सुख और दुःख!
– विनोद पाराशर सुख और दुःख! हम-यह जानकरबहुत सुखी हैंकि-दुनिया के ज्यादातर लोगहमसे भी ज्यादा दु:खी हैं!पिता-इसलिए दु:खी है-कि बेटा कहना नहीं मानताबेटे का दु:ख-कैसा बाप है!बेटे के जज्बात ही…
हिंदी का वैश्विक मंच
– विनोद पाराशर सुख और दुःख! हम-यह जानकरबहुत सुखी हैंकि-दुनिया के ज्यादातर लोगहमसे भी ज्यादा दु:खी हैं!पिता-इसलिए दु:खी है-कि बेटा कहना नहीं मानताबेटे का दु:ख-कैसा बाप है!बेटे के जज्बात ही…
– विनोद पाराशर स्त्री की पहचान! जब वहपैदा हुईतो बनीकिसी की बेटीकिसी की बहनबढ़ती रहीखर-पतवार-सीकरती रहीसब-कुछ सहन।जवान हुईबन गयीकिसी की पत्नीकिसी की भाभीतो किसी की पुत्र-वधु!विष पीकर भी-घोलतीं रहीओरों के…
साहित्यसेतू : मराठी संतों की हिंदी यात्रा ~ विजय नगरकर, अहिल्यानगर, महाराष्ट्र खंड 1: प्रस्तावना एवं लेखक का परिचय “साहित्यसेतू” ( – पृष्ठ 1) डॉ. श्रीधर रंगनाथ कुलकर्णी ( –…
– कृष्णा कुमार ज़िन्दगी ज़िन्दगी की अस्थिरता ने,हमें बहुत कुछ सिखाया हैअब तो लगता है जैसे,इसी का नाम है ज़िन्दगी। इस उथल-पुथल में,कुछ बहुत पास आ जाते है,कुछ दिखाई तो…
– कृष्णा कुमार लो वसंत रितु आई लो वसंत रितु आई -२ पेड़ों पे कोंपल मुसकाई -२सूरज की मीठी धूप पाकरकलियों ने ली अँगड़ाई लो वसंत रितु आई-२ इंद्रधनुष सा…
बढ़ते कदम – कृष्णा कुमार आज झरोंखों के पार देखाआज दिल को समझायाचल उठ, उठकर, कुछ क़दम तो बढ़ाक्या पता उसपार, इसपार से कुछ ज़्यादा हो,नीले आसमाँ के अलावा कुछ…
असहाय लोग – कृष्णा कुमार एक पाँच साल की बच्ची,और उसकी तीन साल की बहन,उचक उचक के चलते पाँव,क्या हज़ार किलोमीटर चल पाएँगे?नंगे पॉंव पे छाले कहाँ तक ले जाएगें?एक…
कविता – कृष्णा कुमार लिखने बैठी हूँ कविता,कविता ये क्या है ?ये हक़ीक़ते बयाँ है क्या ? जिसे कहना बहुत मुश्किल हो,लफ़्ज़ों से खेलना जिसकी फ़ितरत हो,कई प्रकार की कल्पना…
दूरदर्शन – अमरनाथ ‘अमर’ तब दूरदर्शन केंद्र मंडी हाउस में न होकर संसद मार्ग स्थित आकाशवाणी भवन में था। आकाशवाणी भवन में आकाशवाणी का महानिदेशालय था (अभी भी है) उसकी…
सात पहाड़ियों पर बसा शहर : रोम शशि पाधा, वर्जीनिया, यू एस ए याद है बचपन में मैंने अपने जन्म स्थान जम्मू शहर की मुबारक मंडी के राजमहलों के बीचोबीच…
© विनयशील चतुर्वेदी ग़ज़ल युँ ढल कर शाम का सूरज सुबह ऐसे निकलता है।किसी दुल्हन की घूंघट से वदन जैसे झलकता है मुहल्ला आशिक़ों का है यहाँ आना बहुत धीमेकिसी…
मेरी माँ – आशा बर्मन यह भी कैसी विडम्बना है कि माँ तुमको पत्र तो लिख रही हूं यह जानते हुए भी कि यह पत्र कभी तुम तक पहुंचेगा तो…
मधुमक्खी – डॉ मीनाक्षी गोयल नायर, कोबे, जापान बालकनी में लगे पौधौं पर फूल खिलने लगे हैं। छोटे छोटे तीन फूलों के गमले जो गार्गी ने कुछ उदासी दूर करने…
जापान में भारतीय ज्ञान परंपरा की कुछ छवियाँ डॉ वेदप्रकाश सिंह ओसाका विश्वविद्यालय, जापान जापान की संस्कृति में शिंतो और बौद्ध धर्म का अमिट प्रभाव है। शिंतो धर्म जापान में…
सर्द रातें, टोक्यो और ‘तेनाली राम’ – सुयोग गर्ग, जापान ग़ौरतलब है कि पिछले कुछ सफ़्ताहों से शीत लहर ने शहर को झँझोड़ के रख दिया है। घर के दरवाज़े…
© विनयशील चतुर्वेदी ग़ज़ल आँखों में ज़रूरी है ग़ैरत औ हया होना।।वादों में ज़रूरी है इक अहले वफ़ा होना।। तुम प्यार के खेतों में बारूद उगाते होतुम भूल गए शायद…
– अनिल वर्मा, ऑस्ट्रेलिया कब तक ? कल तक आँख में चुभन थीआज देखता हूँ यहाँ नज़ारा ही बदला है सोचता हूँप्रकृति ने दोनों आँखें आगे लगायी हैं ताकि कदम…
– अनिल वर्मा, ऑस्ट्रेलिया संस्कार जड़ ने कहा तने सेछाया विस्तार ले, अपरिमित प्यार देइसलिए तने रहो, बने रहो तना बोला डाली सेफैलो पर याद रहे, किस वृक्ष की तुम…
– अनिल वर्मा, ऑस्ट्रेलिया बंजारा मन बंजर तनबंजारा मनकहाँ कहाँ न हारा मनजहाँ कहीं भी चोट लगीवहीं गया दोबारा मन ख़्वाबों के तिनके चुन चुनयादों के धागों से बुननीड़ बनाया…
– अनिल वर्मा, ऑस्ट्रेलिया कहो तो कहो, तुम्हारा परिचय क्या है ? सृष्टि-द्वार पर दिवा-रात्रि काउषा-निशा ले आना जानाबदली में छिप कर बिजली काआवेशित संगीत सुनाना संसृति रंगमंच पर प्रतिपलअभिमंत्रित…