रूहानी रात और उसके बाद – (डायरी अंश)
रूहानी रात और उसके बाद – अलका सिन्हा 03 सितंबर, 2008 21 अगस्त से 31 अगस्त, 2008 तक यूके हिंदी समिति और नेहरू सेंटर, लंदन द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय कवि सम्मेलन…
हिंदी का वैश्विक मंच
रूहानी रात और उसके बाद – अलका सिन्हा 03 सितंबर, 2008 21 अगस्त से 31 अगस्त, 2008 तक यूके हिंदी समिति और नेहरू सेंटर, लंदन द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय कवि सम्मेलन…
भंडारघर पहले के गांवों में हुआ करते थेभंडारघर।भरे रहते थे अन्न से, धान से कलसेडगरे में धरे रहते थेआलू और प्याज़गेहूं-चावल के बोरेऔर भूस की ढेरी मेंपकते हुए आम।नई बहुरिया…
बहुत मुश्किल है बहुत मुश्किल हैरंगों से भरे कैनवास परसफ़ेद चुप्पी के रंग को उकेरनातमाम उम्र जो रंग भरती रही जीवन मेंउस मॉं को सफ़ेद चादर में लपेटनाया अपनी ही…
हमें रास आ गई है कभी क़िस्सागोईकभी सड़ककभी रसोईकभी बतकहीकभी अनकहीकभी यूँ ही भटकनाकभी बिन बात अटकनाकभी किताबों की बातेंकभी बेबाक़ मुलाक़ातेंकभी ईद कभी तीजकभी इक दूजे पर खीजकभी लड़ना…
स्त्री होना… मेरी ना उसे स्वीकार नहीं थीमेरी हाँ भी होती तो भी नहीं बदलता कुछ भीपुरूष होने का या स्त्री होने काअंतर तो रहता ही हमेशाबड़ा आसान है मुझे…
प्रेम प्रेम की यादों में डूबी स्त्री नेप्रेम की बारिश में डूबते हुए पूछा खुद सेक्या चाहती हो तुम मुझ सेबारिश सिहर सिहर गयीप्रेम के खुले आकाश में विचरती स्त्री…
अकेला एक ख़ामोशी, तूफ़ान के बाद कीसाक्षी बनी चुप्पी से सराबोर दीवारेंमाथे की तनी हुई नसेंऔर आँखों की बहनें की रफ़्तारसब कुछ तहस नहस साकाश कि कोई समझ पातानितान्त अकेलापन…
शत सिरून घूमती रही मैं सारे शहर मेंमैंने देखा ओपेरा के पास लोगों का हुजूमदेख आई मैं काली झील का कोनादूर से देखा मैंने चमकते अरारात कोसफ़ेद बर्फ़ के साथ…
कुलबुलाहट सोचती हूँ कि हिस्सा बन जाऊँइस अंजाने देश कापर लोगों की अजनबी आँखेंसर्द चाबुक सी लगती हैं मेरी देह परफिर सोचती हूँ कि दरिया बन जाऊँबहती रहूँ यहाँ की…
प्रवासी आभास ख़्बाव आजकल रातों में खूब डराते हैंबर्फ़ की चादर है और हम सर्द हो जाते हैदूर तलक चुप्पी है सन्नाटा है सफ़ेद चादर कासपने है किबस ख़ामोशी से…
बौन्जाई कद्दावर वृक्ष की जड़ गमले में लगानासच-सच बतलानाकैसी चतुराई हैऔर जो ये थोड़ी-सी जमीन मेंपीपल बरगद जैसी छतनार सी पनप आई हैये तो एक औरत हैतुम कहते हो बौन्जाई…
धिनाधिन…धिन… धिनाधिन… -अलका सिन्हा हल्की बरसात के बाद मौसम सुहावना हो गया था। रास्ते में बिछे सुनहले पत्तों से आती चर्र- मर्र की आवाज अस्फुट-सी कुछ कह रही थी जो…
जन्मदिन मुबारक – अलका सिन्हा बगल के कमरे से उठती हुई दबी-दबी हंसी की आवाज उसके कमरे से टकरा रही है। ये हंसी है या चूड़ियों की खनक! पता नहीं,…
चांदनी चौक की जुबानी -अलका सिन्हा बहुत अच्छा गाती हैं आप!”मैंने कहा तो वान्या मुस्करा दी, ”धन्यवाद, मुझे संगीत बहुत प्रिय है।” अबकी बार मैं हंस पड़ी। विदेशी मूल का…
रिहाई –अलका सिन्हा उम्रकैद की लंबी सजा को तेरह साल में निबटा कर आज वह अपने घर के सामने खड़ा था। टकटकी लगाए वह देर तक उस दरवाजे को घूरता…
चला आया हूँ चला आया हूँ, उस दौर को छोड़कर,उस खेल को छोड़कर, उस छाँव को छोड़कर।आ गया हूँ, कहाँ, पूछता हूँ खुद से,जाना कहाँ है, ये भी नहीं है…
गांधी के सपनों का भारत, आ निकला है किस ये पथ पर उम्र जवां है, उमड़ा यौवन, दिल मे लेकिन चुभता नश्तर।।बोस, आजाद, बिस्मिल, जैसे थे मणि के हीरे।चमक रहे…
शर्म की बात है! बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ,नारा तुम लगाते हो।आती है जब बात न्याय की,चुप्पी साध क्यों जाते हो?आठ साल की बच्ची थी वो,थी वो दुनियाँ से अनजान।बनाया उसको…
इंसाफ का सवाल वाह रे मेरे देश के इंसान,मारते हो इक छोटी सी बच्ची,और चिल्लाते हो,मेरा भारत महान।वाह रे, मेरे देश के फ़नकार,खिताब न लौटाओगे अब,बैनर न लगाओगे अब,अरे झूठे…
अलविदा कलाम! कहाँ चल दिये यूँ छोड़ कर हमें,अभी तो बहुत सारे काम बाकी हैं!आपने कहा था सोने न दें जो, वो हैं सपनें,अभी तो उन सपनों की उड़ान बाकी…