Author: वैश्विक हिंदी परिवार

“चाय की मिठासक्ष” – सांद्रा लुटावन

“चाय की मिठासक्ष” – सांद्रा लुटावन सुबह की शुरुआत हो या शाम का समाँ,चाय हर पल को बना देती है सुहाना।कभी हल्की भाप में सुकून मिलता है,कभी एक प्याले में…

तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी एवं प्रदर्शन शृंखला

“अभिजातकलाकलापेषु भारतीय – ज्ञान – परंपरा (सद्योवृत्तान्तः)” भारतीय ज्ञान परम्परा और शास्त्रीय कलाओं के समकालीन स्वरूप पर तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारम्भ हुआ भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (आईआईएएस), राष्ट्रपति…

“मोरपंख”- प्रवीण ‘बनजारा’

“मोरपंख”- प्रवीण ‘बनजारा’ सब उन्हें माताजी के नाम से जानते थे।उस दिन बड़े तड़के जब नींद खुली तो अंधेरा ही दिखा। गली के एक खम्भे के लाटू की रोशनी जाने…

डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के रचना संसार पर आयोजित कार्यक्रम

डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के रचना संसार पर आयोजित कार्यक्रम नई दिल्ली। सुप्रसिद्ध साहित्यकार, उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री तथा भारत सरकार के पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’…

कालीदास गुप्ता रज़ा एकदिवसीय जन्मशतवार्षिकी संगोष्ठी एवं साहित्य मंच : कविता पाठ

कालीदास गुप्ता रज़ा एकदिवसीय जन्मशतवार्षिकी संगोष्ठी एवं साहित्य मंच : कविता पाठ

विशेषण – डॉ. अशोक बत्रा (कविता)

विशेषण (कविता) एक दिन संज्ञा और सर्वनाम नेविशेषण का पकड़ लिया गिरेबान!और चिढ़ाते हुए बोले —हमारे अंगने में तुम्हारा क्या काम? विशेषण मुस्कराया !बोला — संज्ञा बी!यह सर्वनाम तो तुम्हारा…

“सौ ग्राम जिंदगी”- डॉ. नीना‌ छिब्बर

“सौ ग्राम जिंदगी”- डॉ. नीना‌ छिब्बर अकल्पनीय है सांसों की पूंजी को कंजूसी से खर्चना तोला माशा का हिसाब रख फूंक -फूंक कर गर्म पलों को ठंडा कर के देना…

“प्रवासी मजदूर”- डॉ. वंदना मुकेश

“प्रवासी मजदूर”- डॉ. वंदना मुकेश छत होती तो देखती,गली से निकलतेप्रवासी मजदूरों की टोलियाँ।देखती कुछ औरतें,कुछ बच्चे लटकाए,कंधों पर झोले अटकाए। कुछ औरतें,खाली पेटवाली,कुछ पेटवाली, खाली। मुझे छत चाहियेकि देख…

“एक शाम : वियतनाम के नाम” – कवि सम्मेलन

“एक शाम : वियतनाम के नाम” – कवि सम्मेलन दिनांक 19.05.2026 को अखिल भारतीय सर्वभाषा संस्कृति समन्वय समिति के तत्वावधान में “एक शाम: वियतनाम के नाम” शीर्षक के अंतर्गत इस…

“परोसा गया शून्य” – डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

“परोसा गया शून्य” – डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ पेट की अपनी कोई भाषा नहीं होती, बस एक आदिम जिद होती है जो आंतों के गलियारों में डमरू बजाती रहती…

“लोकभाषा मे रचनापाठ” कार्यक्रम सम्पन्न

“लोकभाषा मे रचनापाठ” कार्यक्रम सम्पन्न दिनांक 17 ( रविवार ) को विश्व हिंदी सचिवालय, केंद्रीय हिंदी संस्थान, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद, वातायन तथा भारतीय भाषा मंच के संयुक्त तत्वाधान में वैश्विक…

“पहाड़ों मे पगडंडी”- जे. पी. पाण्डेय ( पुस्तक समीक्षा )

“पहाड़ों मे पगडंडी”- जे. पी. पाण्डेय ( पुस्तक समीक्षा ) यात्रा-वृत्तांत साहित्य की वह विधा है जिसमें लेखक अपनी यात्राओं के अनुभवों, दृश्यों, लोगों और विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक स्थितियों का सजीव…

“युद्ध और स्त्रियाँ”- डॉ.नीना‌ छिब्बर

“युद्ध और स्त्रियाँ”- डॉ.नीना‌ छिब्बर स्त्रियाॅं चाहे‌ हो ताकतवर या कमजोर देश की युद्ध चाहे शीत हो या विध्वंसक दिन का उजाला हो या घुप अंधेराकभी टैंकों की गड़गड़ाहट गूंजेकभी…

“धीरज आखिर टूट गया”- डॉ. वेद व्यथित 

“धीरज आखिर टूट गया”- डॉ. वेद व्यथित और छुपाता दर्द हृदय में अब कितना दर्द हृदय की सब सीमायें लांघ गया कितने ज्वार उठे और कितने लौट गये कितने मोती…

”बाबुल की देहरी”- डॉ. शिप्रा मिश्रा 

”बाबुल की देहरी”- डॉ. शिप्रा मिश्रा घर में प्रवेश करते ही नजर आलमारी पर जा रुकी- शर्बत सेट, किताबें, कैसेट्स और न जाने क्या-क्या अबाड़-कबाड़। मन में आया अभी उठाकर…

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