इसी पल – (कविता)
इसी पल जब सपाट आवाज़ मेंडुबो देती है उदासीऔर भूल जाते हो तुम बात करनाठीक उस वक्त से मैं मुरझाने लगती हूँठूँठ की तरहक्यों सूखा देते हो तुम मुझेइस मौसम…
हिंदी का वैश्विक मंच
इसी पल जब सपाट आवाज़ मेंडुबो देती है उदासीऔर भूल जाते हो तुम बात करनाठीक उस वक्त से मैं मुरझाने लगती हूँठूँठ की तरहक्यों सूखा देते हो तुम मुझेइस मौसम…
https://www.youtube.com/watch?v=DeNJdRmX6cs
76 वाँ गणतंत्र मेरा देश वह साइकिल हैजिसे 540 गण चला रहे हैं300 चला रहे हैं दिन रात पैडलबाकी मिलकर ब्रेक लगा रहे हैं। कोई दाहिनी ब्रेक तो कोई वामकोई…
संज्ञा बोली सर्वनाम से न जाने क्योंसंज्ञा और सर्वनाम मेंतकरार हो गईसर्वनाम बना हुआ था ढालऔर संज्ञा तलवार हो गई! वो सर्वनाम से बोली —अरे मेरे चाकर!मेरे आश्रित!मेरे पालतू!और फालतू!मेरी…
उपसर्ग और शब्द हम भगतसिंह हैं, आज़ाद हैंहम करोड़ों नहींदस बीस होते हैमाना कि हम कटे हुए शीश होते हैंहम कौम के लिए उत्सर्ग होते हैंहम शब्द नहीं, उपसर्ग होते…
उक्ति के बहाने से कुछ भी कहावो वाक्य हैअपना मत रखातो कथन हैकथन की ओर उँगलीउक्ति हैसारगर्भितया कि मर्मबेधक उक्तिसूक्ति हैऔर बरसों बरस का अनुभवचढ़ जाएलोगों की जुबान परतो लोकोक्ति…
मुहावरे और लोकोक्ति की भिड़ंत एक दिनमुहावरे और लोकोक्ति मेंहो गई जिद्दबाजीकदम पीछे हटाने कोन मुहावरा राजीन लोकोक्ति राजी! मुहावरे ने उचक कर कहा —तुम खुद को समझती क्या हो?तुम…
गणित और साहित्य पता नहीं कौन-सा काँटागणित के दिल में पैठ गयाकि एक दिन साहित्य से ऐंठ गयाबोला —अबे ओ साहबजादे साहित्य!कहते होंगे लोग तुझे आदित्य!पर यह मत भूलआदित्य की…
आगे आगे होता है क्या! – डॉ अशोक कुमार बत्रा लगभग 20 वर्ष पहले की बात है। चुनावों की तैयारियाँ चल रही थीं। दोपहर 2.30 बजे के आसपास मेरे घर…
बासंती हवा पोर पोर में फूल खिले हैंरोम रोम खुशबू से भरानाच रहा है मन मेरा याझूम रहे आकाश धरा दिखे अधिक पीली मुझकोया किसी ने रंग डाली सरसोंमहक रही…
हिंदी की राजभाषा यात्रा ~ विजय नगरकर अभी तक विश्व के अनेक देशों में राजभाषा स्वीकृत नहीं हुई है। इसी तरह राष्ट्रभाषा का भी मामला अनेक देशों में लंबित है।…
स्पेन में हिन्दी – पूजा अनिल मैं यह मानती हूँ कि भाषाएँ नदी की धारा की तरह होती हैं, जहाँ राह मिल गई, उसी तरफ आबाद हो जाती हैं। हमारी…
सुनो अमीनी दरख़्त की डाल…ऊंची फुनगी पे बैठीगौरैया से बतियातीअपनी जिज्ञासा रोक नहीं पायी…इक दिन सवाल कर ही बैठी… उड़ान के हौंसलेकहाँ से लाती हो तुम…?चीलों, गिद्दों और बाज़ की…
औरतें खिलखिलाती धूप सीऔरतेंअलसुबह चूल्हे को लीपतीगुनगुनाती हैंअलसाई तंद्रा को भगानेखदबदाते पानी के धुएँ मेंतलाशती हैंखुशियों की फरमाइशेंऔरनन्हें हाथों मेंचाँद सी रोटी थमाबोसा लेकेभरपूर मुस्कुराती हैं। पूरे दिन कोठेंगा दिखाचल…
आहट सर्द रातों मेंकोहरे को चीरतीएक सुलगी सी आहटबेलाग लिपट जाती हैबारंबार कुनकुनी धूप कोअपनी दोहर में लपेटे..! कभीचादर की सलवटों मेंउदासी की संतप्त सांसेंबीतने नहीं देतींसिरफिरी ख्वाहिशों कोउनकी उद्दाम…
युयुत्सु किसने चाहा युयुत्सु बनना..?सत्य के पक्ष में डटे रहनासमय की नंगी तलवार पे चलनावो भी बिना डगमगाए…!!!कुछसत्ता के पक्षधरअक्सर प्रश्नों के बवंडरउड़ा देते हैंआँखों में धूल की मोटी परत…
डायरी के पन्ने से……द रिफ्यूज़ कलेक्टर – उषा राजे सक्सेना मेरी अपनी सांस्कृतिक पहचान और मूल्य जो इस ब्रिटिश समाज के दबदबे में खो गए थे। आज इस इनसेट (इन-सर्विस…
मेरा अपराध – उषा राजे सक्सेना उन दिनों मेरे पिता पोर्टस्मथ में एक जहाजी बेड़े पर काम करते थे। उनकी अनुपस्थिति और अकेलेपन को न झेल पाने के कारण मेरी…
दर्द का रिश्ता… – उषा राजे सक्सेना मिहिर-मंजरी का गठबंधन न तो कोई इत्तफाक था और ना ही किसी दबाव का परिणाम। उनका विवाह माँ दयामयी, मिहिर के माता-पिता और…
विच शैल अग्रवाल उसका यूं इस तरह से प्रकट हो जाना पूरी तरह से आलोड़ित कर चुका था उसे। ‘तू यहां पर कैसे?… मार्स और वीनस से कब लौटी?’ जैसे…