पेड़ सब हरे होते हैं ( कविता ) : मंजु गुप्ता
पेड़ सब हरे होते हैं ( कविता ) : मंजु गुप्ता पेड़ सब हरे होते हैंहरा होना कितनी बड़ी बात है, जानते हो ?धूप, ताप, आँधी, बरसात, पतझड़ सहते हुए,…
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पेड़ सब हरे होते हैं ( कविता ) : मंजु गुप्ता पेड़ सब हरे होते हैंहरा होना कितनी बड़ी बात है, जानते हो ?धूप, ताप, आँधी, बरसात, पतझड़ सहते हुए,…
चिड़िया और उदासी ( कविता ) : मंजु गुप्ता एक उदास चिड़ियाबैठी थी पेड़ पर अकेली, गुमसुममैं भी उदास, सोच रही थी-चिड़िया उदास भला किस कारण होगीशायद उसे भूख लगी…
शेष – अशेष : अनीता वर्मा ( कविता ) क्या होगा अगर तुम्हें जानेंगे बहुत लोगक्या ही होगा अगर तुम सिर्फ बातें ही करोगे समझदारी कीऔर क्या ही करोगे जब…
परजीवी तिलचट्टे – विनयशील चतुर्वेदी ( कविता ) बहुत ही खतरनाक हैं येढूंढ लेते हैं अंधरेघुस जाते हैदरारों मेंगटरों मेंहर उस जगह जहाँ होता हैअंधेरा………लाखों लाठियाँ लेकर भागोइनके पीछेहज़ारों तरह…
पुल – डॉ. वंदना मुकेश ( कविता ) पुलउस पीढ़ी से इस पीढ़ी तककई पुल बनने हैं।कुछ कदम तुम चलो,कुछ मैं। याद रखना,बनाओ जब पुल तोइनमें सरकारी सीमेंट न हो,दीवारों…
शोर – डॉ. वंदना मुकेश ( कविता ) मैं कुछ कहती हूँतुम भी कुछ कहते हो।जो मैं कहती हूँकुछ वैसा ही तुम भी कहते हो। न तुम सुनते होन मैं…
“धूप छांव”- डॉ. नीना छिब्बर सुख के संग दुख मुस्कान के साथ ऑंसू आशा के संग निराशा गीत की धुन में खामोशी मंजिल की राह में रूकावटें विजय के संग…
विशेषण (कविता) एक दिन संज्ञा और सर्वनाम नेविशेषण का पकड़ लिया गिरेबान!और चिढ़ाते हुए बोले —हमारे अंगने में तुम्हारा क्या काम? विशेषण मुस्कराया !बोला — संज्ञा बी!यह सर्वनाम तो तुम्हारा…
“सौ ग्राम जिंदगी”- डॉ. नीना छिब्बर अकल्पनीय है सांसों की पूंजी को कंजूसी से खर्चना तोला माशा का हिसाब रख फूंक -फूंक कर गर्म पलों को ठंडा कर के देना…
“युद्ध और स्त्रियाँ”- डॉ.नीना छिब्बर स्त्रियाॅं चाहे हो ताकतवर या कमजोर देश की युद्ध चाहे शीत हो या विध्वंसक दिन का उजाला हो या घुप अंधेराकभी टैंकों की गड़गड़ाहट गूंजेकभी…
“धीरज आखिर टूट गया”- डॉ. वेद व्यथित और छुपाता दर्द हृदय में अब कितना दर्द हृदय की सब सीमायें लांघ गया कितने ज्वार उठे और कितने लौट गये कितने मोती…
तुम्हारे लिए मुस्कराए हुए हूँ (कविता) हृदय में बहुत कुछ छुपाये हुए हूँ तुम्हारे लिए मुस्कराए हुए हूँ . क्या क्या नही दुःख उठाया है मैंने दुपहरी को सिर पर…
धीरज आखिर टूट गया (कविता) और छुपाता दर्द हृदय में अब कितना दर्द हृदय की सब सीमायें लांघ गया कितने ज्वार उठे और कितने लौट गये कितने मोती तट बंधों…
डॉ. रुद्रेश नारायण मिश्र ‘2011 और नैनी झील’ (कविता) 2011, अब,कैलेंडर से,उतर चुका है।पर आज भी,जब, दिसंबर की हवा,चलती है,मैं, अचानक,नैनी झील के किनारे,पहुँच जाता हूँ।देवदार,फिर हिलते हैं,गुब्बारे वाला बच्चा,फिर,…
जीवन की मूल धारा (कविता) जन्म लेने पर रोनादुनिया से जाते हुए दुखी होनाइस लम्बे अंतराल में होती हैएक लम्बी यात्रायात्रीगण रहते हैं क़तार मेंउधेड़ते -बुनते हुए अपने आप कोक्षणिक…
अपने अपने ठीया (कविता) युद्ध कभी अकेले नहीं लड़े जातेदूसरे का होना बहुत जरूरी है ।अकेले तो स्वयं से भी नहीं लड़ा जातावहाँ भी एक मन के दो टुकड़े होते…
उपमान और प्रतीक (कविता) एक दिन झुँझलाकर बोला वो!ये उपमान और प्रतीकदोनों बहुरूपिया हैंदोनों खुद के लिए नहीं जीतेऔरों के काम आते हैंफिर अलग क्यों कहलाते हैं!कभी उपमान प्रतीक बन…
– डॉ महादेव एस कोलूर ***** वृक्ष आदमी ने वृक्ष से कहा —कुछ तो बोलो, यूँ क्यों चुप हो।वृक्ष मुस्कुराया,पत्तों की सरसराहट में बोला —“जिन्होंने सब कुछ खोकर भी दिया,वो…
डॉ. मंजु गुप्ता ***** फूल की ज़िद बाल हठराज हठत्रिया हठसारे संसार में प्रसिद्ध हैंपर फूल की ज़िद की अभी तक अनदेखी हैइस ओर किसी की दृष्टि ही नहीं गईहमने…
डॉ॰ अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश 🪷 भानु नित्य भोर में 🪷 भानु नित्य भोर में रश्मियाँ प्रसारता।भृंग बाग में सदा धुन मधुर सँवारता॥पेड़ नित्य झूमते बाँह नित पसारते।पुष्प…