आदमी और कबूतर – (कविता)
अमरेन्द्र कुमार, अमेरिका आदमी और कबूतर (१) नाम देकरसभ्यता का विकासछीन करधरती और आकाशबनाये जा रहेकंक्रीट के दरबेतैयारी हो चुकी है पूरीआदमी को कबूतर बनाने की (२) कबूतरशांति का प्रतीक…
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अमरेन्द्र कुमार, अमेरिका आदमी और कबूतर (१) नाम देकरसभ्यता का विकासछीन करधरती और आकाशबनाये जा रहेकंक्रीट के दरबेतैयारी हो चुकी है पूरीआदमी को कबूतर बनाने की (२) कबूतरशांति का प्रतीक…
अमरेन्द्र कुमार, अमेरिका पावस (१) जाते-जातेसावन डाकिये नेबचे बादलों के बण्डल कोबढ़ा दिया भादों कोताकि धरती परजल का वितरणहोता रहे निरंतर-निर्बाध| (२) सूरज साहब के नामधूप की छुट्टियों की अर्जीबंद…
अमरेन्द्र कुमार, अमेरिका समय सबसे बड़ा छन्ना समय सबसे बड़ा छन्नाठोस रह जाता हैतरल बह जाता है. मौन सबसे बड़ा संवादकोलाहल से आगेअनकहा कह जाता है. दुर्ग हो असत्य काचाहे…
अमरेन्द्र कुमार, अमेरिका आत्मा की अदालत ईमान के लिए अगरबिगाड़ की बात करोगे?अपनी बर्बादी का गड्ढाक्या खुद खोदोगे? किसी का कुछ जायेगा नहींअपना नुकसान आप भरोगे अलगू चौधरी के कामजुम्मन…
संगीता चौबे पंखुड़ी, कुवैत ***** लेखनी में धार हो वीर रस की हो प्रचुरता, ओज का अंगार हो।हर सदी की माँग है यह, लेखनी में धार हो ।। लिख सके…
पंकज शर्मा, अमेरिका *** यह दौड़ती भागती सड़कें दिन रात यह जागती सड़केंकिसी को मंज़िल तक पहुंचाएंकिसी को यूँ ही भटकती सड़केंकहीं पे कन्धा दे अर्थी कोकहीं पे ढोल बजाती…
ऋतु शर्मा ननंन पाँडे, नीदरलैंड *** *** *** 1. मेरी दुनिया ऑटिजम मेरी दुनिया अलग है, मेरी बातें अलग हैं,मैं देखता हूँ, मैं सुनता हूँ, अलग तरीके से। मेरे दिल…
– रम्भा रानी (रूबी), फिजी ** *** ** *** ** प्रकृति का संदेश ये बयार की सरसराहट,ये पंक्षियो की चहचाहट,ये नदियाँ और लहरों का शोर,ये बारिश में नाचते मोर,ये प्रकृति…
– रम्भा रानी (रूबी ), फिजी **** **** जमा – पूँजी जमा- पूँजीक्या इसका अर्थबस धन – सम्पत्ति ही होता है।नहीं,जमा-पूँजी का अर्थ है –मान, सम्मान, अपमान, अनुभव,जिसे हम सँभाल…
– रम्भा रानी (रूबी), फीजी *** *** *** दीपों का पर्व दीपों का पर्व आने वाला है,हम सबको भी दीप जलाना है। मन के अंदर जो बसा हुआ,सारे अंधकार मिटाना…
– रम्भा रानी (रूबी), फीजी बस एक पहर ही बाकी है तीन पहर तो बीत गए,बस एक पहर ही बाकी है।जीवन हाथों से निकल गया,बस खाली मुट्ठी बाकी है। सब…
– रम्भा रानी (रूबी), फीजी *** *** *** बचपन की क़ुछ खट्टी -मीठी यादें आज भी मुझे बचपन की वो सब यादें जो याद आती हैं,मन खुशियों से भर जाती…
– विनीता तिवारी, वर्जीनिया, अमेरिका *** *** *** भूल रहे सब भाईचारा————————- हर भाषा कोदूसरी भाषा से ख़तरा हैहर इंसान यहाँतरकीबों का पिंजरा हैकैसे,किससे आगे निकलेकैसे, किसकोपीछे छोड़ेंभाषा हो याराष्ट्र,…
बचपन में देखे थे सपने सोचा, पूरे होंगे एक दिन लेकिन जब वो उम्र हुई कुछ करने की कर जाने की सपनों को सच बनाने की तो सलाह मिली अपनों…
एक ख़ामोशी सी रहती है जाने मुझसे क्या कहती है सोचा करती कि कौन हूँ मैं अपने ही तन में मौन हूँ मैं क्यूँ शांत स्वरूप सी फिरती हूँ कुछ…
– अनुराग शर्मा ***** घेरे अपने-अपने अपने घेरे में ही, गुनगुनाते रहेपास आना तो दूर, दूर जाते रहे॥ प्रीत हमसे न थी तो जताते नहींप्यार के नाम पर, क्यूँ सताते…
– अनुराग शर्मा ***** वफ़ा वफ़ा ज्यूँ हमने निभायी, कोई निभाये क्यूँकिसी के ताने पे दुनिया को छोड़ जाये क्यूँ॥ कराह आह-ओ-फ़ुग़ाँ न कभी जो सुन पायाग़रज़ पे अपनी बार-बार…
– अनुराग शर्मा ***** भाव-बेभाव प्रेम तुम समझे नहीं, तो हम बताते भी तो क्याथे रक़ीबों से घिरे तुम, हम बुलाते भी तो क्या वस्ल के क़िस्से ही सारे, नींद…
अरमान – डॉ स्मिता सिंह ***** बस दो ही दिन पहले के नज़ारेअदभुत रोशनी, रूमानी नज़ारे,जब शब भी शबनम माफ़िक़ चमक बिखेरेपूर्णिमा के चाँद की चाँदनी में नहाईयाद आ गई…
सुकून तो देती थी चाय – डॉ स्मिता सिंह ***** चाय हो या कोई चाह,पक्का रंग जब तक ना चढ़ेऔर नहीं हो जुनून,कहाँ मिलता है सच्चा सुख और कौन देता…