“मोरपंख”- प्रवीण ‘बनजारा’
“मोरपंख”- प्रवीण ‘बनजारा’ सब उन्हें माताजी के नाम से जानते थे।उस दिन बड़े तड़के जब नींद खुली तो अंधेरा ही दिखा। गली के एक खम्भे के लाटू की रोशनी जाने…
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“मोरपंख”- प्रवीण ‘बनजारा’ सब उन्हें माताजी के नाम से जानते थे।उस दिन बड़े तड़के जब नींद खुली तो अंधेरा ही दिखा। गली के एक खम्भे के लाटू की रोशनी जाने…
विशेषण (कविता) एक दिन संज्ञा और सर्वनाम नेविशेषण का पकड़ लिया गिरेबान!और चिढ़ाते हुए बोले —हमारे अंगने में तुम्हारा क्या काम? विशेषण मुस्कराया !बोला — संज्ञा बी!यह सर्वनाम तो तुम्हारा…
“सौ ग्राम जिंदगी”- डॉ. नीना छिब्बर अकल्पनीय है सांसों की पूंजी को कंजूसी से खर्चना तोला माशा का हिसाब रख फूंक -फूंक कर गर्म पलों को ठंडा कर के देना…
“पहाड़ों मे पगडंडी”- जे. पी. पाण्डेय ( पुस्तक समीक्षा ) यात्रा-वृत्तांत साहित्य की वह विधा है जिसमें लेखक अपनी यात्राओं के अनुभवों, दृश्यों, लोगों और विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक स्थितियों का सजीव…
“युद्ध और स्त्रियाँ”- डॉ.नीना छिब्बर स्त्रियाॅं चाहे हो ताकतवर या कमजोर देश की युद्ध चाहे शीत हो या विध्वंसक दिन का उजाला हो या घुप अंधेराकभी टैंकों की गड़गड़ाहट गूंजेकभी…
“धीरज आखिर टूट गया”- डॉ. वेद व्यथित और छुपाता दर्द हृदय में अब कितना दर्द हृदय की सब सीमायें लांघ गया कितने ज्वार उठे और कितने लौट गये कितने मोती…
”बाबुल की देहरी”- डॉ. शिप्रा मिश्रा घर में प्रवेश करते ही नजर आलमारी पर जा रुकी- शर्बत सेट, किताबें, कैसेट्स और न जाने क्या-क्या अबाड़-कबाड़। मन में आया अभी उठाकर…
“मातृभाषा हमारी आत्मा की आवाज है” – डॉ.अशोक कुमार भार्गव प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मातृभाषा में लिखने पढ़ने सीखने समझने संवाद स्थापित करने का अधिकार है क्योंकि मातृभाषा हमारी आत्मा…
तुम्हारे लिए मुस्कराए हुए हूँ (कविता) हृदय में बहुत कुछ छुपाये हुए हूँ तुम्हारे लिए मुस्कराए हुए हूँ . क्या क्या नही दुःख उठाया है मैंने दुपहरी को सिर पर…
धीरज आखिर टूट गया (कविता) और छुपाता दर्द हृदय में अब कितना दर्द हृदय की सब सीमायें लांघ गया कितने ज्वार उठे और कितने लौट गये कितने मोती तट बंधों…
पुस्तक समीक्षा: “ड्रीमटाइम कहानियाँ” (अनुवाद: रेखा राजवंशी) “ड्रीमटाइम कहानियाँ” ऑस्ट्रेलिया की आदिवासी (एबोरीजिनल) लोककथाओं का एक अत्यंत रोचक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध संग्रह है, जिसे रेखा राजवंशी ने हिंदी…
डॉ. रुद्रेश नारायण मिश्र ‘2011 और नैनी झील’ (कविता) 2011, अब,कैलेंडर से,उतर चुका है।पर आज भी,जब, दिसंबर की हवा,चलती है,मैं, अचानक,नैनी झील के किनारे,पहुँच जाता हूँ।देवदार,फिर हिलते हैं,गुब्बारे वाला बच्चा,फिर,…
आश्वासन को विश्वास में बदलती फ़िल्म (समीक्षा) फ़िल्मों के बारे में कहा जाता है कि वे वहाँ से शुरू होती हैं, जहाँ आपकी कल्पनाशक्ति ख़त्म हो जाती है। पर इन…
लिव-इन रिलेशनशिप (व्यंग्य) उस फ्लैट की दीवारों पर लगे आधुनिक चित्रों में रंग तो बहुत थे, पर चमक गायब थी। विवान और समायरा आमने-सामने बैठे थे, जैसे किसी युद्ध के…
जाग तुझको दूर जाना ( महादेवी वर्मा ) ಎದ್ದೇಳು, ಬಹಳ ದೂರ ನೀನು ಸಾಗಬೇಕಾಗಿದೆ! ಮಹಾದೇವಿ ವರ್ಮಾ ಶಾಶ್ವತವಾಗಿ ಎಚ್ಚರದಿಂದಿರುವ ಕಣ್ಣುಗಳು ಇಂದು ನಿದ್ರಿಸುತ್ತಿವೆ, ಎಂತಹ ನಿರತ ನೋಟ! ಎದ್ದೇಳು, ಬಹಳ ದೂರ ನೀನು ಸಾಗಬೇಕಾಗಿದೆ! ಕದಲದ ಹಿಮದ…
आकांक्षाओ और आत्म संघर्ष के बीच का द्वंद्व ( अपने अपने बुर्ज खलीफा ) समकालीन हिंदी साहित्य के विस्तृत परिदृश्य में कुछ कृतियाँ ऐसी होती हैं जो केवल कहानी कहने…
स्त्री की बदलती तस्वीर संजोए है: क्लाइडोस्कोप दिव्या माथुर की “क्लाइडोस्कोप: सतरंगी स्मृतियाँ” मुख्य रूप से प्रवासी जीवन के चालीस वर्षों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करती है। यह निजी जीवन की…
आहिल्या ( डॉ वेद व्यथित ) स्त्री अस्मिता के नवीन आयामों को परिभाषित करता खंडकाव्य “अहिल्या “डॉ वेद व्यथित का खंड काव्य अहिल्या महर्षि वाल्मिकी की “अहिल्या “ को ले…
यादों की अर्थी (व्यंग्य) वह दोपहर किसी सड़ी हुई कढ़ी जैसी चिपचिपी थी। कार के भीतर का तापमान और मेरी पत्नी सुजाता के तेवर, दोनों ही चालीस डिग्री के पार…
जीवन की मूल धारा (कविता) जन्म लेने पर रोनादुनिया से जाते हुए दुखी होनाइस लम्बे अंतराल में होती हैएक लम्बी यात्रायात्रीगण रहते हैं क़तार मेंउधेड़ते -बुनते हुए अपने आप कोक्षणिक…