हे कृष्णा – (कविता)
हे कृष्णा हे कृष्णा, हे मुरारीमोहे हर लो मन की पीड़मन चंचल कैसै मैं बाँधूकुछ तो भर दो धीरहे कृष्णा मोहे मन की हर लो पीड़। में तो केवल माटी…
हिंदी का वैश्विक मंच
हे कृष्णा हे कृष्णा, हे मुरारीमोहे हर लो मन की पीड़मन चंचल कैसै मैं बाँधूकुछ तो भर दो धीरहे कृष्णा मोहे मन की हर लो पीड़। में तो केवल माटी…
बातें किस की बातेंउस की बातेंमीठी बातें कढ़वी बातेंकुछ ऊँची, कुछ नीची बातेंलम्बी बातें, पल की बातेंरुसवा ना होना, कल की बातें। किस से कहूँ मैं मन की बातेंक्यों करते…
रिश्ते रिश्ते बनते नहीं; होते हैंधागे में मोती से पिरोतै हैंकुछ बनाये जाते हैंकुछ बस दूर सोते हैंकुछ बस ना भी कहोकहीं अचानक खोते हैं रिश्ते सहेजने की ज़रूरत नहींवो…
हिंदी भाषा आओ बच्चों तुम्हें बताऊँबात इक बतलाती हूँछोटी सी कविता गा करमैं तुम को समझाती हूँ। जब भी छुट्टियाँ होती होगींनानी के घर जाओगेनानी को मिल कर अपनीक्या क्या…
मँजी आज बरसो बाद मुझको लगामैं अपनी दादी के संग सोईचाँद सितारों के नीचे खोई।मंजी की रस्सी मेंपाया दादी का प्यारअनंत असीम शांति व दुलार।दुपट्टे में छिपायाअपने संग सुलाया।आज बरसो…
देवनागरी लिपि देव नागरी लिपि अनोखीभाव अर्थ की नहीं है दूरी अ अमृत की वर्षा हो सब परसभी सुखी हों जिस से हर पल। आ आंगन की तुलसी है न्यारीमानव…
निकट निकट जिस को निकट मानानिकट, विकट हो आ खड़ा है। विकट हो सब रीत डालाजीवन ऐसे बीत डाला। निकट होने की समस्याकर रही केवल तपस्या। निकट से कुछ मिल…
मॉरीशस और फीजी : विश्व हिंदी सम्मेलन के झरोखे से –डॉ. सुभाषिनी लता कुमार लेखक कृपाशंकर चौबे की हिंदी भाषा एवं साहित्य लेखन, पत्रकारिता और संपादक के रूप में अंतरर्राष्ट्रीय…
हिंदी की पुकार आओ चले,निज भाषा की ओरजिससे है पहचान हमारीहिंदी हमारी मातृभाषाजहाँ है ज्ञान का भंडारभाषा है संस्कृति का आधार,सीख लोगे जब संस्कारहोंगे संगठित तब परिवार,बनेंगे घर-आँगन स्वर्ग समान,मिलेगा…
तुम्हारा साथ तुम्हारा हाथजब थाम लेता हैहाथ मेराबेचैन मन कोमिलता हैएक मजबूत भरोसाजैसे चटकती धूप मेंमिल गई हो छाव कहीं। शाम की चाय होजब साथ तेरेराहत पा जाती हैदिनभर की…
जोगिन्द्र सिंह कंवल : फीजी के प्रेमचंद डॉ. सुभाषिनी लता कुमार स्वर्गीय श्री जोगिन्द्र सिंह कंवल एक महान लेखक, अद्भुत व्यक्तित्व और सामान्य रूप में शिक्षा और समाज में योगदान…
‘फीजी माँ’ – फीजी हिंदी का महाकाव्यात्मक उपन्यास -सुभाषिनी लता कुमार अंग्रेजी के प्रतिष्ठित और चर्चित साहित्यकार होते हुए भी प्रो. सुब्रमनी ने अंग्रेजी भाषा के मोह को त्यागकर फीजी…
जोगिन्द्र सिंह कंवल के उपन्यास ‘करवट’ की समीक्षा -सुभाषिनी लता कुमार सामाजिक-राजनैतिक जागृति और 20 वीं सदी के नागरिक होने के नाते अपने अधिकारों को लेकर भारतीयों के संघर्ष को…
कहाँ चले जा रहे हैं, कहीं तो जा रहे हैं, नहीं है ख़बरक्या चाहते हैं, पता नहीं, कुछ न कुछ तो मिलेगा मगर ऐसी ही उहा-पोह में जूझता बढ़ा जा…
मौन की सीमाएँ लाँघकरघबराहट को पीछे बाँधकरभावों की उलझन समेटकरउमड़ती हुई हसरतें लपेटकरमुझे तुमसे कुछ कहना थामहफ़िलों में भी तन्हा रहता हूँख़ामोश सा सब कुछ सहता हूँतारे गिन-गिन हमने रात…
मैं और गणित प्रसन्नता में मैंने स्वयं को जोड़ा,अवसाद में स्वयं को घटाया,मद में स्वयं को गुणित किया,घोर निराशा में स्वयं को विभाजित किया, और आश्चर्य से पाया किइन सारे…
छोटी छोटी बातें छोटी छोटी बातों में, कितना सुख समाया है !उनकी वो मुस्कुराहट, उनके आने की आहट,छोटी सी पाती में किसका सन्देसा आया है ?छोटी छोटी बातों में…. नन्हे…
माँ माँ बनकर ही मैंने जाना,क्या होता है माँ का प्यार।जिस माँ ने अनजाने ही,दे दिया मुझे सारा संसार॥ गरमी से कुम्हलाये मुखपर भी जो जाती थी वार।शीत भरी ठंडी…
मेरे जीवन का कैनवास मेरे जीवन के कैनवास पर तुमने जो चित्र अंकित किया हैउसमें समय-समय पर कई-कई रंग बिखरते गए हैं एक दीर्घ समय तक का हमारा साथ,और उस…
आकांक्षा थक चले हैं पाँव, बाहें माँगती हैं अब सहारा।चहुँ दिशि जब देखती हूँ, काम बिखरा बहुत सारा॥ स्वप्नदर्शी मन मेरा, चाहता छू ले गगन को,मन की गति में वेग…