“परोसा गया शून्य” – डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’
“परोसा गया शून्य” – डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ पेट की अपनी कोई भाषा नहीं होती, बस एक आदिम जिद होती है जो आंतों के गलियारों में डमरू बजाती रहती…
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“परोसा गया शून्य” – डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ पेट की अपनी कोई भाषा नहीं होती, बस एक आदिम जिद होती है जो आंतों के गलियारों में डमरू बजाती रहती…
धीरज आखिर टूट गया (कविता) और छुपाता दर्द हृदय में अब कितना दर्द हृदय की सब सीमायें लांघ गया कितने ज्वार उठे और कितने लौट गये कितने मोती तट बंधों…
पारस पत्थर वाला व्यवहार (बाल-कहानी) रामपुर नाम के एक खुशहाल गाँव में ‘चंदन’ नाम का एक बच्चा रहता था। चंदन पढ़ने-लिखने में बहुत होशियार था, लेकिन उसमें एक कमी थी,…
ऊधो मन न भए दस-बीस…(स्वरांगी साने) इंदौर से उज्जैन कितनी दूरी पर है? -56 -अरे 56 तो दुकानें हैं, उज्जैन 53 किमी की दूरी पर है।यह एक आम संवाद हुआ…
इश्क का ऑडिट (व्यंग्य) विक्रम टेंट के कोने में अपने लैपटॉप की रोशनी में किसी मुजरिम की तरह दुबका बैठा था। अनन्या ने हाथ में मशाल जैसी टॉर्च लेकर प्रवेश…
डॉ. रुद्रेश नारायण मिश्र ‘2011 और नैनी झील’ (कविता) 2011, अब,कैलेंडर से,उतर चुका है।पर आज भी,जब, दिसंबर की हवा,चलती है,मैं, अचानक,नैनी झील के किनारे,पहुँच जाता हूँ।देवदार,फिर हिलते हैं,गुब्बारे वाला बच्चा,फिर,…
किराए की साँसें वह शहर नहीं, दरअसल एक कसाईखाना था जहाँ इंसानों की नहीं, उनकी भावनाओं की नुमाइश होती थी। दिव्यांशु की कमर टूट चुकी थी, पर वह अब भी…
आश्वासन को विश्वास में बदलती फ़िल्म (समीक्षा) फ़िल्मों के बारे में कहा जाता है कि वे वहाँ से शुरू होती हैं, जहाँ आपकी कल्पनाशक्ति ख़त्म हो जाती है। पर इन…
लिव-इन रिलेशनशिप (व्यंग्य) उस फ्लैट की दीवारों पर लगे आधुनिक चित्रों में रंग तो बहुत थे, पर चमक गायब थी। विवान और समायरा आमने-सामने बैठे थे, जैसे किसी युद्ध के…
जाग तुझको दूर जाना ( महादेवी वर्मा ) ಎದ್ದೇಳು, ಬಹಳ ದೂರ ನೀನು ಸಾಗಬೇಕಾಗಿದೆ! ಮಹಾದೇವಿ ವರ್ಮಾ ಶಾಶ್ವತವಾಗಿ ಎಚ್ಚರದಿಂದಿರುವ ಕಣ್ಣುಗಳು ಇಂದು ನಿದ್ರಿಸುತ್ತಿವೆ, ಎಂತಹ ನಿರತ ನೋಟ! ಎದ್ದೇಳು, ಬಹಳ ದೂರ ನೀನು ಸಾಗಬೇಕಾಗಿದೆ! ಕದಲದ ಹಿಮದ…
आकांक्षाओ और आत्म संघर्ष के बीच का द्वंद्व ( अपने अपने बुर्ज खलीफा ) समकालीन हिंदी साहित्य के विस्तृत परिदृश्य में कुछ कृतियाँ ऐसी होती हैं जो केवल कहानी कहने…
स्त्री की बदलती तस्वीर संजोए है: क्लाइडोस्कोप दिव्या माथुर की “क्लाइडोस्कोप: सतरंगी स्मृतियाँ” मुख्य रूप से प्रवासी जीवन के चालीस वर्षों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करती है। यह निजी जीवन की…
आहिल्या ( डॉ वेद व्यथित ) स्त्री अस्मिता के नवीन आयामों को परिभाषित करता खंडकाव्य “अहिल्या “डॉ वेद व्यथित का खंड काव्य अहिल्या महर्षि वाल्मिकी की “अहिल्या “ को ले…
यादों की अर्थी (व्यंग्य) वह दोपहर किसी सड़ी हुई कढ़ी जैसी चिपचिपी थी। कार के भीतर का तापमान और मेरी पत्नी सुजाता के तेवर, दोनों ही चालीस डिग्री के पार…
जीवन की मूल धारा (कविता) जन्म लेने पर रोनादुनिया से जाते हुए दुखी होनाइस लम्बे अंतराल में होती हैएक लम्बी यात्रायात्रीगण रहते हैं क़तार मेंउधेड़ते -बुनते हुए अपने आप कोक्षणिक…
“अपने अपने बुर्ज ख़लीफ़ा“ (पुस्तक-परिचय) हर व्यक्ति के जीवन के कुछ महत्वपूर्ण प्रतिमान होते हैं और वह उन तक पहुँचने की क्षमता का विकास किस प्रकार से कर सकता है…
पुनर्जन्म का आधार कार्ड (व्यंग्य) बेलतारा गांव के राजनीति विशारद ‘लल्लन बाबू’ ने जब इस बार प्रधानी का बिगुल फूँका, तो उन्होंने ‘स्मार्ट सिटी’ और ‘मुफ्त बिजली’ के घिसे-पिटे वादों…
हवालात-ए-हुस्न (व्यंग्य) जैसे ही मैंने थाने के हवालात-ए-हुस्न में कदम रखा, वहां की आबोहवा में न्याय की खुशबू कम और थर्ड डिग्री की महक ज्यादा थी। दरोगा जी अपनी कुर्सी…
दुख-विनिमय केंद्र (व्यंग्य) चंदनपुर गांव के महान रणनीतिकार ‘झपटल बाबू’ ने जब इस बार प्रधानी का पर्चा भरा, तो उन्होंने विकास के सारे पुराने मापदंडों को खूँटी पर टांग दिया।…
स्मार्ट-गोबर (व्यंग्य) रामपुरिया गांव के स्वयंभू वैज्ञानिक ‘गबड़ू लाल’ ने जब प्रधानी के चुनाव में कदम रखा, तो उन्होंने पारंपरिक विकास की बलि चढ़ा दी। उनका चुनावी मुद्दा था—’गोबर का…