“धरती ने भिजवाई पाती” : संगीता चौबे ‘पंखुड़ी’
“धरती ने भिजवाई पाती” : ( कविता ) धरती ने भिजवाई पातीजिसमें पीड़ा और उदासीझर झर उसके आँसू बहतेतेज गति से तरु जब कटते…. सुनो मनुज! अब मेरी गाथाकब तक…
हिंदी का वैश्विक मंच
“धरती ने भिजवाई पाती” : ( कविता ) धरती ने भिजवाई पातीजिसमें पीड़ा और उदासीझर झर उसके आँसू बहतेतेज गति से तरु जब कटते…. सुनो मनुज! अब मेरी गाथाकब तक…
सरकारी तख्ता (तुर्की व्यंग्य) : अजीज नेसिन क्या आप जानते हैं कि सरकार का तख्ता कैसे उलटा जाता है? संभव है, आप कभी इस प्रकार का कार्य संपन्न करने के…
रिश्वतखोर लिमिटेड (तुर्की व्यंग्य) : अजीज नेसिन जिस विभाग के कर्मचारियों को रिश्वत खाने की बीमारी लग जाए तो वे उससे कभी मुक्त नहीं होना चाहते हैं। और उसके राह…
“लेटर टू मदर”- सर्गेई येसेनिन : “माँ को पत्र”- प्रीति अग्रवाल : (कविता-अनुवाद) माँ को पत्र क्या तुम अभी जीवित हो, मेरी प्यारी बूढी माँ? मैं भी जीवित हूँ। तुम्हें…
अंत भला तो सब भला ( कहानी अनुवाद ) : रेखा राजवंशी जब किराए की कार झाँसी स्टेशन के बाहर आकर रुकी, प्रिया का भाई अनिल ड्राइवर के पास वाली…
साइकिल – स्वास्थ्य और खुशी का साथी : सांद्रा लुटावन (कविता) सुबह की पहली किरण जब धरती पर मुस्काती है,हल्की ठंडी हवा भी मन को छू जाती है।सड़क किनारे खड़ी…
सूर्य की तलाश ( कहानी ) – रेखा राजवंशी विश्वास नहीं होता कि वह दुनिया से चल बसी। गोरी-चिट्टी, तीखे नाक-नक्श, हमेशा करीने से कटे हुए बॉबकट बाल। उसे देखो…
बिना धड़ की भूतनी ( कहानी ) : रेखा राजवंशी पिछले दस साल से मेरा एक ही मकसद था, आते जाते लोगों को तंग करना। रात को और गर्मियों की…
अनुवाद ( कविता ) – दिव्या माथुर : मेरी माँ का साहस (द करेज दैट माय मदर हैड) The courage that my mother hadEdna St. Vincent Millay (1892-1950) The courage…
माँ के लिए (टू माइ मदर) : अनुवाद (कविता) To My MotherEdgar Allan Poe (1809–1849) Because I feel that, in the Heavens above,The angels, whispering to one another,Can find, among…
गोर्की की माँ – समीक्षक : डॉ. बंदिता सिन्हा आज दुनिया की इतनी सारी माता के बारे में सुनकर मन भावुक रहा है लिखने में तो मन बहुत ही छोटा…
ट्यूलिपों के देश नीदरलैंड की जादुई लोक कथाएँ: संस्कृति और कल्पना और यथार्थ का सुन्दर संगम : समीक्षक – रेखा राजवंशी मुझे 1988 में ट्यूलिपों के देश नीदरलैंड जाने का…
आस्था, इतिहास और विज्ञान के बीच एक जटिल संवाद मनीष पाण्डेय ‘मनु’, नीदरलैंड्स दुनिया के सभी धर्मों, समुदाओं और भौगोलिक क्षेत्रों के इतिहास में कुछ ना कुछ ऐसी वस्तुएँ हैं…
अनूप भार्गव अक्सर जमाने कीज़बरदस्ती ओढाई गईतहज़ीब की चाशनी मेंफ़िसल के लौट जाते हैं , तुम्हारे शब्द मुझ तक पहुँच ही कहां पाते हैं ? तुम्हारे होठों के गोल होने…
दृश्य: सुबह – डॉ. शैलजा सक्सेना ( कविता ) हवा शान्त है,रात बरसता मेह रुक गया,सड़कें पानी पीकर लेटीं,पत्ते सभी नहाये दिखते,सूरज भी अब बदन पौंछ कर,आने की तैयारी में…
दृश्य: वर्षा – डॉ. शैलजा सक्सेना ( कविता ) आज धूप की मुठ्ठी बाँधेसूरज बादल पीछे दुबकाऔर हवा की बन आई हैघर-घर जा कर चुगली करती। सूरज व्याकुल देख रहा…
“एक साँस”- डॉ. शैलजा सक्सेना साँसों की भीड़ मेंएक साँस है,सब साँसों को साँस बनातीजैसे वो साँस नहींएक पेड़ हो ऑक्सीज़न का! जब दिन की भाग–दौड़ में साँसें शोर मचाती,सब…
इंटरनेट की सड़क पर – ( कविता ) हमने इंटरनेट की भीड़-भरी सड़क पर ढूँढ ही लिया एक छोटा-सा कोना, बतियाने के लिये। अब परीक्षा है हमारी कि बिना चेहरा…
“चाय की मिठासक्ष” – सांद्रा लुटावन सुबह की शुरुआत हो या शाम का समाँ,चाय हर पल को बना देती है सुहाना।कभी हल्की भाप में सुकून मिलता है,कभी एक प्याले में…
“प्रवासी मजदूर”- डॉ. वंदना मुकेश छत होती तो देखती,गली से निकलतेप्रवासी मजदूरों की टोलियाँ।देखती कुछ औरतें,कुछ बच्चे लटकाए,कंधों पर झोले अटकाए। कुछ औरतें,खाली पेटवाली,कुछ पेटवाली, खाली। मुझे छत चाहियेकि देख…