विशेष विमर्श में ऋचा गिरि की कविताएँ
हिंदी साहित्य, विशेषकर कविता लेखन में ऋचा गिरि जी की गहरी रुचि है। अपनी संवेदनाओं, अनुभवों और विचारों की अभिव्यक्ति के लिए वे कविता विधा को माध्यम बनाती है। उनकी रचनाएँ जानकी पुल, पाखी सहित अन्य प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं एवं साहित्यिक मंचों पर प्रकाशित हो चुकी हैं। वर्तमान में वे नोएडा में रहती हैं और स्त्री के रचनाकर्म को रचना संसार में लाती हैं।

स्त्री
सीमाएं टींसती थीं उसे
लोहे के पिंजरे के भीतर
पंख फड़फड़ाते गौरैया की तरह
हाथों में हल लिए
दिल्ली की सड़कों पर
बैठ गई थी,
क्रांति ने भी इस करवट को
लिखना चाहा था,
उस दिन,
अब उसने चुन लिया था
बनना दरियाई घोड़ा
शाहीन बाग में भी
पर खदेड़ दिया गया था उसे
और तब तक खदेड़ा गया
जब तक वह रसोई तक ना पहुंच जाए
सोच लिया था उसने
रसोई की धुंआरी को भर लेगी मुट्ठी में
और उड़ा देगी आकाश में,
चूल्हे की लपटों से सुलगा लेगी
अपने कोमल हृदय को थोड़ा
वो रखना चाहती थी
अपना हाथ
वहां जहां उसका
आधिपत्य था नैसर्गिक,
न जाने कितने
प्रकाश वर्ष से
महरूम रही होगी
और कितने प्रकाश वर्ष
लगेंगे इस मुक्ति में
क्यों बनाया देवी
मूर्तिकारों ने अक्सर
उन्हीं मूर्तियों को देवी कहकर बनाया
जो मूक रही
जिनमें आठ हाथ रहे
उस मूर्तिकार ने तो अपनी मूर्तियों के दो ही हाथ बनाए हैं
और वाणी भी दी है
पर सजीव मुखर मूर्तियां
दो हाथों वाली
चुभती ही रही इस लोक में
जैसे चुभता हो
कोई जंगली कांटा पैरों में
इन्होंने कभी नहीं चाहा था बनना देवी
क्यों बनाया इन्हें देवी?
रूपांतरित कर गई थी मुझे
उद्विग्न होकर सिल रही थी
आसमान जो फटा था
बिजली के कड़कने से उस रात
“पैसों की गर्मी है तुम्हें”
फफककर बोल रही थी,
मटमैले रूखे हाथों से
आंखों की कोरों को पोंछते हुए
इसी गर्मी के ताप से
सर्दी की ठिठुरन से
मुक्ति मिली है
इसी से खड़ी हो पाई है वह
कुछ ऊपर और थोड़ा बराबर
चूल्हे जलते हैं उसके घर के
इसी ताप से
रोटियां सिंकती हैं इसी पर
यह कुछ वैसी गर्मी लगी मुझे
जो दूर किसी टिमटिमाते
ग्रह की खिड़की से
झांकती संकल्पों को
दृढ़ करती हो,
रूपांतरित कर गई थी मुझे
यह रूपहले सिक्के,
या बुलियन की नहीं थी
द्रव्य या अशर्फियों कि भी नहीं
कदापि नहीं
वरना ग्लेशियर पिघल जाते
उस गर्मी से
और ले डूबते पूरे संसार को
