पेड़ सब हरे होते हैं ( कविता ) : मंजु गुप्ता
पेड़ सब हरे होते हैं ( कविता ) : मंजु गुप्ता पेड़ सब हरे होते हैंहरा होना कितनी बड़ी बात है, जानते हो ?धूप, ताप, आँधी, बरसात, पतझड़ सहते हुए,…
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पेड़ सब हरे होते हैं ( कविता ) : मंजु गुप्ता पेड़ सब हरे होते हैंहरा होना कितनी बड़ी बात है, जानते हो ?धूप, ताप, आँधी, बरसात, पतझड़ सहते हुए,…
चिड़िया और उदासी ( कविता ) : मंजु गुप्ता एक उदास चिड़ियाबैठी थी पेड़ पर अकेली, गुमसुममैं भी उदास, सोच रही थी-चिड़िया उदास भला किस कारण होगीशायद उसे भूख लगी…
स्वर्णिम मार्ग : जापान यात्रा और भारत-जापान संबंधों का बहुआयामी परिप्रेक्ष्य – अमित गुप्ता प्रस्तावना –टोक्यो की सड़कों पर पहली बार कदम रखते ही मुझे लगा कि मैं किसी जीवंत…
धरती का दर्द – अनीता वर्मा आवारा बादल खुशी से गुनगुनाता हुआ नीचे जा रही नदी को देख कर दीवाना हो रहा था। साफ हवाएँ उनके इश्क को देखकर तेजी…
अभी कई सारे गीत उन पर लिखे जाने की प्रतीक्षा में हैं – स्वरांगी साने : समीक्षा डॉ. सुनील देवधर आकाशवाणी से सहायक निदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं।…
इट हैपंस इन इंडिया: अनोखे रिश्ते – सच्चिदानंद जोशी इंडिगो की फ्लाइट से गौहाटी जा रहा था। सबसे आगे वाली सीट थी , विंडो के पास। फ्लाइट चलने को हुई…
शेष – अशेष : अनीता वर्मा ( कविता ) क्या होगा अगर तुम्हें जानेंगे बहुत लोगक्या ही होगा अगर तुम सिर्फ बातें ही करोगे समझदारी कीऔर क्या ही करोगे जब…
परजीवी तिलचट्टे – विनयशील चतुर्वेदी ( कविता ) बहुत ही खतरनाक हैं येढूंढ लेते हैं अंधरेघुस जाते हैदरारों मेंगटरों मेंहर उस जगह जहाँ होता हैअंधेरा………लाखों लाठियाँ लेकर भागोइनके पीछेहज़ारों तरह…
कमरा नंबर 302 – डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ (व्यंग्य) उस ओयो होटल की गलियाँ किसी भूलभुलैया जैसी थीं, जहाँ रोशनी भी डरी-सहमी सी अंदर आती थी। बाहर बोर्ड पर…
पुल – डॉ. वंदना मुकेश ( कविता ) पुलउस पीढ़ी से इस पीढ़ी तककई पुल बनने हैं।कुछ कदम तुम चलो,कुछ मैं। याद रखना,बनाओ जब पुल तोइनमें सरकारी सीमेंट न हो,दीवारों…
शोर – डॉ. वंदना मुकेश ( कविता ) मैं कुछ कहती हूँतुम भी कुछ कहते हो।जो मैं कहती हूँकुछ वैसा ही तुम भी कहते हो। न तुम सुनते होन मैं…
पछतावा – डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ( व्यंग्य ) शहर के सबसे बड़े मल्टी-स्पेशालिटी अस्पताल के आईसीयू वार्ड के बाहर वेटिंग एरिया में एक अजीब सी गंध थी फिनाइल…
“साख पर बट्टा”- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ उस दिन घर के स्टोर-रूम के सबसे अंधेरे कोने में, जहाँ मकड़ियों ने अपनी नई रियासत बसाई थी, एक दिल दहलाने वाला…
“धूप छांव”- डॉ. नीना छिब्बर सुख के संग दुख मुस्कान के साथ ऑंसू आशा के संग निराशा गीत की धुन में खामोशी मंजिल की राह में रूकावटें विजय के संग…
“रफ़ी के सुरों में गूंजती गाडगिल की आवाज़”- स्वरांगी साने ‘दुःख-सुख की हर एक माला, कुदरत ही पिरोती है’ सन् 1981 की फ़िल्म ‘कुदरत’ का यह गीत है, जिसे आर.डी.…
सूखी आँखों का गीला दर्शन : ( व्यंग्य ) सेकंड क्लास के स्लीपर कोच में प्रवेश करते ही ऐसा लगता है मानो हम भारतीय रेल के डिब्बे में नहीं, बल्कि…
पछतावा (व्यंग्य) शहर के सबसे बड़े मल्टी-स्पेशालिटी अस्पताल के आईसीयू वार्ड के बाहर वेटिंग एरिया में एक अजीब सी गंध थी फिनाइल और मरती हुई उम्मीदों का कॉकटेल। सुमित वहां…
खादी पंखों वाली आत्मा (व्यंग्य) सत्ता की रीढ़ जितनी लचीली होती है, चापलूसी के सुर उतने ही मधुर सुनाई देते हैं। उस दोपहर महामहिम की कचहरी में एक ऐसी ही…
स्टैप्लर (व्यंग्य) बजाज साहब की मेज पर वह बिल्कुल आखिरी कोने में पड़ा रहता था। एक ऐसा अनाम कैदी, जिसकी तरफ कोई मुस्कुराकर देखता भी नहीं था। क्रोमियम की उसकी…
विशेषण (कविता) एक दिन संज्ञा और सर्वनाम नेविशेषण का पकड़ लिया गिरेबान!और चिढ़ाते हुए बोले —हमारे अंगने में तुम्हारा क्या काम? विशेषण मुस्कराया !बोला — संज्ञा बी!यह सर्वनाम तो तुम्हारा…