गुरु पूर्णिमा : मनोज श्रीवास्तव

गुरु की पूर्णिमा इसलिए नहीं कि उस दिन चन्द्रमा पूरा होता है; बल्कि इसलिए कि गुरु का कार्य ही मनुष्य के भीतर की अपूर्णता को पूर्णता में बदलना है। भारतीय परम्परा में मन (मनस्) का अधिष्ठाता चन्द्र है। चन्द्रमा की कलाएँ मन की कलाओं का रूपक हैं। अमावस्या में मन अंधकार, संशय और विखण्डन में है; शुक्ल पक्ष में वह धीरे-धीरे विकसित होता है; और पूर्णिमा में वह अपनी समस्त सम्भावना के साथ प्रकाशित होता है। गुरु उसी यात्रा का नाम है।इसीलिए गुरु पूर्णिमा वस्तुतः मन की पूर्णिमा का उत्सव है।

उपनिषदों में गुरु ज्ञान देने वाला नहीं, अज्ञान का क्षय करने वाला है। वह कोई वस्तु नहीं देता; वह आवरण हटाता है। जैसे चन्द्रमा स्वयं प्रकाश नहीं बनाता, सूर्य के प्रकाश को पूर्ण रूप से प्रतिबिम्बित करता है, वैसे ही गुरु स्वयं सत्य का निर्माता नहीं होता; वह ब्रह्मप्रकाश का निर्मल माध्यम बन जाता है। इसलिए पूर्ण चन्द्र गुरु का अत्यन्त सटीक प्रतीक है।

पूर्णिमा पर चन्द्रमा पृथ्वी से देखने वाले के लिए सूर्य के ठीक सम्मुख होता है। अर्थात् चन्द्र का सम्पूर्ण मुख सूर्य के प्रकाश में स्नात होता है। गुरु भी तब गुरु है जब उसका सम्पूर्ण व्यक्तित्व सत्य के सम्मुख खड़ा हो; उसमें कोई अंधकारमय पक्ष शेष न रह जाए। गुरु की पूर्णता अहंकार की नहीं, पूर्ण समर्पण की पूर्णता है।

योग और तन्त्र की दृष्टि से भी पूर्णिमा अत्यन्त अर्थपूर्ण है। चन्द्र नाड़ियों, रस, संवेदनशीलता और अन्तर्मन का प्रतीक है। गुरु केवल बुद्धि को शिक्षित नहीं करता; वह समूची चेतना का पुनर्गठन करता है। इसलिए गुरु का पर्व उस तिथि पर रखा गया जहाँ सम्पूर्ण मानस अपने उत्कर्ष का प्रतीक बन जाता है।

अब एक प्रश्न उठता है—गुरु अमावस्या क्यों नहीं? क्योंकि गुरु का कार्य अंधकार का स्मरण कराना नहीं, प्रकाश का अनुभव कराना है। अमावस्या साधना का आरम्भ हो सकती है, किन्तु गुरु उसका चरम है। वह यात्रा का प्रारम्भ नहीं, उसका प्रस्फुटन है। इसीलिए इस दिन को वेदव्यास की स्मृति से भी जोड़ा गया। व्यास केवल एक महाकवि नहीं थे; उन्होंने बिखरे हुए वैदिक ज्ञान को व्यवस्थित कर मानवता के लिए सुगम बनाया। उन्होंने ज्ञान को पूर्णता का रूप दिया। अतः गुरु पूर्णिमा वस्तुतः व्यास पूर्णिमा भी है। यह संयोग नहीं, गहरा सांस्कृतिक विधान है—ज्ञान का संगठन भी पूर्णिमा है।

यदि इसे और गहरे दार्शनिक स्तर पर देखें तो भारतीय दर्शन में दो पूर्णिमाएँ हैं—एक आकाश में घटती है—चन्द्र की। दूसरी मनुष्य के भीतर घटती है—चेतना की। पहली प्रकृति करती है; दूसरी गुरु कराता है।इसलिए गुरु पूर्णिमा का वास्तविक अर्थ यह नहीं कि “हम गुरु का सम्मान करें”, बल्कि यह कि हम स्वयं से पूछें—क्या मेरा मन अभी भी खण्डित है, या वह भी पूर्णिमा के चन्द्रमा की भाँति सत्य का सम्पूर्ण प्रतिबिम्ब बनने लगा है?

इसीलिए भारतीय परम्परा ने कहा—गुरु की पूर्णिमा। क्योंकि गुरु स्वयं पूर्णिमा नहीं मनाता; वह अपने शिष्य के भीतर पूर्णिमा उदित कर देता है।

गुरु पूर्णिमा एक खगोलीय घटना का आध्यात्मिक व्याकरण है। भारतीय संस्कृति का एक विशिष्ट गुण है—वह प्रकृति को न तो केवल भौतिक घटना मानती है, न ही केवल धार्मिक प्रतीक। वह उसे चेतना का व्याकरण (ग्रामर ऑफ कॉन्शसनेस) बना देती है। पूर्णिमा इसका सर्वोत्तम उदाहरण है।गुरु पूर्ण नहीं होता; वह पूर्ण करता है।संस्कृत में “गुरु” किसी व्यक्ति का नाम नहीं, एक कार्य (फंक्शन) है। वह जो “गुरुत्व” प्रदान करे—जो बिखरी हुई सत्ता को केन्द्रित कर दे।

इसलिए गुरु की महिमा उसकी विद्वत्ता में नहीं, उसकी पूर्णकारी शक्ति में है। जैसे बीज वृक्ष नहीं होता, पर वृक्ष की संभावना को पूर्ण करता है; वैसे ही गुरु स्वयं लक्ष्य नहीं, लक्ष्य तक पहुँचने की प्रक्रिया का उत्प्रेरक (कैटेलिस्ट) है। इसीलिए उसका उत्सव पूर्णिमा पर है।

अमावस्या से पूर्णिमा तक चन्द्रमा में कुछ जुड़ता हुआ दिखाई देता है।किन्तु वास्तव में कुछ जुड़ता नहीं। चन्द्रमा पहले दिन भी उतना ही पूर्ण था, अंतिम दिन भी उतना ही पूर्ण है।
केवल उसका प्रकाश क्रमशः प्रकट होता है।
यही अद्वैत वेदान्त का सिद्धान्त है।आत्मा कभी अपूर्ण नहीं होती। अज्ञान केवल उसकी अभिव्यक्ति को ढँक देता है।गुरु कुछ जोड़ता नहीं। वह केवल प्रकट करता है। इसीलिए पूर्णिमा ज्ञान की वृद्धि का नहीं, आवरण के क्षय का उत्सव है।

यह भारतीय संस्कृति का अत्यंत विनम्र रूपक है। सूर्य स्वयं प्रकाशित है। चन्द्रमा प्रकाशित नहीं है। वह प्रकाश का स्वामी नहीं; प्रकाश का साक्षी और संवाहक है। ठीक यही गुरु है।
उपनिषद् गुरु को कभी सत्य का निर्माता नहीं कहते। वह ब्रह्म का माध्यम है। उसकी महिमा इसी में है कि उसके भीतर से स्वयं का प्रकाश दिखाई ही नहीं देता। केवल सत्य दिखाई देता है। एक सच्चा गुरु चन्द्रमा की तरह होता है।
जो जितना अधिक प्रकाश देता है, उतना ही कम स्वयं दिखाई देता है।

यहाँ एक मनोवैज्ञानिक आयाम खुलता है। पूर्णता की सबसे बड़ी समस्या है कि मनुष्य स्वयं को पूर्ण समझने लगता है। इसलिए भारतीय संस्कृति ने पूर्णिमा के साथ गुरु को जोड़ा। यानी यदि पूर्णता का अनुभव हुआ है, तो उसी क्षण गुरु के चरणों में झुको। अन्यथा वही पूर्णिमा अगले ही दिन क्षयमान होने लगेगी।यह संयोग नहीं है कि पूर्णिमा के अगले दिन से कृष्ण पक्ष आरम्भ हो जाता है।
भारतीय संस्कृति मानो कहती है कि यदि पूर्णता में विनम्रता नहीं आई, तो क्षय निश्चित है।

समुद्र में सबसे ऊँचा ज्वार पूर्णिमा को आता है। यह केवल खगोल नहीं है। भारतीय मनीषा ने इसे मन के साथ जोड़ा। मन भी एक आन्तरिक समुद्र है। उसमें भी संस्कारों, भावनाओं और स्मृतियों का ज्वार उठता है। गुरु इस ज्वार को रोकता नहीं।उसे दिशा देता है। इसलिए गुरु पूर्णिमा भावनाओं के दमन का नहीं, उनके रूपान्तरण का पर्व है।

यह भी विचारणीय है कि इसी दिन वेदव्यास का स्मरण क्यों?क्योंकि व्यास ने नया ज्ञान नहीं बनाया। उन्होंने बिखरे हुए ज्ञान को व्यवस्थित किया। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद—ज्ञान पहले से था। व्यास ने उसे पूर्ण संरचना दी।अतः गुरु का अर्थ केवल ज्ञानी नहीं, संग्राहक, संयोजक और समग्र दृष्टा भी है।

अब बात अपने सबसे ऊँचे दार्शनिक शिखर पर पहुँचती है। ईशावास्य और बृहदारण्यक परम्परा का उद्घोष है कि :

पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥

यह केवल ब्रह्म का सिद्धान्त नहीं। यही गुरु का भी सिद्धान्त है। गुरु जितना देता है, उतना घटता नहीं। एक दीपक हजार दीप जलाता है। फिर भी उसका प्रकाश कम नहीं होता। यही पूर्णता है।पूर्णता वह नहीं जो संग्रह से आए।पूर्णता वह है जो बाँटने पर भी अक्षुण्ण रहे।

शायद इसलिए भारतीय परम्परा ने “गुरु पूर्णिमा” कहा, “गुरु दिवस” नहीं।”दिवस” स्मृति बन जाता। “पूर्णिमा” एक अनुभव बन जाती है। दिवस कैलेंडर में आता है। पूर्णिमा आकाश में आती है। और गुरु?वह तब आता है जब मनुष्य के भीतर भी एक चन्द्रमा उदित होने लगता है।

मुझे कभी-कभी लगता है कि “गुरु पूर्णिमा” का सबसे गहरा अर्थ यह है कि गुरु स्वयं चन्द्रमा नहीं है; वह शिष्य के भीतर चन्द्रमा का उदय है। जब तक शिष्य अपने गुरु के प्रकाश में जगत् को देखता है, वह अभी शिष्य है। किन्तु जिस दिन वही प्रकाश उसके अपने अन्तःकरण से प्रस्फुटित होने लगे, उस दिन पहली बार उसके भीतर पूर्णिमा होती है। और सम्भवतः उसी क्षण गुरु मुस्कराकर मौन हो जाता है—क्योंकि उसका कार्य पूर्ण हो चुका होता है।

पश्चिम की अधिकांश बौद्धिक परम्पराओं में आदर्श “सूर्य” है—स्वयं प्रकाशित, स्वयं प्रमाण, स्वयं केन्द्र। भारतीय परम्परा का आदर्श “चन्द्र” है—जो स्वयं नहीं चमकता, पर सम्पूर्ण आकाश को प्रकाशित कर देता है। यह अन्तर केवल खगोल का नहीं, ज्ञानमीमांसा (एपिस्टेमोलॉजी) का है। सूर्य का प्रकाश प्रत्यक्ष है। चन्द्रमा का प्रकाश परावर्तित है। भारतीय गुरु भी ज्ञान का स्वामी नहीं, ज्ञान का प्रतिबिम्ब है। उपनिषद् कभी यह नहीं कहते कि गुरु सत्य है। वे कहते हैं कि गुरु सत्य की ओर संकेत है। गुरु जितना बड़ा होता है, उतना ही पारदर्शी होता जाता है। उसके भीतर से अन्ततः केवल सत्य दिखाई देता है। पूर्णिमा वह है जब प्रतिबिम्ब लगभग पूर्ण हो जाता है। चन्द्रमा पूर्णिमा को भी सूर्य नहीं बन जाता। वह चन्द्रमा ही रहता है। मोक्ष का अर्थ ईश्वर बन जाना नहीं। मोक्ष का अर्थ है—ईश्वर का इतना निर्मल प्रतिबिम्ब बन जाना कि बीच में “मैं” दिखाई ही न दे। गुरु इसीलिए पूर्णिमा है।वह ब्रह्म नहीं है। किन्तु ब्रह्म उसके भीतर से बिना विकृति के दिखाई देता है।

यहीं गुरु पूर्णिमा की अद्भुत विडम्बना है। हर सत्ता स्वयं को स्थायी बनाना चाहती है। राज्य चाहता है कि नागरिक उस पर निर्भर रहें। बाज़ार चाहता है कि ग्राहक लौटते रहें। राजनीति चाहती है कि समर्थक बने रहें। यहाँ तक कि मनोविश्लेषण भी कभी-कभी रोगी को वर्षों तक विश्लेषक पर निर्भर रखता है। परन्तु भारतीय गुरु? वह अपनी सफलता इसी में देखता है कि एक दिन शिष्य को उसकी आवश्यकता ही न रहे। यह संसार की सम्भवतः एकमात्र संस्था है जिसका चरम लक्ष्य स्वयं को अप्रासंगिक (ऑब्सोलीट) बना देना है।बुद्ध ने कहा—”अप्प दीपो भव”।अर्थात् अन्ततः गुरु तुम्हें अपने दीपक का उपासक नहीं, स्वयं दीपक बनाना चाहता है। इसीलिए गुरु पूर्णिमा वास्तव में गुरु के विसर्जन का उत्सव भी है।

पूर्णिमा और गुरुत्वाकर्षण के अद्भुत रूपक पर ध्यान दीजिए। गुरु शब्द की धातु “गुर्” का सम्बन्ध गुरुत्व से माना गया है। आधुनिक भौतिकी में गुरुत्व वह शक्ति है जो बिखरी हुई वस्तुओं को कक्षा प्रदान करती है।यदि गुरुत्व न हो तो ग्रह नहीं होंगे।आकाशगंगाएँ नहीं होंगी। नक्षत्र नहीं होंगे।केवल बिखरी हुई धूल होगी। मानव-चेतना भी प्रारम्भ में ऐसी ही बिखरी हुई धूल है—इच्छाएँ इधर,भय उधर,
स्मृतियाँ कहीं और, कल्पनाएँ अलग।गुरु उनमें गुरुत्व उत्पन्न करता है। तभी व्यक्तित्व पहली बार कक्षा (ऑर्बिट) में आता है। इसलिए गुरु ज्ञान देने से पहले अन्तःकरण को संगठित करता है।

कार्ल युंग ने व्यक्तित्व की परिपक्वता को इंडिविजुएशन कहा। भारतीय ऋषि उससे भी आगे जाते हैं। उनके लिए मनुष्य तब पूर्ण नहीं होता जब वह स्वयं बन जाए। वह तब पूर्ण होता है जब “स्वयं” भी विलीन हो जाए। पूर्णिमा वृत्त है। वृत्त का कोई आरम्भ नहीं। कोई अन्त नहीं।गुरु का शिक्षण भी रेखीय (लिनियर) नहीं होता। वह वृत्ताकार (सर्क्युलर) है। शिष्य जहाँ से चला था, अन्ततः वहीं लौटता है।पर लौटने वाला वही नहीं रहता। इसलिए उपनिषद् कहते हैं—“यत्र तु तदस्य सर्वमात्मैवाभूत्…” अन्तिम ज्ञान कहीं पहुँचने का नहीं, अपने वास्तविक स्वरूप में लौट आने का नाम है।

पूर्णिमा को समुद्र का ज्वार सबसे ऊँचा होता है। यह दृश्य भारतीय ऋषियों से छिपा नहीं था। उन्होंने देखा—चन्द्रमा स्वयं समुद्र को छूता भी नहीं।फिर भी सम्पूर्ण समुद्र उसके आकर्षण से उठ खड़ा होता है। यही गुरु है।वह शिष्य के भीतर प्रवेश नहीं करता। केवल अपनी उपस्थिति से उसके भीतर के समुद्र को जगा देता है। महान गुरु उपदेश कम देते हैं,उपस्थिति अधिक देते हैं। उनका मौन ही ज्वार बन जाता है।

भारतीय संस्कृति ने गुरु पूर्णिमा को वर्षा ऋतु में रखा। यह केवल इसलिए नहीं कि इस समय ऋषि एक स्थान पर रहते थे। वर्षा का अर्थ है—
आकाश पृथ्वी को स्पर्श कर रहा है। मेघ समुद्र का जल लेकर पर्वतों तक पहुँच रहे हैं। जल ऊपर गया,फिर नीचे लौटा। यही ज्ञान की यात्रा है।अनुभव ऊपर उठता है,बोध बनता है, फिर करुणा के रूप में पुनः संसार पर बरसता है। गुरु वह मेघ है जो समुद्र का जल अपना नहीं कहता। वह केवल उसे बरसा देता है।

पूर्णिमा का अर्थ पूर्ण चन्द्रमा नहीं है। यह बात पहली दृष्टि में विचित्र लगेगी। पर विचार कीजिए। पूर्णिमा उस दिन का नाम नहीं जब चन्द्रमा पूर्ण हुआ। वह उस दिन का नाम है जब पृथ्वी की दृष्टि से उसका सम्पूर्ण प्रकाशित भाग दिखाई देता है। अर्थात् पूर्णिमा वस्तु की नहीं, दृष्टि की घटना है। यहीं गुरु का परम रहस्य छिपा है। आत्मा तो सदा पूर्ण थी।ब्रह्म सदा पूर्ण था। पर हमारी दृष्टि अपूर्ण थी। गुरु ब्रह्म को पूर्ण नहीं करता। वह दृष्टि को पूर्ण करता है। इसलिए गुरु पूर्णिमा चन्द्रमा की पूर्णता का पर्व नहीं, दृष्टि की पूर्णता का पर्व है। और शायद इसी कारण गुरु को प्रणाम करते समय हम उसके ज्ञान को नहीं, उसकी दृष्टि को प्रणाम करते हैं। क्योंकि ज्ञान सूचना दे सकता है; दृष्टि जगत् का पुनर्जन्म करा देती है। यही गुरु का चमत्कार है।

भारतीय परम्परा ने महापुरुषों को पूर्णिमा से जोड़ा है। गौतम बुद्ध का जीवन तीन महान घटनाओं—जन्म, संबोधि और महापरिनिर्वाण—के लिए वैशाख पूर्णिमा से सम्बद्ध माना जाता है। यह अपने आप में अद्भुत है कि एक ही तिथि को जीवन के आरम्भ, जागरण और देहावसान—तीनों का प्रतीक बना दिया गया।
वेदव्यास आषाढ़ पूर्णिमा से जुड़े हैं। यहाँ पूर्णिमा ज्ञान के संगठन की पूर्णता का प्रतीक बन जाती है। यदि बुद्ध अनुभव की पूर्णिमा हैं, तो व्यास अभिव्यक्ति की पूर्णिमा हैं। महावीर का निर्वाण दीपावली से जुड़ा है, पूर्णिमा से नहीं; इसलिए उन्हें पूर्णिमा-परम्परा में नहीं रखा गया। चैतन्य महाप्रभु का जन्म फाल्गुन पूर्णिमा पर माना जाता है। यह वही दिन है जो होली का भी पर्व है। प्रेम, रस और भक्ति का विस्फोट पूर्णिमा से जुड़ता है। हनुमान की जयंती विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न तिथियों पर मनाई जाती है; अधिकांश परम्पराएँ उन्हें पूर्णिमा से नहीं जोड़तीं। यदि पुराणों की ओर जाएँ तो दत्तात्रेय की जयंती मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर मानी जाती है। यह भी अत्यन्त अर्थपूर्ण है, क्योंकि दत्तात्रेय भारतीय परम्परा में “विश्वगुरु” की अवधारणा का मूर्त रूप हैं—जिन्होंने चौबीस गुरुओं से शिक्षा ग्रहण की। इसी प्रकार कबीर की जयंती ज्येष्ठ पूर्णिमा पर मनाई जाती है। यह भी केवल संयोग नहीं लगता। कबीर का सम्पूर्ण काव्य अज्ञान के अन्धकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर यात्रा है।

फिर एक रोचक बात सामने आती है। यदि हम भारतीय सांस्कृतिक स्मृति को देखें, तो पूर्णिमा केवल व्यक्तियों का जन्मदिन नहीं बनती; वह चेतना के प्रकारों का उत्सव बनती है। वैशाख पूर्णिमा पर बुद्ध हैं—बोध की पूर्णिमा। आषाढ़ पूर्णिमा पर व्यास हैं—ज्ञान की पूर्णिमा।फाल्गुन पूर्णिमा पर चैतन्य हैं—प्रेम की पूर्णिमा। मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर दत्तात्रेय हैं—गुरुतत्त्व की पूर्णिमा।ज्येष्ठ पूर्णिमा पर कबीर हैं—निर्भीक वाणी की पूर्णिमा।

यहीं से एक और प्रश्न जन्म लेता है, जो शायद और भी अधिक गहरा है। क्या यह केवल संयोग है कि भारतीय संस्कृति ने अपने कुछ महानतम ‘जागरण-पुरुषों’ को पूर्णिमा से जोड़ा? मेरी दृष्टि में भारतीय कालदर्शन एक अत्यन्त सूक्ष्म संकेत दे रहा है। अमावस्या उन शक्तियों का पर्व बनती है जो भीतर उतरती हैं—तप, तन्त्र, मौन, गर्भ, बीज। पूर्णिमा उन चेतनाओं का पर्व बनती है जो भीतर से बाहर फैलती हैं—ज्ञान, करुणा, प्रेम, गुरु, वाणी। इसलिए जिन व्यक्तित्वों ने मानव-चेतना को प्रकाशित किया, उन्हें सांस्कृतिक स्मृति ने सहज ही पूर्णिमा के साथ जोड़ दिया।

मुझे यह भी लगता है कि पूर्णिमा का सम्बन्ध व्यक्तित्व से अधिक परम्परा से है। बुद्ध ने संघ की स्थापना की। व्यास ने गुरु-शिष्य परम्परा को एक धुरी दी। दत्तात्रेय ने समस्त प्रकृति को गुरु बना दिया। चैतन्य ने प्रेम को सामुदायिक कीर्तन में रूपान्तरित कर दिया। इन सबकी महानता केवल व्यक्तिगत सिद्धि में नहीं है; उन्होंने अपने अनुभव को परम्परा में रूपान्तरित किया। पूर्णिमा शायद इसी रूपान्तरण का प्रतीक है। चन्द्रमा का प्रकाश केवल उसके लिए नहीं होता; वह सबके लिए फैलता है। उसी प्रकार पूर्णिमा से जुड़े महापुरुष अपने अनुभव को निजी उपलब्धि बनाकर नहीं रखते; उसे लोक का प्रकाश बना देते हैं।

यहीं मुझे गुरु पूर्णिमा का सबसे गहरा अर्थ दिखाई देता है। इस दिन हम केवल व्यास का स्मरण नहीं कर रहे होते। हम यह स्वीकार कर रहे होते हैं कि मानव सभ्यता केवल राजाओं, विजेताओं और साम्राज्यों से नहीं चलती। उसे वास्तव में आगे बढ़ाने वाले वे लोग हैं जो प्रकाश का संचय नहीं, प्रकाश का संचार करते हैं। शायद इसीलिए भारतीय संस्कृति ने ऐसे महापुरुषों के लिए पूर्णिमा चुनी—क्योंकि पूर्णिमा का चन्द्रमा अपने लिए नहीं चमकता; वह सम्पूर्ण रात्रि का हो जाता है।

गुरु पूर्णिमा को “पूर्णता” नहीं, “अपूर्णता की स्वीकृति” का पर्व भी पढ़ा जा सकता है।
मनुष्य गुरु के पास तब नहीं जाता जब उसे सब कुछ ज्ञात हो। वह तब जाता है जब उसे पहली बार अपनी अज्ञानता का बोध होता है।सुकरात ने कहा था—”मैं इतना जानता हूँ कि मैं कुछ नहीं जानता।” भारतीय परम्परा इससे एक कदम आगे जाती है। वह कहती है कि यही बोध गुरु का द्वार है। इसलिए गुरु पूर्णिमा का उत्सव वास्तव में उस क्षण का उत्सव है जब मनुष्य अपनी अपूर्णता से लड़ना बन्द कर देता है और उसे साधना का प्रारम्भ बना लेता है। विडम्बना यह है कि पूर्णिमा का पर्व उस दिन मनाया जाता है जब साधक अपनी अपूर्णता को सबसे स्पष्ट रूप से स्वीकार करता है। यही विरोधाभास उसे गहराई देता है।

एक दूसरा परिप्रेक्ष्य काल (टाइम) का है। जन्मदिन किसी व्यक्ति के समय में आगे बढ़ने का उत्सव है; गुरु पूर्णिमा समय से ऊपर उठने का। गुरु का सम्मान उसके जन्म या मृत्यु की तिथि पर नहीं किया गया। उसे एक खगोलीय चक्र से जोड़ दिया गया। इसका अर्थ है कि गुरु कोई ऐतिहासिक व्यक्ति भर नहीं है; वह एक आवर्ती सिद्धान्त (रिकरिंग प्रिंसिपल) है। प्रत्येक वर्ष पूर्णिमा लौटती है, मानो भारतीय संस्कृति कह रही हो कि गुरु का कार्य भी प्रत्येक पीढ़ी में पुनः जन्म लेता है। व्यक्ति बदलते हैं, गुरुतत्त्व नहीं।

यदि इसे भारतीय सौन्दर्यशास्त्र से देखें, तो पूर्णिमा रस की भी तिथि है। चन्द्रमा का सम्बन्ध शीतलता से है, और शीतलता का सम्बन्ध रसास्वादन से। क्रोध में मनुष्य सीख नहीं सकता, भय में भी नहीं। सीखना तभी सम्भव है जब मन में एक प्रकार की शान्त ग्रहणशीलता हो। गुरु पूर्णिमा उसी ग्रहणशीलता का पर्व है। इसलिए भारतीय परम्परा ने ज्ञान को अग्नि और गुरु को चन्द्रमा के साथ रखा। ज्ञान जलाता है; गुरु उसे सहनीय बनाता है। ज्ञान बिना करुणा के दाहक हो सकता है; गुरु उसे शीतल बना देता है।

पूर्णिमा की रात चन्द्रमा का प्रकाश इतना प्रबल होता है कि मनुष्य को यह भ्रम हो सकता है कि रात भी दिन बन गई है। परन्तु वह दिन नहीं होती। छायाएँ बनी रहती हैं, केवल उनका स्वरूप बदल जाता है। यही गुरु का सत्य है। गुरु अज्ञान को जादू की तरह समाप्त नहीं करता; वह उसके साथ हमारे सम्बन्ध को बदल देता है। मृत्यु रहती है, दुःख रहते हैं, विफलताएँ भी रहती हैं; पर उनका अर्थ बदल जाता है। इसलिए भारतीय गुरु दुःख-मुक्त संसार का वादा नहीं करता, बल्कि दुःख के पार देखने वाली दृष्टि देता है।

गुरु पूर्णिमा वस्तुतः ऋण की पूर्णिमा है। भारतीय संस्कृति तीन ऋणों की बात करती है—देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण। इनमें ऋषिऋण सबसे विचित्र है, क्योंकि इसे चुकाया नहीं जा सकता। गुरु ने जो दिया है, उसे लौटाया नहीं जा सकता; उसे केवल आगे प्रवाहित किया जा सकता है। नदी अपने उद्गम को जल वापस नहीं भेजती; वह उसी जल को खेतों, नगरों और समुद्र तक पहुँचाती है। यही गुरु-दक्षिणा का सबसे गहरा अर्थ है। गुरु को कुछ लौटाना नहीं, गुरु से प्राप्त प्रकाश को अगली चेतनाओं तक पहुँचाना। इसीलिए गुरु पूर्णिमा केवल कृतज्ञता का पर्व नहीं है; यह उत्तरदायित्व का पर्व भी है। उस दिन शिष्य अपने गुरु को प्रणाम भर नहीं करता, वह मौन में यह प्रतिज्ञा भी करता है कि जो ज्योति उसे मिली है, वह उसके साथ समाप्त नहीं होगी।

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