Category: विधा

धुंए भरे कमरे में – (कविता)

डॉ. सत्येंद्र श्रीवास्तव, ब्रिटेन ***** धुंए भरे कमरे में उस धुंए भरे कमरे मेंबहुत लोग नहीं थेलेकिन जो थेवे अपनी उपस्थिति के प्रतिनिरंतर चौकन्ने थेउनकी आंखों में जो परेशानी थीवह…

वह लड़की – (कविता)

डॉ. सत्येंद्र श्रीवास्तव, ब्रिटेन ***** वह लड़की एक छोटी-सी लड़की थी वहकोई आठ वर्ष कीएक पवित्र जल-धार की खामोश थिरकन लहर कीजब उसकी आंखों मेंउसके पार मैंने उसे देखा थाएक…

मनोदैहिक विकारों में योग की भूमिका – (आलेख)

मनोदैहिक विकारों में योग की भूमिका – मनोज श्रीवास्तव कल भोपाल विश्वविद्यालय में Role of Yoga in Psycho-somatic disorders में बोलते हुए मैंने कहा कि योग मन का जनतंत्र है।…

कृष्ण-कृष्णा की प्रेमावस्था…

कृष्ण-कृष्णा की प्रेमावस्था… (कुछ शास्त्रीय चरित्रों पर मुक्त विमर्श) – यूरी बोत्वींकिन, युक्रेन केनोपनिषद के तृतीय खंड में देवताओं का अभिमान तोड़ने के लिए ब्रह्म उनके समक्ष एक यक्ष के…

संकल्प – (कविता)

डॉ. सत्येंद्र श्रीवास्तव, ब्रिटेन ***** संकल्प मैं देखता हूं उन्हेंगाते हुए प्रेम-गानअपनी बाहों पर गुदे गुदने को देखकरवे कितने सारे नाम उन परवे कैथरिनें, वे एलिजाबेथेंवे डायनाएं और वे मार्गरटेंफिर…

माइकल एंजेलो – (कविता)

डॉ. सत्येंद्र श्रीवास्तव, ब्रिटेन *** माइकल एंजेलो ठुमक रही है संगमरमरी शीशों परमैं देख रहा हूंइन पत्थरों पर पड़ती रोशनी की झांइयों मेंतुम्हारी कलाई का स्वप्न-नृत्यऔर मैं कल्पना कर रहा…

बार बार भारत – (कविता)

डॉ. सत्येंद्र श्रीवास्तव, ब्रिटेन ***** बार बार भारत विद्यार्थी कहते थे-वे भारत देश जा रहे हैंवे भारत देश केवल कुछ पढ़ने-घूमने देखने हीनहीं जा रहे हैंजा रहे हैं वहां वह…

खिड़की के सामने का पेड़ – (कविता)

डॉ. सत्येंद्र श्रीवास्तव, ब्रिटेन *** खिड़की के सामने का पेड़ मेरी खिड़की के सामने का यह पेड़सब ऋतुओं में बदला है, परइसे इंसान की तरह मौसमी नहीं कहा जा सकता…

सर विंस्टन चर्चिल मेरी मां को जानते थे – (कविता)

डॉ. सत्येंद्र श्रीवास्तव, ब्रिटेन *** सर विंस्टन चर्चिल मेरी मां को जानते थे सर विंस्टन चर्चिल जानते थे कि भारत क्या है।वे जानते थेक्योंकि वे मानते थे कि भारत ब्रिटिश-साम्राज्य…

जय वर्मा के कहानी संग्रह ‘सात कदम’ की अनीता वर्मा की समीक्षा – (यू-ट्यूब)

https://www.youtube.com/watch?v=TJ4g3gAGCEA

चेतावनी – (कविता)

बृजेंद्र कुमार भगत ‘मधुकर’ (राष्ट्रकवि), मॉरीशस चेतावनी हिंदी गई रसातल में तो गई हमारी आशा,संस्कृति सिसक-सिसक रोएगी धर्म मरेगा प्यासा।हिंदी को कुचलेगी प्यारे गौरांगों की भाषा,हिंदू एक न होगा जग…

मंदिरों के आलोक में – पुनः वारंगल (2) – (यात्रा संस्मरण)

मंदिरों के आलोक में – पुनः वारंगल वरुण कुमार “रह न जाए मेरी-तेरी बात आधी…” मन को संतोष न था। इतनी चीजें देखी और सोची थीं, किंतु अभिव्यक्ति एक ही…

राजभाषा संस्मरण – (संस्मरण)

राजभाषा संस्मरण ~ विजय नगरकर, महाराष्ट्र हमारे ज़िले के उस शांत और नैसर्गिक ग्रामीण क्षेत्र में स्थित महाविद्यालय का वातावरण आज भी मेरी स्मृति में ताज़ा है। मुझे वहाँ हिंदी…

अपनी राह की अन्वेषक – (संस्मरण)

अपनी राह की अन्वेषक -प्रेम जन्मेजय 1969 में दिल्ली विश्वविद्यालय की आर्टस फैक्लटी में मेरे साहित्यिक व्यक्तित्व का निर्माण करने वाले शिक्षाकाल का आंरभ हुआ तो लगा कि कुएं से…

आदमी और कबूतर – (कविता)

अमरेन्द्र कुमार, अमेरिका आदमी और कबूतर (१) नाम देकरसभ्यता का विकासछीन करधरती और आकाशबनाये जा रहेकंक्रीट के दरबेतैयारी हो चुकी है पूरीआदमी को कबूतर बनाने की (२) कबूतरशांति का प्रतीक…

पावस – (कविता)

अमरेन्द्र कुमार, अमेरिका पावस (१) जाते-जातेसावन डाकिये नेबचे बादलों के बण्डल कोबढ़ा दिया भादों कोताकि धरती परजल का वितरणहोता रहे निरंतर-निर्बाध| (२) सूरज साहब के नामधूप की छुट्टियों की अर्जीबंद…

समय सबसे बड़ा छन्ना – (कविता)

अमरेन्द्र कुमार, अमेरिका समय सबसे बड़ा छन्ना समय सबसे बड़ा छन्नाठोस रह जाता हैतरल बह जाता है. मौन सबसे बड़ा संवादकोलाहल से आगेअनकहा कह जाता है. दुर्ग हो असत्य काचाहे…

आत्मा की अदालत – (कविता)

अमरेन्द्र कुमार, अमेरिका आत्मा की अदालत ईमान के लिए अगरबिगाड़ की बात करोगे?अपनी बर्बादी का गड्ढाक्या खुद खोदोगे? किसी का कुछ जायेगा नहींअपना नुकसान आप भरोगे अलगू चौधरी के कामजुम्मन…

मनाली के इग्लू – (यात्रा संस्मरण)

मनाली के इग्लू (दूसरा दिन) मनोज श्रीवास्तव ‘अनाम’ 22 जनवरी 2021 ऊंघते पहाड़ों के बीच घुमावदार सड़कों पर बस आगे बढ़ती अपने पीछे जंगल, बस्ती एवं छोटी – छोटी दुकानों…

एक दिन सुबह – (कहानी)

एक दिन सुबह अमरेन्द्र कुमार, अमेरिका अपनी नौकरी से रिटायर होने के बाद एक एकदम नये और अंजाने शहर में बसने का फैसला मेरा ही था। फैसलों में किसी की…

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