Category: प्रवासी कविता

गंध – स्पर्श – (कविता)

डॉ. सत्येंद्र श्रीवास्तव, ब्रिटेन ***** गंध – स्पर्श यह फूलअपनी सुगंध कोकुछ देर पहले तकपत्तियों में बांधे हुए था स्निग्ध हवा का एक झोंका आयाअब पत्तियां झर रही हैंऔर खुशबू…

यह शहर : लन्दन – (कविता)

डॉ. सत्येंद्र श्रीवास्तव, ब्रिटेन ***** यह शहर : लन्दन यह शहर उग रहा अब सेवार सा चारों तरफइस शहर की भीड़ में हर जन कहीं भटका हुआस्वप्न की इन फाइलों…

धुंए भरे कमरे में – (कविता)

डॉ. सत्येंद्र श्रीवास्तव, ब्रिटेन ***** धुंए भरे कमरे में उस धुंए भरे कमरे मेंबहुत लोग नहीं थेलेकिन जो थेवे अपनी उपस्थिति के प्रतिनिरंतर चौकन्ने थेउनकी आंखों में जो परेशानी थीवह…

वह लड़की – (कविता)

डॉ. सत्येंद्र श्रीवास्तव, ब्रिटेन ***** वह लड़की एक छोटी-सी लड़की थी वहकोई आठ वर्ष कीएक पवित्र जल-धार की खामोश थिरकन लहर कीजब उसकी आंखों मेंउसके पार मैंने उसे देखा थाएक…

संकल्प – (कविता)

डॉ. सत्येंद्र श्रीवास्तव, ब्रिटेन ***** संकल्प मैं देखता हूं उन्हेंगाते हुए प्रेम-गानअपनी बाहों पर गुदे गुदने को देखकरवे कितने सारे नाम उन परवे कैथरिनें, वे एलिजाबेथेंवे डायनाएं और वे मार्गरटेंफिर…

माइकल एंजेलो – (कविता)

डॉ. सत्येंद्र श्रीवास्तव, ब्रिटेन *** माइकल एंजेलो ठुमक रही है संगमरमरी शीशों परमैं देख रहा हूंइन पत्थरों पर पड़ती रोशनी की झांइयों मेंतुम्हारी कलाई का स्वप्न-नृत्यऔर मैं कल्पना कर रहा…

बार बार भारत – (कविता)

डॉ. सत्येंद्र श्रीवास्तव, ब्रिटेन ***** बार बार भारत विद्यार्थी कहते थे-वे भारत देश जा रहे हैंवे भारत देश केवल कुछ पढ़ने-घूमने देखने हीनहीं जा रहे हैंजा रहे हैं वहां वह…

खिड़की के सामने का पेड़ – (कविता)

डॉ. सत्येंद्र श्रीवास्तव, ब्रिटेन *** खिड़की के सामने का पेड़ मेरी खिड़की के सामने का यह पेड़सब ऋतुओं में बदला है, परइसे इंसान की तरह मौसमी नहीं कहा जा सकता…

सर विंस्टन चर्चिल मेरी मां को जानते थे – (कविता)

डॉ. सत्येंद्र श्रीवास्तव, ब्रिटेन *** सर विंस्टन चर्चिल मेरी मां को जानते थे सर विंस्टन चर्चिल जानते थे कि भारत क्या है।वे जानते थेक्योंकि वे मानते थे कि भारत ब्रिटिश-साम्राज्य…

चेतावनी – (कविता)

बृजेंद्र कुमार भगत ‘मधुकर’ (राष्ट्रकवि), मॉरीशस चेतावनी हिंदी गई रसातल में तो गई हमारी आशा,संस्कृति सिसक-सिसक रोएगी धर्म मरेगा प्यासा।हिंदी को कुचलेगी प्यारे गौरांगों की भाषा,हिंदू एक न होगा जग…

आदमी और कबूतर – (कविता)

अमरेन्द्र कुमार, अमेरिका आदमी और कबूतर (१) नाम देकरसभ्यता का विकासछीन करधरती और आकाशबनाये जा रहेकंक्रीट के दरबेतैयारी हो चुकी है पूरीआदमी को कबूतर बनाने की (२) कबूतरशांति का प्रतीक…

पावस – (कविता)

अमरेन्द्र कुमार, अमेरिका पावस (१) जाते-जातेसावन डाकिये नेबचे बादलों के बण्डल कोबढ़ा दिया भादों कोताकि धरती परजल का वितरणहोता रहे निरंतर-निर्बाध| (२) सूरज साहब के नामधूप की छुट्टियों की अर्जीबंद…

समय सबसे बड़ा छन्ना – (कविता)

अमरेन्द्र कुमार, अमेरिका समय सबसे बड़ा छन्ना समय सबसे बड़ा छन्नाठोस रह जाता हैतरल बह जाता है. मौन सबसे बड़ा संवादकोलाहल से आगेअनकहा कह जाता है. दुर्ग हो असत्य काचाहे…

आत्मा की अदालत – (कविता)

अमरेन्द्र कुमार, अमेरिका आत्मा की अदालत ईमान के लिए अगरबिगाड़ की बात करोगे?अपनी बर्बादी का गड्ढाक्या खुद खोदोगे? किसी का कुछ जायेगा नहींअपना नुकसान आप भरोगे अलगू चौधरी के कामजुम्मन…

लेखनी में धार हो – (कविता)

संगीता चौबे पंखुड़ी, कुवैत ***** लेखनी में धार हो वीर रस की हो प्रचुरता, ओज का अंगार हो।हर सदी की माँग है यह, लेखनी में धार हो ।। लिख सके…

यह दौड़ती भागती सड़कें – (कविता)

पंकज शर्मा, अमेरिका *** यह दौड़ती भागती सड़कें दिन रात यह जागती सड़केंकिसी को मंज़िल तक पहुंचाएंकिसी को यूँ ही भटकती सड़केंकहीं पे कन्धा दे अर्थी कोकहीं पे ढोल बजाती…

ऋतु शर्मा ननंन पाँडे की ऑटिजम पर कविताएं – (कविता)

ऋतु शर्मा ननंन पाँडे, नीदरलैंड *** *** *** 1. मेरी दुनिया ऑटिजम मेरी दुनिया अलग है, मेरी बातें अलग हैं,मैं देखता हूँ, मैं सुनता हूँ, अलग तरीके से। मेरे दिल…

प्रकृति का संदेश – (कविता)

– रम्भा रानी (रूबी), फिजी ** *** ** *** ** प्रकृति का संदेश ये बयार की सरसराहट,ये पंक्षियो की चहचाहट,ये नदियाँ और लहरों का शोर,ये बारिश में नाचते मोर,ये प्रकृति…

  जमा – पूँजी – (कविता)

– रम्भा रानी (रूबी ), फिजी **** **** जमा – पूँजी जमा- पूँजीक्या इसका अर्थबस धन – सम्पत्ति ही होता है।नहीं,जमा-पूँजी का अर्थ है –मान, सम्मान, अपमान, अनुभव,जिसे हम सँभाल…

दीपों का पर्व – (कविता)

– रम्भा रानी (रूबी), फीजी *** *** *** दीपों का पर्व दीपों का पर्व आने वाला है,हम सबको भी दीप जलाना है। मन के अंदर जो बसा हुआ,सारे अंधकार मिटाना…

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