य रूप से आदिकाल कहा जाता है। आचार्य शुक्ल ने आदिकाल को संवत 1050 से 1375 यानी 992 से 1317 ई. तक माना है। भक्तिकाल को संवत 1375 से 1700 यानी 1376 से 1642 ई. तक, रीतिकाल को संवत 1700 से 1900 या 1642 से 1842 ई. तक व आधुनिक काल को संवत 1900 के बाद या 1842 ई. से अब तक माना है। भक्तिकाल का आरंभ अधिकांश विद्वान सन् 1350 से मानते हैं किंतु आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे सन् 1375 से माना है। इस काल को भक्ति का स्वर्ण युग कहा गया है क्योंकि इस काल में कबीर, जायसी, तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई आदि कई प्रमुख संत कवि हुए।

भक्तिकाल एक सांस्कृतिक क्रांति

भक्तिकाल (14वीं से 17वीं शताब्दी) केवल धार्मिक आंदोलन नहीं था, बल्कि वह सांस्कृतिक क्रांति थी जिसने समाज को जागरूक किया और आगे चलकर राष्ट्र के पुनर्निर्माण की आधारशिला रखी। भक्तिकाल भारतीय साहित्य और समाज का आध्यात्मिक और सामाजिक आंदोलन भी था। इसमें संतों और कवियों ने ईश्वर की भक्ति के माध्यम से जाति, पंथ, और सामाजिक भेदभाव का विरोध किया। उत्तर भारत में कबीर, तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई, रहीम तो दक्षिण भारत में आलवार, नायनार, रामानुज, बसव, बंगाल में चैतन्य महाप्रभु तो सिख परंपरा में गुरु नानक देव  और महाराष्ट्र में नामदेव, ज्ञानेश्वर, तुकाराम महाराज ने हरि नाम की गर्जना की। कबीर ने कहा ‘जो घर फूँके आपना, चले हमारे साथ’। महाराष्ट्र के संत गाडगे बाबा तो हाथ में झाड़ू लेकर गाँव-मोहल्लों के घरों-गलियों के साथ लोगों के मन-मस्तिष्क से भी कूड़ा-कचरा हटाने निकल पड़े। उनके साथ कई कवियों ने साहित्य को समाज के दर्पण की तरह प्रस्तुत किया। राष्ट्रीय चेतना की कल्याणकारी परंपरा में महाराष्ट्र के संत तुकाराम, एकनाथ आदि के अभंगों ने राष्ट्र व समाज को एकजुट किया। भक्तिकाल के कवियों का राष्ट्र निर्माण में योगदान इतना विलक्षण हुआ कि उसने क्रांति की नींव रखना शुरू किया और देश में आज़ादी की चिंगारी फूँकने का काम होने लगा। आज़ादी केवल विदेशी आक्रमणकारियों से ही नहीं, बल्कि घिसे-पीटे रीति-रिवाज़ों, नकली आडंबरों, खोखली मानसिकता और दकियानूसी सोच से भी थी। आपसी वैमनस्य की जंजीरों को भक्तिकाल ने तोड़ने का काम किया। इस समय के संत कवियों ने बिना किसी अस्त्र-शस्त्र के, प्रेम की अमृत धारा से लोगों का, देश का जीवन बदल दिया। कबीर की प्रखर वाणी तो आज भी हमारी सोच पर कठोराघात करती है। भक्तिकाल के दौरान भारत छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त था। एक राष्ट्र की भावना विकसित नहीं हुई थी। भक्तिकाल अर्थात् चौदहवीं से सत्रहवीं शताब्दी तक के विभिन्न कवियों ने ऐसे साहित्य की रचना की, जिससे राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन प्रारंभ हुआ। राजनीतिक रूप से भारत के अखंड राष्ट्र होने की अवधारणा का विकास हुआ। इस काल में भारत में लगभग सभी भाषाओं में भक्ति काव्य रचा गया। भक्त कवियों ने देश के विभिन्न भागों में घूम-घूमकर ईश्वर की भक्ति का प्रचार किया एवं आडम्बरों के विरुद्ध आवाज उठाई, जिसके फलस्वरूप पूरा भारत सांस्कृतिक एकता के सूत्र में बँधने लगा।

राष्ट्रीय चेतना के निर्माण की भूमिका

यह काल भारतीय समाज में आध्यात्मिक चेतना, सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय एकता का प्रेरक बना। भक्तिकाल और राष्ट्र का निर्माण महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विषय है। अब हम यह समझने की कोशिश करते हैं कि मध्यकालीन भारत में हुए भक्ति आंदोलन ने किस प्रकार आधुनिक भारत में राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में भूमिका निभाई। हिंदी साहित्य का भक्तिकाल, मध्यकाल का प्रारंभिक काल है। यह वह काल है जो वैचारिक समृद्धि, कला वैभव के लिए जाना जाता है। इस काल में काव्य ने एक दृष्टि से नहीं, कई दृष्टियों से उत्कृष्टता पाई है। इसी आधार पर विद्वानों ने भक्तिकाल को हिंदी साहित्य का स्वर्ण काल कहा। वास्तविकता यह है कि हिंदी साहित्य का यह काल आंदोलन, प्रचार, विकास और चमत्कार का काल है। सांस्कृतिक व नैतिक दोनों दृष्टि से इस काल के कवियों की गहरी छाप जनमानस पर है। भक्ति-भाव से उन्होंने स्नेह, दया, ममता, वात्सल्य, ईश्वर के साथ जगत् के प्रति सख्य की भावना का विकास किया। लोगों को नैतिकता, स्वाभिमान, प्रतिबद्धता, निष्ठा, ईमानदारी का पाठ सरल शब्दों में समझाया। तब उत्तर भारत में यवन शासकों का दमनचक्र जारी था। खिलजी वंश के अलाउद्दीन खिलजी ने अनगिनत बार देश लूट लिया था। दक्षिण भारत में कृष्णा व तुंगभद्रा के साथ मध्य के प्रदेश पर अधिकार जमाने के लिए विजयनगर व बहमनी राज्यों में संघर्ष चल रहा था। ऐसे अनिश्चय व आतंक के वातावरण में साहित्य व धर्म को न तो राजाओं का प्रश्रय मिल पा रहा था, न आश्रय। राजनीतिक उथल-पुथल और निराशा के कारण समूचा वातावरण संघर्षमय था। जनमानस विक्षुब्ध था। राजा निराश थे। ऐसे में भारतीय जनता जहाँ से भी उन्हें सहानुभूति मिले, वहीं अपनी दृष्टि जमाए थी। अपने लिए आश्रय चाहती थी, ऐसा कोई आलंबन तलाश रही थी, जिसे पाकर वे अपने को सुरक्षित अनुभव कर सके। यवनों के आगमन के बाद जनता की ऐसी निराशाजनक प्रतिक्रिया हुई जिसका फल भक्तिकाल की धार्मिक भावना का विकास है।

जगाई एकता, समानता और राष्ट्र के प्रति निष्ठा की भावना

वीरगाथा काल के भी पहले से विदेशी मुगलों के आक्रमण का जो दौर सातवीं शती से प्रारंभ हुआ था वह भक्तिकाल में भी जारी रहा। तुर्क, पठानों व मुगलों ने आक्रमण किए। भक्तिकाल तक आते-आते भारत की परिस्थितियाँ बदल गई थीं। हिंदू राजाओं की शक्ति क्षीण हो गई थी। मुस्लिम सत्ता का प्रसार होने लगा था। ऐसी स्थिति में सभी हिंदुओं में निराशा की भावना घर कर रही थी। दक्षिण में आलवार संतों ने भक्ति का सूत्रपात किया। इसके बाद कुछ आचार्यों ने इसे आगे बढ़ाया। रामानुजाचार्य उनमें प्रमुख थे। उन्होंने दक्षिण की भक्ति धारा को उत्तर में फैलाया। यह भक्तिधारा निराश हिंदुओं के मन का सहारा बनी। इस भक्तिधारा के प्रवाह में वल्लभाचार्य, माध्वाचार्य, निम्बार्क, चैतन्य जैसे संत हुए। रामानुजाचार्य व वल्लभाचार्य ने राम व कृष्ण की भक्ति का प्रचार किया। सिद्धों व नाथों ने कर्मकांड के आंडबरों का विरोध कर निराकार ब्रह्म की उपासना पर जोर दिया लेकिन भक्ति केवल आध्यात्मिक साधना नहीं थी, बल्कि यह राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण की प्रक्रिया थी। इसने लोगों के दिलों में एकता, समानता और राष्ट्र के प्रति निष्ठा की भावना जगाई, जो भारत जैसे विविधताओं से भरे देश के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

भक्ति के प्रकार (प्राचीन भारतीय दर्शन अनुसार):

1. सगुण भक्ति: ईश्वर को एक रूप (राम, कृष्ण, शिव आदि रूप) में पूजना। इसमें विष्णु के दो अवतार राम और कृष्ण की पूजा की जाती है। राम काव्यधारा के तुलसी तो कृष्ण काव्यधारा के सूरदास और मीरा प्रमुख संत कवि माने जाते हैं। राम भक्ति में तुलसीदास के साथ स्वामी रामानंद, स्वामी अग्दास, नाभादास, ईश्वरदास और केशवदास आते हैं। जबकि कृष्ण भक्ति में वल्लभ संप्रदाय, चैतन्य संप्रदाय, निम्बार्क सम्प्रदाय, गौडीय संप्रदाय, हरिदासी संप्रदाय आते हैं। इसमें कृष्ण के बाल रूप के साथ राधा कृष्ण लीला का वर्णन अधिक मिलता है। इसी दौर में वल्लभाचार्य (1478-1530) ने पुष्टिमार्ग की स्थापना की थी। सूरदास आदि आठ कवियों में चार वल्लभाचार्य के शिष्य और चार गोस्वामी विठ्ठलनाथ के शिष्य थे। वल्लभाचार्य के शिष्य- सूरदास , कुम्भन दास, परमानंद दास, कृष्णदास तथा विट्ठलनाथ के शिष्य- गोविंददास, नंददास, छीतस्वामी,चतुर्भुजदास हैं। इन्हें अष्टसखा की संज्ञा दी गई है।

रामभक्ति काव्य की भाषा मुख्यतया अवधी है, जिसमें संस्कृत, अरबी, फारसी, ब्रज, बुंदलेखंडी, पंजाबी आदि भाषाओं के शब्द भी आए हैं। कहीं-कहीं संस्कृत और ब्रज भाषा का स्वतंत्र प्रयोग हुआ है। तुलसी ने रामचरितमानस में मंगलाचरण तथा स्तुतियाँ संस्कृत में लिखी हैं, तो विनय पत्रिका, कवितावली में ब्रज भाषा का प्रयोग हुआ है। कृष्णभक्ति में चौथी पाँचवीं शताब्दी में भागवत धर्म को राजधर्म स्वीकारा गया। संस्कृत साहित्य में कृष्ण भक्ति पहले से थी। गीतगोविंद में जयदेव ने कृष्ण भक्ति का निरूपण किया। आठवीं-नवीं शताब्दी में कुमारिल भट्ट एवं शंकराचार्य के मायावादी आंदोलन की प्रतिक्रिया स्वरूप भक्ति आंदोलन में तीव्रता आई। निम्बार्क, वल्लभ, राधावल्लभ और चैतन्य महाप्रभु के संप्रदायों ने कृष्णभक्ति आंदोलन को विशिष्ट बना दिया। कृष्णकाव्य पर वल्लभ संप्रदाय का प्रभाव रहा। सूरदास कृष्ण भक्ति के हिंदी काव्य के प्रतिनिधि कवि हुए। सूरदास ने वात्सल्य व शृंगार का वर्णन किया। सूरदास की भक्ति में साख्य भाव है। मीरा ने दाम्पत्य भाव से भक्ति की। कृष्ण काव्य की भाषा ब्रज है।

2. निर्गुण भक्ति: ईश्वर को निराकार और व्यापक चेतना के रूप में मानना (जैसे कबीर और दादू के विचार)। इसकी एक ज्ञानमार्गी शाखा है तथा दूसरी सूफियों की प्रेममार्गी शाखा है। इस संत काव्य धारा में ज्ञान मार्ग के कबीर के साथ सूफी मलिक मुहम्मद जायसी का भी नाम आता है जो प्रेममार्ग पर चलते हैं। ज्ञान मार्ग के कबीर अपने बारे में कहते हैं- ‘समि कागद छुयो नहीं,कलम गह्यौ नहीं हाथ’। रैदास (रविदास) भी अपनी अभिव्यक्ति देते हैं कि ‘कह रैदास खलास चमारा’। गुरु नानक देव, दादू दयाल, मलूक दास के साथ निर्गुण धारा के मलिक मुहम्मद जायसी, मुल्ला दाउद, कुतुबन, मंझन का नाम आता है।

भक्ति की परिभाषा:

सबसे पहले तो हमें यह समझना होगा कि भक्ति का तात्पर्य क्या होता है? किसे भक्ति कहना चाहिए? भक्ति केवल पूजा या अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह हृदय की एक स्थिति है, जिसमें व्यक्ति अपने भीतर ईश्वर को अनुभव करता है और प्रेम, दया, क्षमा, और सेवा जैसे मूल्यों को अपनाता है। इन मूल्यों का निर्वहन वह जीव उत्थान के साथ, राष्ट्र के उत्थान में भी करता है।

संस्कृत शब्द “भक्ति” मूलतः “भज्” धातु से है, जिसका अर्थ होता है- सेवा करना, प्रेम करना, या समर्पण करना। इस भाव से, भक्ति वह मार्ग है जो ईश्वर से आत्मा के मिलन की भावना को प्रकट करता है। भक्ति का अर्थ है- पूर्ण समर्पण भाव से ईश्वर या किसी उच्च सत्ता के प्रति प्रेम, श्रद्धा और निष्ठा रखना। राष्ट्र के परिप्रेक्ष्य में भी देखें तो राष्ट्र की सेवा या राष्ट्र के प्रति समर्पण होना एक तरह से राष्ट्र के प्रति भक्ति ही कही जा सकती है।

भक्ति के प्रमुख तत्व हैं:

1. श्रद्धा (आस्था): यह ईश्वर के प्रति अडिग विश्वास है। संतों का ईश्वर के प्रति दृढ़ विश्वास था, जिसे उन्होंने जन-जन तक पहुँचाया और उस काल में निराशा के भँवर में गोता लगा रहे जनमानस के मन में आशा के बीज का अंकुरण किया। उन्हें विश्वास दिलाया कि वे अकेले नहीं हैं। उन्हें आस्था का संबल प्रदान किया।

2. समर्पण: अपने अहंकार और इच्छाओं के त्याग से समर्पण का भाव जगता है। संतों के मन में किसी तरह का कोई अहंकार नहीं था। उनके मन में किसी तरह की कोई वासना, लालसा, लिप्सा नहीं थी। उस दौर में समाज छोटे-छोटे राज्यों में बँट गया था। सियासी खेल जारी था। राज्य हड़पने की लोलुपता थी। लोगों में अपनी जाति-धर्म को लेकर भी अजीब तरह का अहंकार था। संत कवियों ने जाति-पाँति, ऊँच-नीच, अमीर-गरीब के भेद को दूर करने का महती कार्य किया।

3. प्रेम: निःस्वार्थ और गहन प्रेम भावना संत कवियों की रचनाओं में भी दिखती है। संत कवि करुणा से भरे थे। वे भक्तिभाव से जब लिख रहे थे तो उनके मन में सबके प्रति दया, करुणा और प्रेम का भाव संचारित होता था। उन्होंने जन कल्याण के महत् भाव से निःस्वार्थ अपना रचना-कर्म किया। भक्ति काल से पूर्व वीर गाथा काल के अधिकांश कवियों में राजा की प्रशंसा का भाव थे। वे राज्याश्रय में राजा की प्रशंसा में लिखते थे। इसी तरह भक्ति काल के बाद आने वाले रीतिकाल के कवि भी अपने प्रश्रयदाता को लुभाने के लिए सौंदर्य की कमनीयता पर लिख रहे थे। लेकिन भक्तिकाल के कवियों को न सत्ता चाहिए थी, न किसी तरह का प्रश्रय। संत कुंभनदास, जिन्हें मुगल बादशाह अकबर के समकालीन माना जाता है, उन्हें जब अकबर ने फतेहपुर सीकरी में अपने दरबार में आने के लिए आमंत्रित किया था, तो उन्होंने इनकार कर दिया था और कहा था ‘संतन को कहाँ सीकरी सो काम’। इस वाक्यांश का अर्थ है संतों को सांसारिक चीज़ों या राजाओं की सत्ता से कोई वास्ता नहीं होता। वे अपने धार्मिक और आध्यात्मिक कार्यों में व्यस्त रहते हैं। यह वाक्यांश संतों की विरक्ति और सांसारिक चीज़ों से अलग रहने की भावना को व्यक्त करता है।

4. सेवा: भक्ति को व्यवहार में लाने का माध्यम सेवा होती है। इसे समझना हो तो संत कुंभनदास की ही पंक्ति याद आती है कि ‘आवत जात पनहिया टूटी, बिसरी गयो हरि नाम’। अर्थात् यात्रा करते समय उनकी पनहिया (जूते) टूट गई और वे भगवान् का नाम लेना भूल गए। यह वाक्यांश संतों के सांसारिक चीजों को त्यागने और भगवान् के नाम पर ध्यान केंद्रित करने के महत्व को दर्शाता है। वे सेवा को हरि उपासना मानते थे। मानव सेवा, राष्ट्र की सेवा उनके लिए ईश्वर की सेवा की तरह ही सर्वोपरि थी।

राष्ट्र निर्माण की नींव

भक्तिकाल के कवियों ने भारत के सांस्कृतिक एकीकरण में बड़ी भूमिका निभाई जो आगे चलकर राष्ट्र निर्माण की नींव बना।

 (i) सांस्कृतिक एकता का प्रसार– भक्त कवियों ने विभिन्न भाषाओं और क्षेत्रों में समान भावनाओं को जन्म दिया, जिससे राष्ट्रीय चेतना का विकास हुआ। सगुण भक्ति की धारा में उत्तर के राम, दक्षिण तक समरस हो गए। भक्तिकाल भारतीय साहित्य और समाज में आध्यात्मिक और सामाजिक आंदोलन था। इसमें संतों और कवियों ने ईश्वर की भक्ति के माध्यम से जाति, पंथ, और सामाजिक भेदभाव का विरोध किया।

 (ii) सामाजिक सुधार – जातिवाद, छुआछूत और धार्मिक पाखंड का विरोध करने वाले विचारों ने समाज सुधार आंदोलनों और आगे चलकर राष्ट्रवादी आंदोलनों को प्रेरित किया। जैसे वाराणासी में चर्मकार परिवार में जन्मे संत रविदास जिन्हें रैदास के नाम से भी जाना जाता है ने सामाजिक भेदभाव से ऊपर उठकर भक्ति मार्ग को अपनाया और समानता का संदेश दिया। संत रैदास ने लिखा ‘जाति-पाति पूछे नहीं कोई, हरि को सो हरि का होई’, अर्थात् कोई भी जाति या धर्म, किसी को ईश्वर से दूर नहीं करता है, बल्कि ईश्वर भक्ति ही मुक्ति का मार्ग है।

(iii) जनभाषा में साहित्य भाषा और साहित्य के विकास ने आम जन तक संदेश पहुँचाया, जिससे लोकजागरण संभव हुआ। भक्ति कवियों ने संस्कृत के साथ जनभाषाओं (हिंदी, मराठी, तमिल, तेलुगु आदि) में रचनाएँ कीं। फारसी, राजस्थानी और अवध-ब्रज की भाषाएँ लेखन का आधार बनीं। इससे सांस्कृतिक जागरूकता फैली, जो राष्ट्र की सांस्कृतिक एकता का आधार बनी।

(iv) स्वतंत्रता संग्राम पर प्रभाव– भक्ति ने प्रेम, करुणा, सेवा और समर्पण जैसे मूल्यों को बढ़ावा दिया, जो राष्ट्रवाद और स्वतंत्रता संग्राम के नैतिक आधार बने। गाँधी, विवेकानंद और टैगोर जैसे विचारकों ने भक्ति संतों के विचारों को सराहा और उनसे प्रेरणा ली। भक्ति संतों की समाज सुधारक भूमिका और जनजागरण ने देश को मानसिक रूप से स्वतंत्र होने की प्रेरणा दी।

राष्ट्र की परिभाषा:

राष्ट्र केवल एक भूखंड या जनसंख्या नहीं होती, बल्कि वह एक मानसिक और सांस्कृतिक अवधारणा है, जिसमें लोग साझा इतिहास, परंपराएँ, संस्कृति और उद्देश्य को साझा करते हैं। आइए अब समझते हैं राष्ट्र क्या होता है? राष्ट्र एक जीवंत भावना है जो सामूहिक पहचान, गौरव और उत्तरदायित्व को जन्म देती है। यह केवल शासन की व्यवस्था नहीं, बल्कि आत्मिक बंधन है जो लोगों को एक-दूसरे से एक साथ जोड़े रखता है। राष्ट्र का अर्थ है- एक ऐसा संगठित समाज जो सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, भाषिक, भौगोलिक और भावनात्मक एकता के आधार पर एक साथ जुड़ा होता है और जिसका एक राजनीतिक लक्ष्य होता है।

राष्ट्र के प्रमुख तत्व:

1. भौगोलिक एकता सीमित और निश्चित भू-भाग में रहने वाले लोग एक राष्ट्र के कहलाते हैं।

2. जनसांख्यिक एकता समान नागरिकता वाले लोग। वे लोग जो एकता के सूत्र में बँधे होते हैं।

3. सांस्कृतिक एकता– इसे मोटे तौर पर हम इस तरह समझ सकते हैं कि धर्म-भाषा अलग होने पर भी जहाँ के रहवासियों की परंपराएँ और मूल्य एक-समान होते हैं।

4. आर्थिक और राजनीतिक संगठन– इसके अंतर्गत जटिल-क्लिष्ट सत्तात्मक व्यवस्था और हमारा लचीला संविधान आता है।

5. राष्ट्रीय चेतना– देश के प्रति प्रेम, निष्ठा और बलिदान की भावना का विकास राष्ट्रीय चेतना को जगाता है।

राष्ट्र और राज्य में अंतर:

दो पंक्तियों में यह भी समझ लेते हैं कि राज्य और राष्ट्र में क्या अंतर है। राज्य, राजनीतिक और प्रशासनिक इकाई है, जिसकी अपनी सरकार, सीमाएँ और कानून हो सकते हैं। जबकि राष्ट्र भावना और संस्कृति की एकता को दर्शाता है। बृहत् अर्थों में यह राष्ट्रवाद, पहचान और गौरव से जुड़ा होता है। भारत की विविधता में एकता है और साथ ही साझा राष्ट्रीय भावना है।

राष्ट्र निर्माण की सतत प्रक्रिया

राष्ट्र निर्माण व्यापक और सतत प्रक्रिया है जिसमें किसी देश की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संस्थाओं का विकास और सुदृढ़ीकरण शामिल है। यह केवल भौगोलिक सीमाओं में बसे लोगों का समूह नहीं होता, बल्कि एक साझा पहचान, उद्देश्य और मूल्यों पर आधारित समाज की रचना होती है।

राष्ट्र निर्माण के मुख्य घटक:

1. शिक्षा का प्रसार: शिक्षित नागरिक राष्ट्र की रीढ़ होते हैं। शिक्षा से जागरूकता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और नागरिक कर्तव्यों की समझ विकसित होती है। संत कवियों ने जागरुकता फैलाने का महती कार्य किया। कबीर ने तो लिखा ही कि ‘पाहन पूजे हरि मिले, मैं तो पूजूँ पहार, याते तो चाकी भली, जो पीस खाए संसार’…कबीरदास ने स्प्ष्ट कहा कि अगर पत्थर (पाहन) की पूजा करने से भगवान् (हरि) मिल जाते हैं तो मैं पहाड़ (पहार) की पूजा करूँगा। कबीरदास जी का तात्पर्य है कि मूर्ति पूजा से भगवान् नहीं मिलते, बल्कि सच्ची भक्ति और कर्म से मिलते हैं।

2. आर्थिक विकास: उद्योग, कृषि, व्यापार और सेवा क्षेत्र में संतुलित विकास से रोजगार सृजित होते हैं और गरीबी में कमी आती है। कार्य की महत्ता पर कबीर ने जितना लिखा है, उतना किसी ने नहीं लिखा। उन्होंने कहा ‘माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय’, जिसका अर्थ है कि माली सौ घड़े पानी से सींचता है पर फल ऋतु आने पर ही लगता है। निष्काम कर्म करते हुए कार्यरत रहने की प्रेरणा उन्होंने तत्कालीन समाज को दी जो आज भी लागू होती है।

3. सामाजिक एकता: जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र आदि के भेदभाव को मिटाकर एक समरस समाज का निर्माण राष्ट्र निर्माण की नींव है। भक्ति संतों ने जात-पात, ऊँच-नीच, धार्मिक पाखंड का विरोध किया और सभी मनुष्यों को एक समान माना। इस सामाजिक समरसता ने राष्ट्रीय एकता की भावना को बल दिया। इसके सशक्त उदाहरण देखें तो कबीर, रविदास, तुकाराम जैसे संतों ने बिना किसी भेदभाव के मानवता को सर्वोच्च बताया।

4. लोकतांत्रिक संस्थाएँ: किसी मजबूत लोकतंत्र में निष्पक्ष चुनाव, स्वतंत्र न्यायपालिका, और पारदर्शी शासन अनिवार्य है। भक्तों ने निष्पक्षता, स्वतंत्रता, पारदर्शिता का खुलकर समर्थन किया। भक्ति, प्रेम और स्वतंत्रता के लिए इन संत कवियों ने निरंतर संघर्ष किया। मीराबाई को उस काल की विद्रोही रचनाकार माना जाता है। मीरा ने सामंती व्यवस्था और पुरुष प्रधान समाज के नियमों का उल्लंघन करने का ढाढस किया। उन्होंने पर्दा प्रथा, सती प्रथा, बाल विवाह का विरोध किया।

5. संविधान और कानून का पालन: कानून का राज ही राष्ट्र को स्थायित्व और नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करता है। एक राष्ट्र, एक कानून की भावना का उदय भक्तिकाल में होता दिखता है। उत्तर भारत में मुगलों की सत्ता थी। मुगलों और अफगानों में संघर्ष चल रहा था। दिल्ली पर तुगलक वंश, लोधी वंश, बाबर, हुमायूँ, अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ बैठे थे। देश का माहौल अशांत था। वह संघर्षमय काल था। हिंदू-मुस्लिम विद्वेष था। जात-पात, छुआछूत, ऊँच-नीच बढ़ती जा रही थी। तब सबके लिए एक संविधान, एक कानून की बात कवियों ने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तरीके से की।

6. नागरिकों की भागीदारी: राष्ट्र निर्माण में प्रत्येक नागरिक की भूमिका होती है-चाहे वह मतदाता हो, शिक्षक हो, किसान हो या सैनिक। अपनी इस भूमिका का संत कवियों ने बड़ी जवाबदारी से वहन किया। 15वीं शताब्दी तक हिंदू मुस्लिम सामंजस्य बढ़ाने में संतों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

7. संस्कृति और विरासत का संरक्षण: राजनीतिक शक्ति मुगलों के हाथ में थी, इसलिए हिंदुओं की स्थिति बिगड़ती जा रही थी, धार्मिक कट्टरता, रुढ़िवाद, जातिवाद अपने पैर पसार रहा था। एक सशक्त राष्ट्र अपनी सांस्कृतिक पहचान और मूल्यों को संजोता है, जिससे नागरिकों में गर्व की भावना उत्पन्न होती है। काव्यों ने आडंबरों पर कुठराघात किया। लोगों को अच्छे-बुरे, भले-खरे का अर्थ बताया।संस्कृति के साथ परंपरा का संरक्षण संत कवियों ने किया। तब विविध धर्म और संप्रदाय तो थे लेकिन उनमें समन्वय का अभाव था। वैष्णव धर्म मजबूत हो रहा था। जबकि बौद्ध धर्म विकृत रूप ले चुका था। सूफी धर्म का भी विस्तार हो रहा था। शंकाराचार्य और कुमारिल भट्ट ने वैदिक हिंदू पुनरुद्धार का शंखनाद किया था। नाथ पंथ भी विकसित हो रहा था। नाथ पंथ में गोरखनाथ का नाथ संप्रदाय उल्लेखनीय है। इन संतों ने जाति, धर्म और संप्रदाय से ऊपर उठकर मानवता और प्रेम का संदेश दिया। भक्तिकालीन कवियों के सांप्रदायिक सद्भाव को रेखांकित करने के लिए हिंदू-मुस्लिम कवियों जैसे मलिक मुहम्मद जायसी, रसखान, रहीम के नाम लिए जा सकते हैं। इन कवियों ने भक्ति आंदोलन में सांप्रदायिक सद्भाव को मजबूत किया। रैदास जैसे हरिजनों ने भी भक्ति साहित्य में अपना योगदान देकर जातिप्रथा को मिटाने का संदेश दिया।

निष्कर्ष

भक्तिकाल के कवियों ने राष्ट्र निर्माण में योगदान देते हुए भारतीय समाज की चेतना को पुर्नजीवित किया। राष्ट्र निर्माण में सभी जाति-धर्मों के लोगों की समान भूमिका रही है। भक्ति काव्य इसका सच्चा उदाहरण है।

सामाजिक एकता का आधार: भक्तिकाल के कवियों ने समाज के सभी वर्गों को एक मंच पर लाया।

भाषा और संस्कृति का विकास: भक्ति संतों ने स्थानीय भाषाओं में रचनाएँ कीं, जिससे एक सांस्कृतिक एकता बनी।

धार्मिक सहिष्णुता: भक्ति संतों ने धार्मिक भेदभाव को नकारा, जिससे हिंदू-मुस्लिम एकता का मार्ग प्रशस्त हुआ।

जनजागरण: भक्ति कवियों ने जनता को जागरूक किया। भारत माता की सेवा को ‘धर्म’ की तरह प्रस्तुत किया।

अतएव हम कह सकते हैं कि भक्ति आंदोलन ने धार्मिक और सामाजिक एकता की नींव रखी। इसने भारतीयता, आत्मगौरव और समरसता को बढ़ावा दिया, जो आज भी हमारी सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न अंग है।

संदर्भ

1 भक्तिकाल से साक्षात्कार कृष्णदत्त पालीवाल

2 आचार्य रामचंद्र शुक्ल (2013) हिंदी साहित्य का इतिहास, इलाहाबाद, लोकभारतीप्रकाशन

3 कबीर दोहावली

4 तुलसी कृत रामचरित मानस

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